सेंध
धूप की एक धार मंदिर के अधबने प्रांगण में तिरछी कटती हुई गिर रही थी। हवा में महीन धूल तैर रही थी—इतनी हल्की कि दिखती नहीं, पर सांस में चुभती रहती है।
खंभा धीरे-धीरे कांपा।
रामलाल ने गर्दन उठाई। उसकी आँखें सिकुड़ीं, जैसे किसी अदृश्य खतरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हों।
“कुछ गड़बड़ है…”—उसके होंठ हिले, आवाज़ पूरी बनी भी नहीं थी।
और तभी—धड़ाम! गिरते हुए पत्थर की आवाज़ ने जैसे भीतर कहीं एक पुरानी दरार को भी तोड़ दिया।
कलेक्टर जब पहुँचे, उनके जूतों की ठक-ठक पत्थर पर गूंज रही थी। उनके चेहरे पर स्थिरता थी—वह स्थिरता जो अभ्यास से आती है, भाव से नहीं।
रामसिंह भीड़ के किनारे खड़ा था। उसके हाथ आपस में कसकर जुड़े हुए थे। उंगलियों के पोर सफेद पड़ रहे थे।
कलेक्टर धीरे, आँखें सीधी उसकी आँखों में गड़ाकर बोले :“आप ही हैं ठेकेदार?”
उस क्षण रामसिंह को लगा—जैसे उसकी त्वचा के नीचे छिपी सारी परतें किसी ने देख ली हों।
उसने हल्का-सा सिर हिलाया—“जी…”
कलेक्टर की भौंह बहुत हल्के से उठी—“दिलचस्प है… नियमों की फाइलें कुछ और कहती हैं, और ये खंभा कुछ और।”
एक सेकंड का मौन। उस मौन में रामसिंह को अपने दिल की धड़कन सुनाई दी—तेज़, अनियमित।
कमरे में एक बल्ब था, जो सिर के ठीक ऊपर लटका था। रोशनी सीधी चेहरे पर पड़ती—बाकी सब अंधेरे में डूबा।
इंस्पेक्टर ने फाइल बंद की। उसकी उंगलियाँ मेज पर धीमी ताल से बज रही थीं—टिक… टिक… टिक…
इंस्पेक्टर नज़रें हटाए बिना बोला “सीमेंट का अनुपात… किसने तय किया?”
रामसिंह ने होंठ भींचे। उसकी नजर एक क्षण को मेज के किनारे पर टिक गई—जैसे वहाँ कोई सुरक्षित जगह हो।
“इंजीनियर ने…”
इंस्पेक्टर ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुकाया—“अजीब है… इंजीनियर कहता है—आपने कहा था जल्दी करो।”
उस पल रामसिंह के भीतर कुछ खिसका। एक पुरानी आवाज़ उभरी—“काम तो ऐसे ही चलता है…”
उसने खुद को समझाया—नहीं… यह सब सामान्य है… सब करते हैं…पर पहली बार—यह तर्क उसे खुद के भीतर ही खोखला लगा।
रात में जेल की ठंडी जमीन पर लेटा, उसने आँखें बंद कीं।
दो आवाज़ें थीं—पहली परिचित, ठोस आवाज : “तुमने कुछ गलत नहीं किया। सिस्टम ऐसा है। तुम बस उसका हिस्सा थे।”
दूसरी धीमी, लेकिन चुभती हुई सी :“अगर सब करते हैं… तो गिरता क्यों है? खंभा… या तुम?”
उसने करवट बदली। दीवार की दरार पर नजर टिक गई।
वह दरार स्थिर थी—पर उसे लग रहा था जैसे वह फैल रही है।
कोर्ट में हवा भारी थी। पंखे की आवाज़—घूमती हुई, पर राहत नहीं देती।
सरकारी वकील ने कागज़ मेज पर रखे—धीरे, व्यवस्थित।
उसकी आवाज़ में ठंडापन था—“मान्यवर, यह मामला सिर्फ निर्माण का नहीं—विश्वास का है।”
रामसिंह का वकील आगे झुका। उसकी उंगलियाँ आपस में गुंथी थीं—आत्मविश्वास का संकेत।
“हर दुर्घटना को अपराध कहना—न्याय नहीं, आवेश है।”
जज की आँखें दोनों के बीच घूमीं—जैसे वजन तौल रही हों।
गवाह का परीक्षण हुआ , मजदूर खड़ा हुआ था । उसके कंधे झुके थे।“साहब… हमने बोला था… पर…”
वह रुक गया। उसकी आँखें एक पल को रामसिंह से मिलीं—फिर झुक गईं।उस नजर में डर था… और एक हल्का आरोप भी। रामसिंह ने महसूस किया—जैसे वह नजर सीधे भीतर धँस गई हो।
टीवी स्क्रीन पर नेता जी का चेहरा उभरा। रोशनी उनके एक हिस्से को चमका रही थी, दूसरा हिस्सा हल्की छाया में था।
पत्रकार:“क्या आप अपने पुराने सहयोगी के मामले पर कुछ कहना चाहेंगे?”
नेता जी ने एक सेकंड के लिए रुककर सांस ली—बहुत हल्का, पर नियंत्रित।
फिर मुस्कुराए—वही अभ्यास वाली मुस्कान।“कानून से ऊपर कोई नहीं है।”
वाक्य छोटा था। साफ था। और पूरी तरह दूरी बना रहा था।
जेल में टीवी की रोशनी रामसिंह के चेहरे पर पड़ रही थी।
उसने स्क्रीन को घूरा। आँखें सिकुड़ीं—जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों। “ये… वही हैं?” उसने फुसफुसाया।
अंदर से वही दूसरी आवाज़ आई—“नहीं… ये वही हैं जो हमेशा थे…तुम बस अब देख पा रहे हो।”
उसके कंधे ढीले पड़ गए।पहली बार—उसने खुद को बिना किसी सहारे के महसूस किया।
जज की आवाज़ गूंजी—“क्या आप कुछ कहना चाहते हैं?”
रामसिंह खड़ा हुआ। उसकी उंगलियाँ अब शांत थीं। चेहरा थका हुआ—पर विचित्र रूप से स्थिर।
कुछ सेकंड तक उसने कुछ नहीं कहा।
फिर—धीरे, जैसे खुद से बोल रहा हो, आवाज आई —“मैंने हमेशा सोचा… मैं सिस्टम चला रहा हूँ…”
उसने सिर उठाया—“…पर सच ये है… सिस्टम मुझे चला रहा था।”
कोर्ट में सन्नाटा।
मंदिर में नया खंभा खड़ा हो गया। सीधा। मजबूत। चमकदार।
पर जो दरार पड़ी थी—वह पत्थर में नहीं थी।
वह थी— निर्णयों में,चुप्पियों में,और उस आत्म-धोखे में…
जिसे लोग“सामान्य” कहकर जीते हैं।
हर गिरता खंभा दिखाई देता है, सेंध नहीं—पर जो भीतर गिरता है…वह सबसे देर से दिखाई देता है।
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