उस ढलती हुई रात को भोर होने से पहले जमुना देवी की चीख ने मोहल्ले वासियों की नींद तोड़ दी। उसका करुण क्रंदन सर्द रात की हवा के झोंके के साथ मानों खिड़कियों के शीशे तोड़कर शयनकक्षों तक पहुंच गया था। धीरे-धीरे सुगबुगाहट शुरू हुई, लोग बाहर निकलने लगे तो पता चला कि मेरे पड़ोस में रहने वाला नीलेश गुजर गया है। एक दिन पहले ही सीने में दर्द उठा था, शायद हार्ट अटैक रहा होगा। जमुना देवी की आंख का तारा कहीं अचानक डूब गया था, गुम हो गया था कहीं घने अंधेरे में। उसके तीन छोटे-छोटे से बच्चे अनायास ही दादी के साथ चीत्कार कर उठे थे, जिनके रुदन ने पेड़-पौधों तक को रुला दिया था। शायद वे हवा के झोंकों से नहीं, उनके करुण क्रंदन की कंपन से कांप रहे थे।
लोग एकत्रित होने लगे थे, मृत शरीर अभी अस्पताल में ही था। नीलेश की पत्नी सुमन उसके साथ थी। घर पर अम्मा को शायद किसी मिलने वाले ने फोन पर नीलेश के बारे में सूचना दी थी। मेरे घर के सामने की लाइन में एक घर छोड़कर नीलेश का घर था। मेरे बचपन का साथी, मेरा सहपाठी, लेकिन अब ज्यादा घनिष्ठता नहीं रह गई थी। शायद आजकल के हिसाब से हमारा स्टेटस अलग-अलग हो गया था। मैं छोटा सा अधिकारी बन गया था और नीलेश स्वयं की एक टैक्सी चलाता था। कभी हमारे दोनों के पिताजी किसी एक ही प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जीटीएल (GTL) में काम करते थे। दोनों को उस समय ठीक-ठाक वेतन मिलता था। इस कॉलोनी में मकान भी साथ ही खरीदा था। तब हम दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। उससे दो वर्ष पहले ही पिताजी हमको मम्मी के साथ शहर लेकर आए थे। उससे पहले का बचपन गांव के सरकारी स्कूल में अध्ययन करते ही बीता था। नीलेश का परिवार पहले से ही शहर में रहता था। दोनों ने जब यहां मकान लिए थे, तो हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ने जाया करते थे।
हम आमने-सामने के तीन-चार पड़ोसी उसके घर पहुंच गए। उसकी मां गला फाड़-फाड़ कर बेटे को पुकार रही थी। बच्चे दादी से लिपटे हुए हिचकियां लेकर रोए जा रहे थे। हृदय विदारक दृश्य था । क्या कहें, कैसे समझाएं कि सब ठीक हो जाएगा। सब कुछ सजीव-निर्जीव, कण-कण में वहां शोक संतृप्त था। एक पड़ोसन ने जमुना देवी के सिर को अपनी छाती से लगाकर ढांढस बंधाना चाहा, लेकिन कोई भी उनको इस समय सांत्वना देने में असमर्थ था।
भोर होने लगी थी, वैसे भी मोहल्ला जाग गया था। लेकिन वहां हम तीन लोग ही लॉबी में खड़े थे—मैं, हरनारायण चाचा और उनकी पत्नी, जो जमुना देवी को पकड़े उसके पास बैठी थी (जो उसके सामने वाले घर में रहते थे) और सत्यनारायण चाचा, जो उसके बगल वाले घर के निवासी थे। हम आकर घर के बाहर मुख्य दरवाजे की सीढ़ियों पर बैठ गए। गली में लोग बाहर तो निकल आए थे, सबको संज्ञान भी हो गया था कि नीलेश गुजर गया है, लेकिन अभी उसके घर नहीं आ रहे थे। शायद मृत शरीर का अस्पताल से आने का इंतजार कर रहे थे। पता नहीं उसको आने में कितना समय लग जाएगा। "अभी से पहुंच गए तो फिर वहीं रुकना पड़ेगा", क्योंकि आज भी हमारे यहां परंपरा है कि शोक वाले घर पहुंचकर दाह संस्कार से पहले वहां से लौटा नहीं जाता है।
एक-दो की तो मेरे मोबाइल पर कॉल भी आने लगी थी—"अरे डेड बॉडी कब तक आ जाएगी?", "उसकी मौत कैसे हुई?" कोई पूछ रहा था—"हार्ट अटैक आया था क्या? आत्महत्या का तो मामला नहीं है? अक्सर दोनों पति-पत्नी झगड़ते रहते थे।" कोई पूछ रहा था—"असली मामला क्या है, स्वाभाविक मौत हुई है या कुछ और? जनाजा उठाने में तो अभी वक्त लगेगा शायद, डेड बॉडी कब तक आने को है?" आदि-आदि। जैसे उसके घर आने से पहले पूरी तथ्यात्मक जानकारी कर लेना चाहते थे। जैसे उसके दाह संस्कार में शामिल होने से पहले पूर्णतया संतुष्ट हो लेना चाहते थे कि कोई पुलिस वगैरह का मामला तो नहीं बनता, कहीं उनको कोई साक्ष्य बयान देने कोर्ट तक जाना पड़े। जैसे दाह संस्कार में उनका ज्यादा समय बर्बाद न हो जाए। जैसे उनके दिल मानवीय संवेदनाओं से शून्य थे, केवल दिमाग औपचारिकताएं निभाने का अभ्यस्त था। जैसे उसका दाह संस्कार करना उनकी दिनचर्या में अचानक एक अतिरिक्त काम बढ़ गया था।
चिड़चिड़ाकर परेशान होते हुए मैंने मोबाइल स्विच ऑफ कर लिया। सोच रहा था समय कितना बदल गया है। मुझे याद है गांव में जब पड़ोस में रहने वाले मुरली ताऊजी मरे थे, तो पल भर में सारा गांव इकट्ठा हो गया था। पूरे मोहल्ले में चूल्हे नहीं जले थे। दाह संस्कार होने तक हमारे जैसे छोटे-छोटे बच्चे भूखे डोलते रहे थे। पूरे गांव में जैसे गम का अंधेरा छा गया था। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा, क्या जवान—जैसे सारा गांव श्मशान पहुंच गया था। हर कोई कह रहा था—"बहुत भले आदमी थे, अभी उम्र ही क्या थी, 65 के भी नहीं हुए थे।" कोई कह रहा था—"भाई, भले आदमी की भगवान को भी ज्यादा जरूरत होवे है, तभी ऐसे आदमी को भगवान जल्दी बुलावे है।"
नीलेश पढ़ने में ज्यादा होशियार नहीं था, औसत विद्यार्थी था जो जी लगाकर पढ़ाई भी नहीं करता था। उसकी रुचि खेल-कूद में ज्यादा थी। लेकिन उसके पापा उसको खेलने-कूदने की अनुमति कम ही देते थे और कहते—"ये गुल्ली-डंडे मारते रह जाओगे। अभी बस खेल-कूद में मस्त रहता है, जिंदगी भी खेल बन जाएगी, दर-दर की ठोकरें खाएगा। कुछ ध्यान लगाकर पढ़-लिख लेगा तो कोई ढंग की नौकरी मिल जाएगी, वरना जिंदगी भर पछताना पड़ेगा।" वह पापा की डांट खाकर उनके सामने किताब लिए बैठा रहता था। क्रिकेट बहुत अच्छे से खेलता था। अक्सर जब भी हमें खेलने का मौका मिलता, हर कोई उसको अपनी टीम में लेना चाहता था। हमारे स्कूल का सबसे तेज गेंदबाज विक्रम, जिसे हम उस समय 'मैल्कम मार्शल' (वेस्टइंडीज के खिलाड़ी) के नाम से पुकारते थे, वह बस नीलेश से दबता था। और नीलेश था कि उसकी गेंद को हवा में ऐसे उड़ाता था कि सीमा रेखा के बाहर दिखाई देती थी। पता नहीं उसकी आंखें ज्यादा तेज थीं या गेंद उसके लिए फुटबॉल जैसी बन जाती थी। वरना हमें तो उसकी गेंद दिखाई ही नहीं देती थी और मेरी तो कभी-कभी आंखें ही बंद हो जाती थीं, बस यूं ही हवा में बल्ला घुमा देता था—भगवान भरोसे गेंद विकेट छोड़कर निकल जाए तो ठीक, वरना वापस।
लेकिन उस समय खिलाड़ियों को आज की तरह मौके नहीं मिलते थे। मुश्किल से ही किसी खिलाड़ी की किस्मत चमकती थी। ऊपर से पापा ने भी उसको कभी इसकी आजादी नहीं दी। नतीजा यह निकलता कि नीलेश कम नंबरों के साथ ही पास हो पाता था और उसके पिताजी उसको मेरा उदाहरण दे-देकर इतना कोसते थे कि कई दिनों तक वह मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करता था। मैं उससे कहता—"भाई मेरी क्या गलती है? मेरे अच्छे अंक आते हैं तो, मैं मेहनत करता हूं, तू भी किया कर।" "तेरी गलती नहीं, तेरे पापा की गलती है, मेरे पापा को कंपनी में बड़े बखान करके जो तेरे अंकों की प्रशंसा की होगी।" फिर कई दिनों बाद हमारी दिनचर्या सामान्य हो पाती।
वक्त गुजरता गया, हम दोनों ने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे अंकों के साथ और नीलेश ने तृतीय श्रेणी के साथ। मैंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर परीक्षा हेतु यहां विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया, साथ ही राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा हेतु तैयारी शुरू कर दी। नीलेश के कम अंक होने के कारण उसको राजकीय कॉलेज में दाखिला नहीं मिला, इसलिए उसके पापा ने प्राइवेट कॉलेज में प्रवेश दिलवा दिया और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए उसकी कोचिंग लगा दी। 2 वर्ष में ही मेरा पीएससी (PSC) से चयन हो गया और नीलेश का कोई ठिकाना नहीं था।
उसके पापा ने उसकी भावी जिंदगी का अपने हिसाब से आकलन करते हुए शायद सोचा होगा कि बाद में कोई ढंग का रिश्ता भी नहीं मिलेगा, तो सुमन और उसका परिवार देखकर जैसे-तैसे रिश्ता ठीक कर लिया और बेरोजगार रहते हुए ही उसकी शादी करवा दी। वैसे भी उन दिनों के हिसाब से हमारी उम्र शादी की आवश्यकता से कुछ ज्यादा ही हो गई थी। मुझे अक्सर यह लगता था कि हमारी जिंदगी का रूप हमारे कर्मों का ही प्रतिफल होता है—जैसा हम बोते हैं, वैसा हम काटते हैं। लेकिन कई घटनाएं या कई हादसे ऐसे होते हैं कि हमारी जिंदगी का रुख ही बदल देते हैं और लगने लगता है कि हमारे जीवन की डोर किसी और के ही हाथ में है। शेक्सपियर की रचना 'As You Like It' का वह पद 'All the world's a stage' याद आने लगता है कि सारा संसार एक रंगमंच है और हम सब इस पर भूमिका निभाने वाले पात्र। हमारा नियंता, सूत्रधार कोई और ही है जो हमारी भूमिकाएं तय करता है। हम में से कई अपनी भूमिका पर अभिमान करते हैं, कई जिनको इस संसार रूपी रंगमंच पर ज्यादा अच्छी भूमिकाएं नहीं दी गई हैं, वे उस सूत्रधार को जीवन भर कोसते हैं और जब बहुत निराश हो जाते हैं तो उसी की शरण में जा पहुंचते हैं। कई बार वह नियंता हमारी जिंदगी को इस तरह पलट देता है कि लगता है हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं।
ऐसा ही एक हादसा नीलेश के जीवन में भी घटित हुआ। विवाह के 1 वर्ष बाद ही उसके पापा की असमय मृत्यु हो गई। घर में कोहराम मच गया। नीलेश का जीवन संघर्ष बढ़ता गया। कठिनाइयां थीं कि एक के बाद एक बढ़ती ही जाती थीं। समस्याएं हैं कि हवा की तरह, लाख दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लो, बिन बुलाए घर के अंदर प्रवेश कर ही जाती हैं। पापा प्राइवेट कंपनी में काम करते थे, इसलिए पेंशन का तो प्रावधान ही नहीं था। मरने पर पीएफ व ग्रेच्युटी आदि की जो थोड़ी-बहुत रकम मिली, उससे छोटी बहन की शादी करना ही मुश्किल हो रहा था। बचाकर ज्यादा कुछ छोड़ा नहीं था, जो बचाया था वह भी साल भर पहले नीलेश की शादी में खर्च कर दिया था। हम जैसे निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की कमोबेश ऐसी ही स्थिति होती है। एक हाथ बुनते है और दो हाथ फटता है। कहते हैं—"उतने ही पैर पसारिए जितनी लंबी चादर होती है", लेकिन चादर ही फटने लगे तो पैर कहां तक सिकोड़ियेगा? इसका कोई समाधान नहीं सूझाता था। ऐसी बात नहीं कि उसके पापा ने अब तक कुछ किया नहीं—ढंग की कॉलोनी में मकान खरीद लिया, चारों भाई-बहनों को यथा सामर्थ्य खूब पढ़ाने-लिखाने की कोशिश की, दो बड़ी बहनों की शादी भी अपनी औकात से अच्छी ही की थी। केवल एक छोटी बहन रह गई थी, जो अब शादी के लायक उम्र की थी। नीलेश को जीवन की राह बड़ी कठिन लगने लगी। कई जगह प्राइवेट फैक्ट्रियों में, फर्मों में काम करने की कोशिश की, लेकिन जो तनख्वाह वे देते थे उसमें घर खर्च भी मुश्किल हो रहा था। बाबूजी के फंड के पैसों में से मां ₹1 खर्च नहीं करना चाहती थी, कहती—"बबीता की शादी कहां से करोगे? पढ़े-लिखे हो, घर-गृहस्ती का जुगाड़ तो करना सीखो।" और नीलेश को कोसती रहती। इसी बीच भगवान ने उसकी समस्या और बढ़ा दी, सुमन ने बेटे को जन्म दिया। पोते की खुशी में जमुना देवी फूली नहीं समाई, लेकिन यह खुशी कुछ ही पलों की मेहमान थी। धीरे-धीरे घर की और बेटे की आवश्यकताओं को लेकर सुमन चिड़चिड़ी सी होने लगी, नीलेश से बात-बात पर झगड़ने लगी।
नीलेश को कोई उपाय नहीं सूझता था। आखिर उसने सोचा कि पहले बबीता की शादी कर जिम्मेदारी से मुक्त होवे, फिर आगे की सोचेगा। कुछ दिन इधर-उधर घूमकर एक ठीक से परिवार में रिश्ता तय किया और पापा के फंड के पैसों से व कुछ यार-दोस्तों से उधार लेकर उसकी शादी कर दी। अब कम से कम मां के दिमाग का बोझ हल्का हो गया। बच गया सिर्फ घर-गृहस्थी के जुगाड़ के बारे में सोचना। खूब धक्के खाने के बाद नीलेश को समझ आ गया कि कोई फैक्ट्री या फर्म की तनख्वाह से उसकी गृहस्थी की खींचतान नहीं मिटेगी, क्यों न खुद का कोई काम-धंधा किया जाए। लेकिन उसके लिए धन की जरूरत थी और वही तो नहीं था उसके पास। यार-दोस्तों से पहले ही उधार ले रखा था। वैसे भी आजकल यार-दोस्त काफी सयाने हो गए हैं, किसी की मदद करने से पहले 100 बार सोचते हैं कि सामने वाले की औकात क्या है, रकम वापस भी लौटा सकेगा या नहीं। खूब समझकर जेब से पैसे निकालते हैं। और बेचारे नीलेश की औकात का आकलन दुनिया ने ऐसा कर लिया था कि उधार के नाम पर कोई फूटी कौड़ी देने को तैयार नहीं था। आखिर एक उपाय सूझा, मां को किसी तरह मनाया और मकान के कागजात गिरवी रखकर एक टैक्सी खरीद ली।
नियत में खोट नहीं था, निकम्मा भी नहीं था, तो विनम्रता के साथ मेहनत की। वैसे भी परिस्थितियां मनुष्य को विनम्र और अभिमानी बना देती हैं। सो उसके टैक्सी चलाने के काम से ठीक से बरकत होने लगी थी। घर खर्च निकल आता था, न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति होने लगी, घर में कुछ शांति भी रहने लगी। सुमन ने एक के बाद एक, फिर दो बेटियों को जन्म दिया। तीन बच्चे हो गए थे। न्यूनतम आवश्यकताओं की भी अपनी परिभाषा होती है, जो आदमी की औकात व उसकी आमदनी के हिसाब से बदलती रहती है। और हर व्यक्ति इस परिभाषा को बदलने के लिए बेताब रहता है। "भीख मांगने वाले उस भिखारी के लिए पेट भरना न्यूनतम आवश्यकता है, तो निम्न मध्यम वर्गीय व्यक्ति के लिए बच्चों की अच्छी शिक्षा और खुद का मकान, तो धनी वर्ग के लिए लग्जरी गाड़ी और पॉश कॉलोनी में बड़ा सा मकान......!" आदि-आदि।
नीलेश के परिवार की न्यूनतम आवश्यकताएं भी अपने पैर चादर से बाहर निकालने के लिए छटपटाने लगीं। तीन बच्चों का पालन-पोषण, आगे पढ़ाई-लिखाई की चिंता सुमन को वापस चिड़चिड़ेपन की ओर लौटा रही थी और नीलेश को किसी घुन की तरह अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। लेकिन वह क्या करे? कुछ बड़ा काम कैसे करे? मुश्किल से अब तक टैक्सी की किश्तें पूरी कर पाता था। पता नहीं सुमन ने कैसे जुगाड़ बैठाया—या जानकारी की, शायद उसके पापा ने मदद की होगी—उसने एक कॉल सेंटर पर नौकरी ले ली। जमुना देवी कतई नहीं चाहती थीं, बोलीं—"बहू, तुम नौकरी करोगी तो घर कौन संभालेगा? तीन बच्चे हैं, उनकी देखभाल कैसे होगी?"
"अभी जो हो रही है उसे आप अच्छी देखभाल कहती हो क्या मम्मी? बच्चों को संभालने का मतलब सिर्फ उनका पेट भरना नहीं है, और भी चीजें होती हैं जिंदगी में। और फिर मैं संभाल लूंगी, सुबह खाना बनाकर जाया करूंगी और शाम को आकर बना दिया करूंगी।" एक ही सांस में जैसे सुमन ने सारे तर्कों को खारिज कर दिया और कुर्सी पर बैठे नीलेश को भी जैसे अपने दृढ़ इरादे का एहसास करा दिया।
"बहू, और भी कई काम होते हैं, खाना बनाना ही तो एक काम नहीं है?" " थोड़ी-बहुत टहल-चाप आप भी कर लोगी तो कुछ घिस नहीं जाएगा, हाथ-पैर चलते रहेंगे तो आपके लिए भी अच्छा ही है।" सुमन ने सासू जी को फिर से पस्त करते हुए तपाक से जवाब दिया।
"हां, वह मैं जानती हूं। तुम्हे मेरी कितनी चिंता है.....?" खिसियाते हुए जमुना देवी ने बोला।
"हां, मुझे चिंता कहां है, यह सब मैं मेरे लिए ही तो कर रही हूं! घर के लिए, बच्चों के लिए, तुम्हारे लिए थोड़े ही कर रही हूं। मेरा ही तो नहीं भरता इस घर में पेट ...!" सुमन जैसे पूरी तैयारी के साथ अपना केस लड़ रही थी।
"बहू तुम बात को उल्टा ले जा रही हो।"
"तो तुम बता दो सीधा कैसे करूं? क्या यूं ही दो-दो पैसे के लिए तरसते रहें? तुम्हें पता है गली में जब आइसक्रीम बेचने वाला आता है, तो मैं टीवी की आवाज तेज कर देती हूं ताकि बच्चों को उसकी घंटी की आवाज सुनाई न पड़े। और गलती से सुनाई दे जाती है, तो छुटकी कन्नु, रेलिंग पर झुककर उसकी तरफ कैसे हसरत भरी निगाहों से देखते हैं, उनकी आंखों में जाकर देखा है कभी.... ?"
नीलेश इस बहस का मूक दर्शक बना रहा और चाहते हुए भी सुमन के तर्कों को काटने के लिए उसके पास कोई तर्क नहीं था। और न चाहते हुए भी अनमने मन से उसको सुमन की नौकरी के लिए सहमति देनी पड़ी। नीलेश के जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ। सुमन जल्दी खड़ी होती, सुबह सबका खाना बनाती। शुरू में बर्तन, झाड़ू-पोछा सभी फटाफट करने की कोशिश करती। बेटा कुणाल और छोटी बेटी किरण स्कूल जाने लगे थे, उनको तैयार करती। छोटी कनिका अभी ढाई साल की थी, उसके दिन की जिम्मेदारी सासू मां को सौंप दी थी। और फिर तैयार होकर काम पर निकल जाती। नीलेश भी अपना टिफिन लेकर, बच्चों को स्कूल छोड़ते हुए टैक्सी लेकर निकल जाता। दोपहर में उनको दादी मां ही लेकर आतीं।
किंतु सभी कुछ इतना सहज कहां होता है जिंदगी में। कुछ दिनों में ही सुमन का जोश ठंडा होने लगा था, या कहें कि हिम्मत थमने लगी थी, या समझें कि वह पढ़ी-लिखी आधुनिक नारी के विचारों से अवगत होने लगी थी, उसकी जीवन शैली से रूबरू होने लगी थी। एक दिन नीलेश से बोली—"नीलेश, मैं कोई मशीन हूं क्या? तुम भी जब घर पर होते हो तो मेरी घर के काम में मदद किया करो। और मां जी को कहो, मैं अकेली कहां तक करूं?"
"क्यों, सभी कुछ तुम अकेली कर रही हो क्या? मेरा दिन यदि घर से शुरू हो जाए तो गनीमत है, रात का ठिकाना नहीं, 10-10 घंटे लगातार गाड़ी चलानी पड़ती है।"
"किसने कहा था तुमसे टैक्सी ड्राइवर बनने की? वैसे भी मेरे ऑफिस में सभी सहेलियां टैक्सी ड्राइवर पति का नाम सुनकर नाक-भौंह सिकोड़ती है।"
"तो तुम बताती क्यों हो? तुम्हारा ऑफिस तो जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोई कंपनी है और तनख्वाह देते हैं 8000, जिसमें से 2000 तुम अपने ऊपर खर्च कर लेती हो। सब पता है मुझे कॉल सेंटर्स का।"
"क्या पता है? टैक्सी ड्राइवर की क्या इमेज है पता है? सारे फटीचर ऐब होते हैं उनमें, इसलिए घर खर्च भी नहीं चलता।"
"होते होंगे, मुझमें क्या ऐब है बताओ जरा? शराब-सिगरेट पीता हूं, जुआ खेलता हूं, दूसरी औरतों के साथ वक्त बिताता हूं? या फिर तुम्हारी तरह बन-ठन के मैं ही खर्च करता हूं? " "इसकी औकात नहीं है तुम्हारी वरना क्या पता...?" सुमन कहकर चुप हो गई और नीलेश के हृदय में उसकी बातें शूल की तरह फंसकर रह गईं।
बहस, जो काम में मदद को लेकर शुरू हुई थी, उसने दूसरा ही मोड़ ले लिया था। अक्सर यही होता है, जब व्यक्ति आवेश में होता है तो दिमाग यह नहीं सोचता कि क्या कहना चाहिए, कैसे शब्दों का चयन करना चाहिए और फिर क्रोध में वही निकल जाता है जो अब तक दिल के किसी कोने में छुपा कर रखा था या दिमाग से दबाकर रोक रखा था। नीलेश ने दिल से कहां स्वीकार किया था उसकी नौकरी को ? ऊपर से साथी उसको कॉल सेंटर पर काम करने वाली महिलाओं-लड़कियों के बारे में तरह-तरह के किस्से सुनाते थे। कई तो उसका मजाक भी उड़ाते थे और कहते—"अरे भाई! अब नीलेश को क्या चिंता है, भाभी जी ने कॉल सेंटर पर नौकरी जो कर ली है।" कोई कुछ कहता, कोई कुछ। और ये बातें नीलेश को नागवार लगतीं। कभी किसी को जवाब दे देता, कभी नहीं भी दे पाता क्योंकि मन ही मन वह सुमन की नौकरी को स्वीकार नहीं कर पाया था। खिन्न सा रहने लगा था, अपने आप को बेबस और लाचार सा महसूस करने लगा था। कोई अनजाना सा अवसाद, बेजुबां सा तनाव दिल में घर किए जा रहा था। हम चाहे लाख आधुनिक बनने का दिखावा करते हैं, महिलाओं के बराबर हक की बात करते हैं, प्रत्येक कार्यक्षेत्र में उन्हें भागीदार बनाने का दावा करते हैं, लेकिन आज भी हमारे समाज की दकियानूसी परंपराएं हमारा पीछा कहां छोड़ती हैं? जिनकी जड़ें निम्न मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग में कुछ ज्यादा ही गहरी हैं। ऐसी कामकाजी महिलाओं को हम दिल से बहुत अच्छी तरह से कहां अपना पाते हैं?
परिवार की शांति फिर बिखरने लगी। उस दिन तो बवाल ही मच गया जब सुमन ने रात्रि शिफ्ट (Night Shift) में काम करने की बात कही। "नीलेश, एक सप्ताह मुझे रात्रि शिफ्ट में ड्यूटी करनी पड़ेगी।"
"तुम्हारा दिमाग खराब है?" नीलेश जैसे एकदम उबल पड़ा।
"सभी को बारी-बारी से करनी पड़ती है, इसमें ज्यादा बड़ी बात क्या है? मैं वहां अकेली ड्यूटी करूंगी क्या?" सुमन ने भी तल्खी से पलटकर जवाब दिया।
"तो छोड़ दो ऐसी नौकरी! जितना कमाऊंगा उसी से काम चलाएंगे।" नीलेश तमतमा उठा जैसे कई महीनों की गैस पेट से मुंह के जरिए निकालने को बेताब थी।
"क्या काम चलाओगे? अभी बच्चों का प्रवेश भी ढंग के स्कूल में नहीं करवा पाए हो।"
"तो जरूरी है क्या? बहुत बड़े स्कूल में पढ़ने से ही बड़े अफसर बनते हैं क्या?" " तुम्हारे लिए जरूरी क्या है बताओ जरा?" उसकी तेज आवाज सुनकर जमुना देवी बीच में आ गई और बोली—"बहू यह ठीक नहीं है। रात को बच्चों का भोजन, रसोई समेटना, फिर बच्चों के पास रहना जरूरी है।"
"क्या जरूरी है मां जी, मैं अच्छी तरह समझती हूं। 10-10 रुपये के लिए मुंह देखा है मैंने!"
बच्चे सहमी-सहमी निगाहों से तीनों के चेहरों को देख रहे थे। उनको समझ नहीं आ रहा था कि झगड़े का असली मुद्दा क्या है। खैर, सुमन की जिद के आगे नीलेश को झुकना पड़ा। उस दिन के बाद वह बिल्कुल सहज नहीं रहा, जैसे दिल पर कोई बोझ रख लिया था। सुमन रात्रि ड्यूटी जाने लगी। नीलेश के मन में कोई बिन बुलाई सी शंका अपनी जड़ें गहरी करती जाती थी।
मुश्किल से उस प्रकरण को गुजरे साल भर भी नहीं हुआ था कि आज यह दिन देखने को मिला। कोई बीमारी नहीं थी उसको, कोई गलत आदत भी नहीं (शराब, सिगरेट, गुटका आदि की)। मेरी आजकल ज्यादा बात भी नहीं होती थी, कभी सामने पड़ गए तो नमस्कार हो जाती थी। कहां गलती हो गई उससे या उसके परिवार से? या विधाता ही कोई चूक कर बैठा था? सुना है ऊपर वाला सबका हिसाब रखता है, फिर उसका खाता ही क्यों गड़बड़ा गया? कम से कम भगवान ने बच्चों का तो ख्याल किया होता।
मृत शरीर को लेकर सुमन अस्पताल से आ गई थी। रो-रोकर शायद उसकी आंखें लाल होकर पथरा सी गई थीं। यार-रिश्तेदार, मोहल्ले के लोग इकट्ठा हो गए थे। कफन-काठी का इंतजाम करने लगे। मर्मभेदी रुदन और कोहराम की चीखें दूर तक माहौल को गमगीन बनाने का प्रयास कर रही थीं। लेकिन लोगों के चेहरों से ऐसा कम ही दिख रहा था कि उनके हृदय में कोई गहरा दुख हो रहा हो। यह तो सभी कह रहे थे—"भाई, बहुत बुरा हुआ, उम्र ही क्या थी उसकी, कोई सोच नहीं सकता। पता नहीं भगवान का क्या न्याय है", आदि-आदि।
आनन-फानन में ही सबको पता चल गया कि नीलेश को दो दिन पहले सीने में दर्द हुआ था, जिसे वह सामान्य मांसपेशियों का दर्द समझकर पड़ोस की क्लीनिक से दर्द की दवा ले आया था और तब से घर पर ही लेटा रहा था। कुछ हल्का-फुल्का खा भी लिया था। बड़े अस्पताल में ज्यादा खर्च की वजह से नहीं गया। मां से बोला—"मम्मी, यूं ही कोई दर्द है, टैबलेट ले आया हूं, थोड़ा आराम करूंगा सही हो जाएगा। बड़े अस्पताल एक बार पहुंच जाओ, हजारों रुपये बिना मतलब की जांचों में खर्च करवा देते हैं। सब जगह कमीशन का खेल चल रहा है।" सुमन को भी रुकने से मना कर दिया था। पिछले दिन शाम को फिर सीने में तेज दर्द हुआ, अबकी बार संभला नहीं गया। वॉशरूम जाने के लिए खड़ा हुआ तो गिर पड़ा, जुबान लड़खड़ा गई। तुरंत जैसे-तैसे ऑटो रिक्शा कर बड़े अस्पताल पहुंचे। उन्होंने भरपूर प्रयास भी किया होगा लेकिन बचा नहीं सके। डॉक्टर शायद दूसरा हार्ट अटैक बता रहे थे। देर रात्रि उसको मृत घोषित कर दिया।
कफन-काठी तैयार होने से श्मशान जाने तक उसकी मौत का कारण लोगों की चर्चा का एकमात्र विषय था। कोई कह रहा था—"भाई, 2 दिन पहले जो सीने में दर्द हुआ था वह पहला अटैक था। उसमें लापरवाही कर दी, उसी समय किसी अच्छे डॉक्टर के पास बड़े अस्पताल चले जाते तो दूसरा अटैक नहीं आता, जान बच जाती।" "अरे यही तो बात है, हम खुद ही डॉक्टर बन जाते हैं और कभी-कभी इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।" "अरे भाई, मजबूरी भी कई बार खर्च करने से रोकती है। आदमी सोचता है कि छोटे-मोटे क्लीनिक पर दवा ले लेने से ही काम चल जाए।"
"वैसे पिछले कई महीनों से उदास रहता था, गुमसुम सा, कम ही बोलता था। जैसे दिमाग में कुछ चल रहा था या दिल में कोई बोझ लिए चल रहा था। कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं खा लिया? नींद की गोली वगैरह? ईश्वर जाने।" "सुमन चैन से कहां रहने देती थी उसको!" "लेकिन डॉक्टर ने तो मौत का कारण हार्ट अटैक ही बताया है, यही सुनने में आ रहा है।" "कौन जाने! सुमन के हाव-भाव देखे हैं आजकल? कैसी बन-ठन कर रात्रि को जाती थी। और ये कॉल सेंटर में काम करने वाली महिलाओं को कौन नहीं जानता? सुना है किसी न किसी से तो चक्कर चल रहा था उसका।" "भाई अभी क्या पता कि मौत की असली वजह क्या है? तुम्हारी डॉक्टर से बात हुई है क्या? क्या पता बाद में कुछ और राज निकले!" "आज बीमारियों का पता नहीं, सबसे पहले सेहत का ध्यान रखना चाहिए। छोटी सी तकलीफ हो तो बॉडी चैकअप ढंग से कर लेना चाहिए, वैसे परिवार पर गहरा संकट आ गया, पता नहीं कैसे जीवन यापन कर पाएंगे .......?" जैसे सभी अचानक से बड़े स्वास्थ्य सलाहकार समाजशास्त्री बन गए थे, किसी के मुंह से उसके परिवार की मदद करने के बारे में एक शब्द भी नहीं निकला । वह कैसे मरा? क्यों मरा ? सुमन कितनी जिम्मेदार थी ? सुमन का चाल- चलन कितना जिम्मेदार था ? अब उसको किस तरह जीवनयापन करना चाहिए ? वह क्या-क्या कर सकती थी? इन सभी की उन्होंने समालोचना कर डाली, लेकिन उनमें से कोई भी कैसे कुछ मदद कर सकता था यह ख्याल भी शायद उनके दिमाग में नहीं आया....! जनाजा गली में से होकर गुजर रहा था निलेश दूसरे लोक के सफर के लिए निकल चुका था, पीछे छोड़ते हुए सारे परिवार के झंझट, सारे मानसिक तनाव, सारी उलझने, गला फाड़कर चीखती आवाज़ें उसको पकड़ने का, उसको रोकने का, असंभव प्रयास कर रही थी, किंतु वह उनकी पहुंच से दूर, बहुत दूर जा चुका था, समझ नहीं बैठ रहा था की जनाजा निलेश के मृत शरीर को लिए जा रहा था या जनाजा निकल रहा था तीन छोटे-छोटे बच्चों के भविष्य का या जमुना देवी के अस्तित्व कायम रखने का, उसकी उम्मीदों का या सुमन के सिंदूर का,उसके हमसफर का, पता नहीं वह जनाजा अपने साथ क्या-क्या लिए जा रहा था................?