अनकहे शब्द
कस्बे की मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर, पीपल के पुराने पेड़ के नीचे डॉ. पुरोहित का छोटा-सा क्लीनिक था। बरामदे में लकड़ी की दो बेंचें रखी थीं और दीवार पर टँगा एक पुराना पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ घूम रहा था।
उस दिन दोपहर की हल्की उमस थी। क्लीनिक के भीतर मेज के सामने एक दुबला-पतला बारह वर्षीय लड़का बैठा था—रिंटू। उसके चेहरे पर घबराहट की हल्की परछाईं थी। माथे पर पसीने की महीन बूंदें चमक रही थीं, जबकि कमरे में ठंडक थी।
डॉक्टर पुरोहित ने स्टेथोस्कोप हटाकर गहरी सांस ली।
“हम्म…” उन्होंने धीरे से कहा और चश्मे के ऊपर से रिंटू को गौर से देखा।
“सब ठीक तो लग रहा है…।” वे बुदबुदाए।
रिंटू की माँ कुर्सी के किनारे बैठी थीं। उनकी साड़ी का पल्लू बार-बार उँगलियों में मरोड़ा जा रहा था। पिता फोदल सिंह दरवाजे के पास खड़े थे—चौड़ा सीना, घनी मूँछें और चेहरे पर स्थायी चिड़चिड़ापन।
डॉक्टर ने नरम आवाज़ में पूछा—“रिंटू बेटा, ज़रा बताओ… जब तुम्हें अचानक पसीना आता है, उस दिन कुछ अलग खाया होता है क्या?”
रिंटू ने गर्दन हिलाई, “नहीं अंकल… हम तो वही खाते हैं जो घर में सब खाते हैं।”
डॉक्टर मुस्कराए, पर आँखों में चिंता थी।
“अच्छा… टीवी में डरावने कार्यक्रम देखते हो? भूत-प्रेत वगैरह?”
रिंटू के चेहरे पर हल्की मासूम मुस्कान आई,“नहीं अंकल… हम तो मोटू-पतलू और मिकी माउस देखते हैं।”
डॉक्टर ने फिर पूछा—“स्कूल में कोई दोस्त राक्षस या डरावनी कहानी सुनाता है?”
“नहीं अंकल।”
डॉक्टर कुर्सी पर पीछे टिक गए। माथे पर हल्की शिकन उभर आई। उन्होंने रिंटू के पिता की ओर देखा।
“फोदल जी, आप इसे कभी डाकुओं के किस्से तो नहीं सुनाते?”
फोदलसिन्ह हँस पड़े—“अरे डॉक्टर साहब! हमारी चंबल घाटी में पच्चीस-तीस साल से कोई डाकू ही नहीं हुआ। हम किस डाकू की कहानी सुनाएँगे?”
इतने में रिंटू की माँ अचानक बोल पड़ीं। आवाज़ में दबी हुई चुभन थी— “डाकू की कहानी सुनाने की क्या जरूरत… घर में ही तो एक डाकू रहता है।”
कमरे में अचानक सन्नाटा जम गया। फोदल का चेहरा तमतमा उठा।वे गरज पड़े—“तैं चुप रह! ज्यादा बक-बक करेगी तो अभी मार के फेंक दूँगा!”
उनकी आँखें लाल हो गई थीं। हाथ हवा में उठ गया था। डॉक्टर पुरोहित अवाक् रह गए। उन्होंने घबराकर दोनों को देखा। पति-पत्नी बिना उनकी परवाह किए झगड़ने लगे। उसी क्षण डॉक्टर की नज़र रिंटू पर गई।वह सिकुड़कर कुर्सी के कोने में बैठ गया था। उसकी आँखें डरी हुई हिरणी की तरह कभी पिता पर जातीं, कभी माँ पर। उसके होंठ काँप रहे थे।
डॉक्टर के दिल में कुछ चुभ गया। उन्होंने धीरे से कहा—“अच्छा… आज हम कुछ दवाइयाँ दे देते हैं। दो दिन बाद फिर दिखा देना।”
उन्होंने विटामिन की गोलियाँ लिख दीं। लेकिन जब रिंटू बाहर गया, डॉक्टर की आँखों के सामने वही डरा हुआ चेहरा बार-बार घूमता रहा। दो दिन बाद क्लीनिक में रिंटू अपनी माँ के साथ आया। डॉक्टर ने मुस्कराकर पूछा—“तो बेटा, इन दो दिनों में पसीना आया?”
माँ ने जवाब दिया— “घर जाकर ही आ गया था डॉक्टर साहब… लेकिन आपकी गोली खिलाकर हमने इसे इसकी दादी के पास छोड़ दिया था। वहाँ जल्दी ठीक हो गया।”
डॉक्टर ने रिंटू की ओर देखा, “तुम होमवर्क पूरा करके स्कूल जाते हो?”
रिंटू ने धीरे से कहा—“जिस दिन नहीं करते… उस दिन मेम हमें क्लास में पीछे वाली टेबल पर खड़ा कर देती हैं।”
उसकी आँखें झुक गईं।
“तब कैसा लगता है?”
रिंटू के गले में रुलाई अटक गई, सब साथी हँसते हैं… तब रोना आता है।”
डॉक्टर ने धीरे से पूछा—“तो फिर होमवर्क क्यों नहीं करते?”
रिंटू की माँ बोलीं—“जिस दिन इसके पापा और हममें झगड़ा होता है… उस दिन यह पढ़ ही नहीं पाता।”
डॉक्टर कुछ क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने नरमी से पूछा—“तुम लोग इतना झगड़ते क्यों हो?”
माँ की आँखें भर आईं, “इसके पिता का गुस्सा बहुत खराब है डॉक्टर साहब… तनिक सी बात पर आग-बबूला हो जाते हैं।”
डॉक्टर ने दो मिनट सोचकर रिंटू से पूछा—“तुम्हें मामा के घर कैसा लगता है?”
रिंटू का चेहरा पहली बार खिल उठा, “वहाँ तो बहुत मज़ा आता है!”
“तो ठीक है,” डॉक्टर मुस्कराए, “अब तुम्हें सात दिन मामा के घर जाना है।”
रिंटू की आँखों में चमक आ गई।
सात दिन बाद रिंटू लौटा तो जैसे बदल गया था। चेहरा खिला हुआ, आँखों में चमक।
उसे छोड़ने मामा भी आए थे। मामा ने हँसते हुए कहा—“डॉक्टर साहब, सात दिन में इसे एक बार भी पसीना नहीं आया।”
डॉक्टर ने कहा—“अच्छा, ज़रा भीतर वाली टेबल पर लेट जाओ बेटा।”
जाँच करते-करते उन्होंने धीरे से पूछा—“रिंटू, तुम्हें किस तरह की बातें याद आती हैं कि घबराहट होने लगती है?”
रिंटू कुछ पल चुप रहा। फिर धीरे से बोला— “जब मम्मी-पापा के झगड़े की बात याद आती है… तब।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“तुम किसी को बताते नहीं?”
रिंटू की आँखों में आँसू भर आए, “अगर पापा को पता चल गया… तो बहुत मारते हैं।”
यह कहते हुए उसने अपने हाथ कभी गाल पर रखा, कभी पीठ पर।डॉक्टर पुरोहित का दिल भर आया। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा, “अब तुम्हारे घर में कोई झगड़ा नहीं होगा बेटा।”
रिंटू ने धीरे से सिर हिलाया। जब रिंटू बाहर मामा से बातें कर रहा था, डॉक्टर ने उसकी माँ से कहा—“कल आप और फोदल सिंह आना… लेकिन रिंटू को मत लाना।”
अगले दिन फोदल सिंह और उनकी पत्नी क्लीनिक पहुँचे। डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में पूछा—“आप लोग अपने बेटे को बचाना चाहते हैं… या उसे पागल करना चाहते हैं?”
फोदल सिंह चौंक गए, “हम अपने बेटे को पागल क्यों करेंगे?”
डॉक्टर की आवाज़ कठोर हो गई—“उसके सामने ऐसे झगड़ोगे… मारपीट करोगे… तो वह जल्दी ही मानसिक रूप से टूट जाएगा।”
फोदल कुछ पल चुप रहे, फिर बोले “हमें तो ऐसा नहीं लगता…”
डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा—“तो फिर घर जाइए… कुछ साल में परिणाम दिख जाएगा।”
यह सुनकर फोदल का चेहरा उतर गया।धीरे से बोले—“डॉक्टर साहब… आप हमारे परिवार के डॉक्टर हो… साफ-साफ बताओ।”
डॉक्टर ने गहरी सांस ली, “आपका बेटा अंदर ही अंदर डर से भर गया है। वह अपनी भावनाएँ किसी से कह नहीं पाता। माता-पिता की लड़ाई बच्चे के मन को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाती है।”
फोदल की आँखें फैल गईं, “हमें तो कभी पता ही नहीं लगा…”
डॉक्टर ने कहा—“पारिवारिक कलह केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहती। वह बच्चों की आत्मा तक को घायल कर देती है।”
कमरे में लंबी चुप्पी छा गई।फोदल सिंह की आँखें झुक गईं। उनके चेहरे पर पहली बार पछतावे की लकीरें दिखीं।घर लौटते समय रास्ते में वे धीरे-धीरे बोले—“आज से… रिंटू के सामने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करेंगे।”
उनकी पत्नी चुपचाप चल रही थीं। उन्होंने मन ही मन तय किया—“अगर फोदल नाराज़ भी होंगे… तो मैं पलटकर जवाब नहीं दूँगी।”
घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही रिंटू दौड़कर आया, “पापा आ गए!”
फोदल ने उसे कसकर गले लगा लिया। उस पल रिंटू को लगाजैसे उसके दिल में वर्षों से दबे हुए अनकहे शब्द आखिर किसी ने सुन लिए हों।
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