साहूकार
दोपहर की धूप गाँव के चौपाल पर ऐसे पसरी थी जैसे किसी बूढ़े की थकी हुई साँसें। बबूल के पेड़ की छाया में बैठे लोग चुनाव की चर्चा में डूबे थे। इसी बीच छम्मी सेठ की कोठी से बुलावा आया—“मानक को तुरंत भेजो।”
मानक उस समय अपने आँगन में टूटी चारपाई पर बैठा, फटी बनियान में पसीना पोंछ रहा था। उसकी आँखों में वही पुरानी थकान थी—गरीबी की, मजबूरी की, और सबसे ज्यादा—कर्ज़ की।
कोठी में कदम रखते ही उसे लगा जैसे वह किसी और दुनिया में आ गया हो। चमचमाता फर्श, दीवारों पर लगी तस्वीरें, और बीच में गद्दी पर बैठे छदम्मी सेठ—मोटा शरीर, गोल चेहरा और आँखों में चालाकी की चमक।
“आओ मानक…” सेठ ने मुस्कुराते हुए कहा, “बैठो… डरने की जरूरत नहीं है।”
मानक झिझकते हुए जमीन पर बैठ गया। तभी सेठ ने अपने मुनीम को इशारा किया। प्लास्टिक की थाली में खाना और पानी का लोटा सामने रख दिया गया।
“पहले खा लो… भूखे पेट बात अच्छी नहीं होती।”
सेठ की आवाज़ में मिठास थी, लेकिन भीतर कोई सख्ती छिपी हुई थी।
मानक ने धीरे-धीरे खाना शुरू किया। हर निवाले के साथ उसे अपनी बेबसी का स्वाद महसूस हो रहा था।
खाना खत्म होते ही सेठ ने साफी से मुँह पोंछते हुए कहा—“अब काम की बात करते हैं…”
कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद हो गया। मानक चौंका, लेकिन चुप रहा।
“देखो मानक…” सेठ ने थोड़ा झुककर कहा, “इस बार पंचायत की सीट रिजर्व हो गई है। हम चाहते हैं कि तुम सरपंच का फॉर्म भरो।”
मानक का दिल एकदम से धड़कने लगा। उसने सिर उठाकर सेठ को देखा।
“मैं…?” उसकी आवाज़ काँप गई।
“हाँ, तुम!” सेठ हँसा, “तुम्हारे मोहल्ले में तुम सबसे समझदार हो। और सबसे बड़ी बात… तुम हमारे अपने हो।”
मानक की आँखों में सवाल थे—“लेकिन सेठ जी… मैं ये सब कैसे…?”
सेठ ने बीच में ही रोक दिया—“तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस नाम तुम्हारा रहेगा, काम हम करेंगे। बनिया घरों के वोट, खर्चा-पानी… सब मेरा।”
थोड़ी देर खामोशी छाई रही।
“और…” सेठ ने आवाज़ धीमी की, “इसमें तुम्हें कोई काम भी नहीं करना पड़ेगा।”
मानक ने जमीन की तरफ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे।
“डरो मत…” सेठ ने नरमी से कहा, “हम सब कुछ संभाल लेंगे। पिछले तीस साल से सरपंची ठाकुरों के इशारे पर चल रही है। अब वक्त है कि वो हमारी तरफ आए।”
मानक के भीतर कुछ हिला—“लेकिन… ठाकुर साहब…?”
यह नाम लेते ही सेठ की आँखें सख्त हो गईं।
“ठाकुर साहब…” वह हल्की हँसी हँसा, “वो तुम्हारे लिए क्या हैं?”
यह सवाल सुनते ही मानक जैसे कहीं और खो गया…
बरसों पहले…
उसके पिता की मौत हुई थी। घर में चूल्हा ठंडा था, और कफन के लिए भी पैसे नहीं थे।
वह सबसे पहले छदम्मी सेठ के पास गया था, “सेठ जी… कुछ मदद कर दो…”
उसकी आँखों में आँसू थे।लेकिन सेठ ने उस दिन बिना उसकी तरफ देखे कहा था—“अभी हाथ तंग है… बाद में आना।”
उस दिन मानक का दिल टूट गया था। फिर वह ठाकुर साहब के पास गया।ठाकुर ने बिना कुछ पूछे दस हजार रुपये उसके हाथ में रख दिए थे, “ले जा… और चिंता मत कर।”
फिर धीरे से कहा था—“बस याद रखना… कभी हमारे खिलाफ खड़े मत होना।”
उस दिन से मानक की ज़ुबान जैसे गिरवी पड़ गई थी।
“क्या सोच रहे हो?” सेठ की आवाज़ ने उसे वर्तमान में खींच लिया।
मानक ने धीरे से कहा— “सेठ जी… मुझे सोचने का समय चाहिए…”
“ठीक है…” सेठ ने मुस्कुराते हुए कहा, “दो दिन में जवाब दे देना।”
घर लौटते वक्त मानक के कदम भारी थे। रास्ते में धूल उड़ रही थी, और उसके मन में विचार।
“क्या करूँ…?” वह खुद से बुदबुदाया। घर पहुँचते ही मोहल्ले के लोगो ने उसे घेर लिया ।
“मानक भाई!” रमेश ने कहा, “हम चाहते हैं कि तुम चुनाव लड़ो। इस बार हमारी बस्ती से सरपंच होना चाहिए।”
“हाँ…” किसन बोला, “अब बहुत हो गया ठाकुरों का राज!”
मानक ने सबकी तरफ देखा। उसकी आँखों में दर्द था।
“तुम लोग नहीं समझोगे…” वह धीमे से बोला।
“क्या नहीं समझेंगे?” रमेश ने पूछा।
मानक की आवाज़ भर्रा गई—“जिस दिन मैंने ठाकुर से उधार लिया था… उसी दिन मेरी ज़ुबान गिरवी पड़ गई थी…”
सन्नाटा छा गया।
“तो क्या तुम हमेशा उनके ही रहोगे?” किसन ने तीखे स्वर में पूछा।
मानक चुप रहा।
दो दिन बाद गाँव में खबर फैल गई—“ठाकुर साहब ने मानक को अपना उम्मीदवार बना दिया है!”
चुनाव प्रचार शुरू हुआ।पोस्टर लगे, नारे लगे, और हर गली में चर्चा होने लगी।लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे चल रहा था।ठाकुर के आदमी घर-घर जा रहे थे—“मानक हमारा आदमी है… वोट उसी को देना।”
दूसरी तरफ सेठ भी चुप नहीं बैठा था, लेकिन अब देर हो चुकी थी।
गिनती के दिन पूरा गाँव चौपाल पर जमा था।
“मानक… जीत गया!” घोषणा होते ही भीड़ में शोर मच गया।
लेकिन मानक के चेहरे पर खुशी नहीं थी। उसकी आँखें झुकी हुई थीं—जैसे उसने जीत नहीं, कुछ खो दिया हो।
सरपंच बन गया था मानक!
कुछ महीनों बाद…कोठी में बैठक चल रही थी। ठाकुर साहब गद्दी पर बैठे थे, और सामने मानक खड़ा था।
“ये सड़क का काम हमारे खेत की तरफ पहले होगा…” ठाकुर ने आदेश दिया।
“जी…” मानक ने सिर झुका लिया।
“और स्कूल का फंड…”
“वो भी वहीं लगेगा…”
मानक सिर्फ “जी” कहता रहा।
बाहर खड़े गाँव वाले फुसफुसा रहे थे—“सरपंच तो बदल गया… लेकिन राज वही है…”
एक शाम मानक अपने घर के बाहर बैठा था। रमेश उसके पास आया।
“कैसा लग रहा है सरपंच जी?” उसने व्यंग्य से पूछा।
मानक ने हल्की मुस्कान दी—“सरपंच नहीं… कठपुतली समझो…”
“तो तोड़ दो ये डोर!” रमेश ने कहा।
मानक ने आसमान की तरफ देखा, “डोर तब टूटती है जब हाथ मजबूत हों… और मेरी डोर तो उस दिन बंध गई थी… जब मैंने उधार लिया था…”
उसकी आँखों में नमी थी।
“कर्ज़ सिर्फ पैसे का नहीं होता रमेश…” वह बोला, “कभी-कभी आत्मा भी गिरवी पड़ जाती है…”
दूर कहीं कोठी की रोशनी चमक रही थी—और उसके साए में एक और सरपंच… धीरे-धीरे खो रहा था।
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