गंगा मइया की लहरों की कलकल ध्वनि के बीच, अस्सी घाट के करीब स्थित प्राचीन शिव मंदिर में आज भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा था। हवा में चंदन और फूलों की भीनी-भीनी खुशबू घुली हुई थी। मंदिर का गर्भगृह हर-हर महादेव के उद्घोष से गूँज रहा था। आज सोमवार का दिन था, और महादेव का विशेष अभिषेक चल रहा था। मुख्य पुजारी मंत्रोच्चारण कर रहे थे, और उनकी आवाज़ मंदिर की दीवारों से टकराकर एक दिव्य वातावरण बना रही थी:
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।"
जैसे ही मंत्र पूर्ण हुआ, सभी भक्तों ने भक्तिभाव से तालियाँ बजायीं। तालियों की गड़गड़ाहट और मंदिर के बाहर बजते नगाड़ों, ढोल-ताशों की आवाज़ ने पूरे वातावरण को गुंजायमान कर दिया। हर कोई भगवान शिव की भक्ति में लीन था।
तभी, भीड़ को चीरता हुआ एक नवविवाहित जोड़ा मंदिर में दाखिल हुआ। दूल्हा सुनहरी शेरवानी में और दुल्हन लाल जोड़े में बेहद खूबसूरत लग रहे थे।
पंडित जी ने उन्हें देखते ही मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया और कहा, "नवदंपति, पहले महादेव से आशीर्वाद लें।"
जोड़ा जैसे ही शिवलिंग की ओर बढ़ा, मंदिर के एक कोने में बैठी एक विधवा औरत ने एक दिया जलाने के लिए हाथ बढ़ाया। वह औरत सफेद साड़ी में थी, और उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और उदासी थी।
लेकिन, जैसे ही उसने दिया जलाने की कोशिश की, दूल्हे की माँ ने उसे रोक दिया। दूल्हे की माँ का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "इस विधवा को किसने दिया जलाने के लिए कहा? आज मैं अपनी नई बहू को शिवजी के दर्शन करने के लिए लाई हूँ, और यहाँ तू बैठी है अभागी! निकल जा यहाँ से!"
उनके शब्द मंदिर की शांति को भंग कर रहे थे। उन्होंने आगे कहा, "मैं अपने बेटे के वैवाहिक जीवन में किसी विधवा की आंच नहीं लगने दे सकती!"
विधवा औरत सन्न रह गई। उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने धीरे से कहा, "मेरा ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था, माँ जी। मैं तो बस..."
लेकिन दूल्हे की माँ ने उसकी बात काट दी। वहां खड़े लोग भी कानाफूसी करने लगे। कोई कह रहा था, "छी-छी! यह बहुत बुरा शगुन है।"
कोई दूसरा बोल रहा था, "नए जोड़े का पहला शिव दर्शन अशुभ हो गया।"
एक और आवाज़ आई, "विधवा है तो क्या हुआ? घर में नहीं पड़ी रह सकती? पति को तो जिंदा रख नहीं पाई, बड़ी आई पूजा करने। घोर अपशगुन! इसकी वजह से तो पूरा काम खराब हो गया।"
विधवा औरत की आँखों से आँसू बहने लगे। वह बिना कुछ कहे अपनी पूजा की थाली उठाकर मंदिर से बाहर निकलने लगी। उसका दिल टूट गया था। जैसे ही वह मंदिर की सीढ़ियों से उतरने लगी, उसका पैर फिसल गया और उसकी पूजा की थाली जमीन पर गिर पड़ी। थाली में रखे फूल, अक्षत और सिंदूर जमीन पर बिखर गए। यह देखकर लोग और भी ज़्यादा भड़क गए।
विधवा औरत रुआँसी होकर अपनी बिखरी हुई थाली को समेटने लगी। उसकी आँखों से आँसू जमीन पर गिर रहे थे।
जयपुर - रुद्र प्रताप सिंह का आगमन
उसी वक्त, वाराणसी के घाटों से दूर, जयपुर की गुलाबी नगरी में एक और शिव मंदिर में हलचल हो रही थी। चारों ओर कुंवर सा की जय-जयकार गूँज रही थी। "कुंवर सा की जय हो! कुंवर सा की जय हो!"
मंदिर के पुजारी ने मंत्रोच्चारण शुरू किया: "ओम नमो भगवते रुद्राय नमः।"
कुंवर रुद्र प्रताप सिंह ने मंदिर में प्रवेश किया। वह ऊँचे कद-काठी के, रौबीले चेहरे वाले और राजसी पोशाक में बेहद प्रभावशाली लग रहे थे। रुद्र प्रताप सिंह अपने दिन की शुरुआत भोलेनाथ की आराधना से ही करते हैं।
उन्होंने शिवलिंग के सामने झुककर प्रणाम किया और मन ही मन कहा, "हर हर महादेव! महादेव, आप तो सर्वज्ञानी हैं। आपसे कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।"
उन्होंने आगे कहा, "दादी ने मुझसे कसम ली है कि इस साल मुझे अपने बिजनेस से ध्यान हटाकर अपनी शादी के बारे में सोचना होगा। और आप जानते हैं, मैं उन्हें ना नहीं कर पाता हूँ। मुझे इस दुविधा से बचा लीजिए।"
शिवजी के दो अटल भक्त - एक बनारस में, तो दूसरा जयपुर में। देखिए कैसे उनकी भाग्य रेखाएं इनको मिलाती हैं।
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(क्रमशः)