अंतिम इंतज़ार
गाँव के आख़िरी सिरे पर खड़ा वह मकान जैसे समय के सामने हार मान चुका था। दीवारों की पलस्तर जगह-जगह से झड़ गई थी। आँगन में लगे नीम के पेड़ की छाया दोपहर की धूप को जैसे रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
अभी थोड़ी देर पहले ही गाँव के डॉक्टर सिंह साहब वहाँ से निकलकर गए थे। उनके जाते समय चेहरे पर वही झिझक भरी गंभीरता थी, जो डॉक्टर तब ओढ़ लेते हैं जब वे जान जाते हैं कि दवा से ज़्यादा अब समय काम करेगा।
बैठक के बीचोंबीच पुरानी चारपाई पर धन्नूलाल लेटे थे।
नब्बे साल की उम्र ने उनके शरीर को सुखा दिया था। उनका चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर मूँछें अभी भी सलीके से कटी हुई थीं। माथे पर पीली पड़ चुकी गांधी टोपी पड़ी थी। गाँव में लोग उन्हें कभी “धन्नू बाबू” कहकर बुलाते थे।
उनकी आवाज़ अब कमजोर थी, मगर आँखों में अभी भी वही चमक थी जो कभी तहसील के गलियारों में बाबुओं को हिला दिया करती थी।
धन्नूलाल कभी तहसील में चपरासी थे। पर वे साधारण चपरासी नहीं थे।
तहसील के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे अक्सर किसान बैठे मिलते थे। किसी का नामांतरण अटका होता, किसी की जमीन का नक्शा फाइलों में दबा रहता।
तभी दूर से धन्नूलाल की साइकिल दिखाई देती।
“अरे आ गए धन्नू बाबू!” किसान उठकर कहते।
धन्नूलाल हँसते हुए कहते—“काहे घबराते हो भइया? तहसील है, भगवान का दरबार नहीं कि फैसला ही न हो।”
फिर वे अंदर जाकर बाबू से कहते—“क्यों भइया मिश्राजी, यह फाइल कब से दबा रखी है? बेचारे का खेत बिक रहा है।”
मिश्राजी चश्मा ठीक करते—“अरे धन्नू, इतनी जल्दी क्या है?”
धन्नूलाल मुस्कराते—“जल्दी नहीं है, पर गरीब आदमी है। दो दिन से पेड़ के नीचे बैठा है।”
फिर धीरे से फाइल बाबू के सामने सरका देते।और काम हो जाता।
इसी कारण किसान त्योहारों पर उनके घर चुपचाप गेहूँ, चना या गुड़ रख जाते। धन्नूलाल रिश्वतखोर नहीं थे, मगर मददगार जरूर थे।
तहसील में काम करते-करते उन्होंने एक बात देखी थी। जो नए-नए लड़के तहसीलदार या एसडीएम बनकर आते थे, वे बड़े पढ़े-लिखे और साधारण परिवारों के होते थे।एक दिन वे घर आकर पत्नी गोमती से बोले“सुनो गोमती, हम अपने अखिल को खूब पढ़ाएँगे।”
गोमती चूल्हे पर रोटी बेल रही थी।वह हँस पड़ी, “काहे? पंडित बनाओगे क्या?”
धन्नूलाल ने गर्व से कहा—“नहीं। तहसीलदार बनाएँगे।”
उस दिन से उनका सपना तय हो गया। उन्होंने अखिल को गाँव में नहीं रखा। कस्बे में एक कमरा किराए पर लिया और पत्नी को बेटे के साथ वहाँ रहने भेज दिया।
साल गुजरते गए। अखिल पढ़ने में तेज निकला। जब वह दसवीं पास कर चुका तो धन्नूलाल कस्बे गए। बैठक में बैठकर उन्होंने पूछा—“अब बताओ, कौन से विषय लोगे? ऐसे पढ़ना कि सीधे तहसीलदार बनो।”
अखिल ने सिर झुका लिया। वह अपने पिता से बहुत डरता था, मगर प्यार भी करता था। कुछ देर बाद वह धीरे से बोला—“पापा… एक बात कहूँ?”
“कहो।”
“पिछले पाँच साल से तहसीलदार या एसडीएम की भर्ती नहीं निकली है। जब तक मैं ग्रेजुएट होऊँगा तब भी शायद न निकले।”
धन्नूलाल ने भौंहें सिकोड़ लीं, “तो?”
“अगर आप अनुमति दें… तो मैं गणित और साइंस ले लूँ। इंजीनियरिंग कर लूँ।”
धन्नूलाल ने आश्चर्य से पूछा—“फिर तहसीलदार कैसे बनोगे?”
अखिल समझाते हुए बोला—“इंजीनियर बनने के बाद भी परीक्षा देकर एसडीएम बन सकते हैं। बहुत लोग बनते हैं।”
धन्नूलाल ने कुछ देर सोचा। फिर बोले—“ठीक है। पढ़ाई अच्छी होनी चाहिए बस।”
इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस सुनकर धन्नूलाल चुप हो गए थे। बीस बीघा जमीन थी उनके पास। एक शाम वे खेत में खड़े थे। डूबते सूरज की रोशनी में गेहूँ की बालियाँ चमक रही थीं।उन्होंने धीरे से कहा—“अखिल पढ़ जाएगा तो जमीन अपने आप बढ़ जाएगी।”
और उन्होंने पाँच बीघा जमीन बेच दी। फीस भर दी गई।
चार साल बाद अखिल इंजीनियर बन गया। एक दिन धन्नूलाल कस्बे गए।उन्होंने पूछा—“अब भर्ती निकली?”
अखिल ने कहा—“नहीं पिताजी।”
“तो?”
“अगर आप अनुमति दें… तो मैं प्राइवेट कंपनी में काम कर लूँ।”
धन्नूलाल को विश्वास नहीं हुआ। अखिल के दोस्तों ने समझाया—“चाचा, इंजीनियर को बहुत तनख्वाह मिलती है।”
एक प्रोफेसर ने भी फोन पर कहा—“आपका बेटा बहुत अच्छा इंजीनियर है।”
धन्नूलाल खुश हो गए, “ठीक है बेटा, नौकरी कर लो।”
अखिल को बेंगलुरु में नौकरी मिल गई। वह शहर की तेज रफ्तार जिंदगी में उतर गया। धीरे-धीरे उसकी तनख्वाह बढ़ने लगी। एक बार वह माँ-बाप को अपने साथ बेंगलुरु ले गया।
धन्नूलाल पहली बार इतना बड़ा शहर देख रहे थे। ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, गाड़ियों की कतारें।
फिर अखिल उन्हें घुमाने ले गया—
Hampi
Tirupati Balaji Temple
Kapila Theertham
Kalahasti Temple
मंदिरों में संस्कृत मंत्र सुनकर धन्नूलाल गदगद हो गए।
हर रात खाना खाते समय धन्नूलाल एक ही बात कहते—“बेटा, अब शादी कर लो।”
एक दिन अखिल ने झिझकते हुए कहा—“पिताजी… एक लड़की है। मेरे साथ इंजीनियर है। हम दोनों बात कर रहे हैं।”
धन्नूलाल के हाथ रुक गए, “कौन जात?”
अखिल चुप हो गया। धन्नूलाल का चेहरा कठोर हो गया, “हमारे रहते तुम अपनी मर्जी से शादी करोगे?”
अखिल ने धीरे से कहा—“पिताजी… हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”
उस रात धन्नूलाल देर तक जागते रहे। फिर अचानक बोले—“चलो गोमती, गाँव चलते हैं।”
अखिल पहले साल में एक बार आया। फिर दो साल नहीं आया।फिर खबर आई—उसने अपनी सहकर्मी अन्वीक्षा से शादी कर ली। फोन पर बोला—“पिताजी, आप बेंगलुरु आ जाइए।”
धन्नूलाल ने कठोर आवाज में कहा—“हमारी पंगत जिमाने की तैयारी थी गाँव में।”
और फोन रख दिया।
कुछ साल बाद वे बेंगलुरु गए। अन्वीक्षा लंबी, गोरी, तेज नजरों वाली लड़की थी। बाल छोटे कटे हुए थे।वह घर में ढीले झबले जैसे कपड़े पहनकर घूमती थी। सुबह दस बजे निकलती।रात नौ बजे लौटती। एक दिन अखिल ने कहा—“अन्वीक्षा, पिताजी के लिए गर्म रोटी बना दो।”
वह हँसकर बोली—“हमसे घूँघट वाली बहू की उम्मीद मत कीजिए।”
धन्नूलाल स्तब्ध रह गए। उस दिन से गोमती ही खाना बनाने लगी।
एक दिन गोमती ने धीरे से बहू से कहा—“बिटिया… अब बच्चा कर लो।”
अन्वीक्षा भड़क गई, “हमें अगले साल विदेश जाना है। अभी बच्चे का झंझट नहीं चाहिए।”
फिर उसने अखिल से कहा—“अपने देहाती पिता से कहो हमारा पीछा छोड़ें।”
धन्नूलाल का दिल टूट गया।
कुछ साल बाद खबर आई— अखिल और अन्वीक्षा ऑस्ट्रेलिया चले गए।
अब कभी-कभी ही वीडियो कॉल होता। गाँव के सरपंच अजबसिंह के मोबाइल पर।
किसी ने कहा—“उनकी बेटी हुई है।”
किसी ने कहा—“किराए की कोख से।”
धन्नूलाल चुप रह गए।
समय गुजरा... वे वृद्ध हुये... कम्जोर होते गये... अब कई दिनों से उन्होंने खाना छोड़ दिया था।
वह बस एक ही बात कहते—“अखिल आ जाएगा… तब खाएँगे।”
पर अखिल नहीं आया। एक दिन उन्होंने सरपंच अजबसिंह को बुलाया। कमरे में पाँच लोग बैठे थे। धन्नूलाल ने कमजोर आवाज में कहा—“मेरी बात लिख लो।”
सब चौंक गए।
“मेरी जमीन… स्कूल बनाने के लिए पंचायत को दान कर दी जाए।”
अजबसिंह हड़बड़ा गया—“काका! ऐसा क्यों?”
धन्नूलाल की आँखें भर आईं, “जिस बेटे के लिए जमीन बेची… वही नहीं आया।”
उन्होंने काँपते हाथ से वसीयत पर दस्तखत कर दिए।
दो दिन बाद धन्नूलाल की साँसें रुक गईं। सेवकराम ने फोन पर अखिल को खबर दी। अखिल चुप रहा। अन्वीक्षा बोली—“उन्होंने आपको बेटे के पद से अलग कर दिया है। अब जाने की जरूरत क्या है?”
अखिल उलझन में था। तभी सरपंच अजबसिंह का फोन आया। उसकी आवाज भारी थी—“बेटा… बाप-बेटे का रिश्ता कोई पद नहीं होता। दोनों एक-दूसरे की कॉपी होते हैं। एक ही डीएनए, एक ही खून।”
कुछ क्षण चुप्पी रही।फिर अजबसिंह बोला— “पिता वंश की जड़ होता है। जड़ से रिश्ता खत्म नहीं होता।”
फोन कट गया। अखिल की आँखों में आँसू आ गए। वह धीरे से बोला—“अन्वीक्षा… हम गाँव चलेंगे।”
अन्वीक्षा ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। और शायद पहली बार समझा—कि कुछ रिश्ते आधुनिकता से बड़े होते हैं।
और गाँव में…नीम के पेड़ के नीचे, धन्नूलाल की चारपाई अब खाली पड़ी थी। उनका अंतिम इंतज़ार खत्म हो चुका था।
---