वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
बचपन से ही मैं कई बार मरी हूं पर अपनी जीने की चाह के चलते हर बार जीवित भी हो जाती। मरने के इतने अनुभवों के बाद भी मुझे मौत से बहुत डर लगता। मैं मरना नहीं चाहती। जितना मैं ज़िंदा रहना चाहती, इतनी ज़्यादा मरती। कई बार मैं भीतर के इंसान के कारण ख़ुद भी मरी।
अपने बचपन के दोस्तों के साथ खेलते हुए मैं ईमानदारी बरतती और हर बार कुछ ना कुछ खोती जो मेरे आत्म सम्मान को ख़त्म करता जाता। मम्मी पापा का झगड़ा होता तो सबसे ज़्यादा दु:ख मुझे होता। मुझे ऐसा लगता जैसे जब तक दोनों में सुलह न हो जाए, मेरे अंदर की सांसें अटकी रहती। वह दिन बीत जाते परंतु मुझे उबरने में बहुत समय लग जाता।
एक दिन उन्होंने अलग होने का निर्णय ले लिया। मैं दो भागों में बट गई थी। कभी इधर तो कभी उधर, शटल कॉक की तरह दोनों घरों के चक्कर लगते रहते। दोनों मुझे बहुत प्यार करते थे। जब तक मैं बिखरे हालात को स्वीकार कर पाई तब तक मेरा बचपन बीत चुका था। साथ रहने की यादों को अपने भीतर समेटे, अपने बचे हुए रिश्तों के साथ जीती रही। पैसों की कमी नहीं थी, अगर किसी चीज़ की कमी थी तो अपने परिवार के साथ सुकून से भरी सांसों की।
बरस-दर- बरस बीतते गए। मैं मरती- जीती बड़ी होती रही। जवानी से एक नई ताज़ी ज़िंदगी की उम्मीद थी मगर स्कूल हो या घर- सभ्य कहने वाले समाज के असभ्य पुरुषों से सामना होता रहा।
कभी-कभी मुझे लगता कि मैं इंसान नहीं, बल्कि एक महंगा सिक्का हूं- जिसकी ज़रूरत अमूमन सभी को होती। मैं एक ऐसा खज़ाना, जिसे सभी पाना चाहते। दुनिया के अलग-अलग देश की मुद्राएं उनके अपने देश में ही चल सकती हैं परंतु मैं वह मुद्रा थी जिसका चलन हर देश में था। करंसी, बियांड दि बॉर्डर।
मैं एक लड़की होने के ज़ोर पर सबको अपने पैरों तले ला सकती थी। यद्यपि मैंने कभी इसे अपनी ताक़त नहीं माना। पैसे का रिश्ता पवित्र नहीं होता, वह सिर्फ स्वार्थ का होता है। मेरे समीप आने को आतुर चचेरा- ममेरा हर रिश्ता भी वैसा ही था। स्वार्थी, अपवित्र और गंदा। गुनाहों का देवता। अपनी इसी तथाकथित ताक़त के बलबूते, मेरी शादी अनुज से हुई।
उसकी मम्मी रिश्ता लेकर आई। मेरी मां अनुज को देखकर ठिठक गई -लंबा, गोरा, अंग्रेज़ सा। मां आसमंजस में पड़ गई। मेरी तरफ देखा, सोचने लगी, प्रीति तो अनुज की परछाई की तरह है, निबाह कैसे होगा? तभी अनुज की मम्मी ने कहा -मेरा बेटा आपकी बेटी के कैरेक्टर से इंप्रेस है। अपनी ताक़त से हर किसी को हुड़काकर दूर कर देती। कभी दूसरी बार गंदी नज़र से न देख पाए ऐसा पाठ पढ़ाती है।
रिश्ता तय हो गया। सादगी से शादी हुई। मैं उसे चाहने लगी। मेरी दुनिया उसी से शुरू होती, उसी पर ख़त्म। मुझे लगता था कि वह भी उतनी ही शिद्दत से मुझे चाहता है। तमाम दिन और रातें उसी के ख़्याल में, उसी के इर्द-गिर्द गुज़ारती। बहुत खुश थी मैं अपनी इस नई दुनिया में। मैं समाज सेवा में समय देती, घर बसाती, सपने सजाती।
पहली बेटी हुई -बबली। अनुज की मम्मी ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई अनचाही चीज़ हो। उसी सन्नाटे मैं किसी ने फुसफुसा कर कहा - क़िस्मत वाली है प्रीति... अर्थी पर रोने वाली पैदा हुई।"
यह वाक्य मेरे अंदर समुद्र तट गहरा धंस गया।
लेकिन शायद मेरी बेटी सात्विक भाग्य वाली थी। उसी के बाद अनुज को अमेरिका में नौकरी मिल गई।
कुछ साल बाद बेटा हुआ- बंटी। कैलिफोर्निया में पार्टी हुई- "वंशावली आ गया है।" उस पार्टी में अनुज की बाॅस लुइस भी आईं थीं।
अमेरिका पहुंचकर अनुज पूरी तरह अंग्रेज़ हो गया -बोलचाल, वेशभूषा,सोच। और मैं बच्चों में सिमटी चली गई। मेरी दुनिया वही थी। अनुज मेरी ज़िंगी में किसी फिल्म के गेस्ट आर्टिस्ट बनकर रह गया -नाम बड़ा, रोल छोटा।
एक दिन मॉल मैं उसकी बाॅस लुईस मिली। मेरी गोद में बेटा, कार्ट में बेटी।
मुझे देखकर वह मुस्कुराई- "योर मैड लुक्स सिंसियर... इंडिया से ऐसी ही चाहिए।"
उस दिन पहली बार अनुज ने मुझे कामवाली की नज़र से देखा।
घर लौट कर मैंने आईने में खुद को देखा- मैं एक थकी हुई मेड जैसी लग रही थी।
कुछ दिनों बाद मैंने उसे दूसरी महिला के साथ देखा। ऐसी हालत में देखा कि आंखें पत्थरा गई। वह पल मेरी देह से जैसे प्राण ही निकाल कर ले गए थे। मात्र शरीर बचा था। उसके बाद बटी हुई ज़मीन के टुकड़े मुझे मिलते रहे थे, जिन्हें मैं स्वीकार करती रही थी। मेरे पास जो बच्चों की ताक़त थी वह झूठी दुनिया की तपिश में से सूखे पत्तों की तरह झरती रही, लुप्त होती रही। मेरा पति तो वह उसके बाद भी रहा परंतु सिर्फ नाम का। परिवार और समाज की नज़रों में उसकी पत्नी बनी रही।
किरचों में बटे अपने आत्मविश्वास को जोड़ने के लिए मैंने समाज सेवा के साथ-साथ नौकरी भी कर ली। एक और दुनिया से परिचय हुआ। मन के हारे कहीं जीत नहीं मिलती, वही हुआ। अलग-अलग मोर्चों पर काम तो करती लेकिन ख़ुद को झोंकते हुए। चूल्हे की जलती लकड़ी के लिए आग से बढ़कर कोई और मंजिल हो भी नहीं सकती। घर पर, काम पर, निचुड़ती रही मैं। लगता था अब जान नहीं बची। थकी- हारी रात तक ज़िंदा लाश हो जाती। सुबह उठते ही फिर अपने कर्तव्य की दुहाई से ख़ुद को तार पर टांग देती। निचोड़ने के बाद भी भीतर का बचा-कूचा पानी फिर से ऊर्जा दे देता था, एक नई सुबह में सांस लेते हुए में डटी रहती।
एक दिन अपनी भावनाओं में बहकर उसे, अपने पास आने से रोक नहीं पाई। इंसान ही था ना! मगर उसके बाद मुझे लगा कि मैंने स्वयं अपने आप को मार दिया। ऐसी मौत जो किसी क्षणिक भूख की तृप्ति से मिली थी। उसके बाद यह सिलसिला रुका नहीं। भूख लगने पर मुझे खाकर वह खुश होता, मैं ख़ुद को खाया जाता देखती रह जाती। मैं उसके लिए रिज़र्व रोटी थी।
मेरे पास एक ही रास्ता था- तलाक़। पर बच्चों की शक्ल सामने आ जाती। मां-बाप की बुझी आंखें दिखतीं। और मैं फिर एक दिन और जीने का समझौता कर लेती।
एक शाम मैंने देखा -बबली अपनी गुड़िया को चुप करा रही थी। कह रही थी- "शोर मत करो, पापा नाराज़ हो जाएंगे।"
उस पल मुझे एहसास हुआ- "लाइफ ऑफ़ अ वूमेन।"
मुझे पहली बार समझ आया- यह कहानी अब सिर्फ मेरी नहीं रही। यह अगली पीढ़ी तक उतर रही है।
उस रात जब वह मेरे पास आया, मैं उठकर बैठ गई। पहली बार।
उसने पूछा -"क्या हुआ?"
मैंने शांत स्वर में कहा -"आज नहीं।"
उसने हंसते हुए कहा-"इतना ड्रामा क्यों?"
मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा - "क्योंकि मैं कोई रिज़र्व रोटी नहीं हूं। जब भूख मिटाने को कुछ ना मिले तो खा लिया जाए।"
वह चुप हो गया। शायद इसलिए नहीं कि उसे मेरी बात समझ मेंआई -बल्कि इसलिए कि मैंने पहली बार बोलने की हिम्मत कर ली थी।
उस रात मैं अलग कमरे में सोई। सुबह बच्चों के लिए नाश्ता बनाया। उन्हें स्कूल छोड़ा।
सब कुछ वैसा ही था -बस एक चीज़ बदली थी-मैं।
तलाक़ के कागज़ अब भी फाइल में रखे हैं।
शायद आज नहीं, शायद कल।
लेकिन अब मैं रोज़ नहीं मरूंगी। क्योंकि मुझे समझ आ गया -"लाइफ ऑफ़ अ वूमेन।" और उस रात पहली बार मुझे लगा मैं रोटी नहीं हूं। मैं वह आग लगा रही हूं जिस पर रोटियां सेंकी जाती है। मैंने चुप रहना छोड़ दिया है। और यही सबसे बड़ा विद्रोह है।
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