Hostel Room No. 4 in Hindi Horror Stories by Xiaoba sagar books and stories PDF | हॉस्टल का कमरा नं. 4

Featured Books
Categories
Share

हॉस्टल का कमरा नं. 4

जर्मनी के दक्षिण-पश्चिम में बसा एक पुराना शहर—फ्राइबुर्ग। घने ब्लैक फॉरेस्ट (Schwarzwald) के किनारे बसा यह शहर जितना खूबसूरत था, उतना ही रहस्यमय भी। शहर के एक कोने में एक पुराना छात्रावास था—“Haus der Schatten” (छायाओं का घर)। यह हॉस्टल बाहर से सामान्य दिखता था, लेकिन उसके भीतर कुछ ऐसा था… जो इंसान की समझ से परे था।


लुकास ने हाल ही में इस हॉस्टल में शिफ्ट किया था। उसे कमरा मिला कमरा नं. 4।

वॉर्डन ने चाबी देते हुए कहा,
“अगर रात में कुछ अजीब सुनाई दे… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

लुकास ने हल्के में लिया।
“जर्मनी में भी भूत-प्रेत?” उसने मन में हंसी उड़ाई।


पहली रात
रात के 2 बजे…
ठक… ठक… ठक…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।

लुकास ने सोचा—शायद कोई दोस्त मजाक कर रहा है।
वह दरवाज़े के पास गया… लेकिन जैसे ही उसने हैंडल छुआ 
दस्तक अचानक रुक गई।

उसने दरवाज़ा खोला।
बाहर… कोई नहीं था।

लेकिन गलियारे में कुछ गीला-सा फैला हुआ था… जैसे पानी… या शायद… कुछ और।

अगली सुबह

हन्ना और मोरित्ज़ ने उसे देखा।
“तुम ठीक लग नहीं रहे,” हन्ना ने पूछा।
लुकास ने रात की बात बताई।

मोरित्ज़ हंसा
“ये हॉस्टल पुराना है, आवाज़ें आती रहती हैं।”

लेकिन हन्ना का चेहरा पीला पड़ गया।
“कमरा नं. 4…?”

वह चुप हो गई।

हन्ना ने धीरे से कहा
“इस कमरे में पहले भी छात्र रह चुके हैं… लेकिन कोई ज्यादा दिन नहीं टिका।”

“क्यों?” लुकास ने पूछा।
हन्ना ने जवाब नहीं दिया।

दूसरी रात

लुकास ने दरवाज़ा बंद किया… और इस बार उसने लॉक भी लगा दिया।

रात के 3 बजे…
ठक… ठक… ठक…
दस्तक फिर शुरू हुई।

लेकिन इस बार… आवाज़ दरवाज़े से नहीं…
दीवार के अंदर से आ रही थी।

दीवार… जैसे किसी ने अंदर से खटखटाई हो।

दीवार पर हल्की दरार थी।

लुकास ने टॉर्च लगाई…
और देखा—

दरार के अंदर…
एक आँख उसे देख रही थी।

वह पीछे हट गया।

आँख झपकी…
और धीरे-धीरे दरार फैलने लगी।

तीसरा दिन

लुकास ने हन्ना और मोरित्ज़ को बुलाया।
“तुम दोनों को दिखाना होगा,” उसने कहा।
तीनों कमरे में गए।
दीवार अब सामान्य थी।
“तुम hallucinate कर रहे हो,” मोरित्ज़ बोला।
लेकिन तभी…
ठक… ठक… ठक…
तीनों ने एक साथ आवाज़ सुनी।

इस बार…
आवाज़ कमरे के अंदर से आई।

कमरे के कोने में… फर्श हिलने लगा।

लकड़ी की पट्टियाँ धीरे-धीरे ऊपर उठीं…
और नीचे एक अंधेरा गड्ढा दिखाई दिया।

गड्ढे से…
एक लंबा, पतला हाथ बाहर आया।

हाथ पर त्वचा नहीं थी…
सिर्फ काले धागों जैसे नसें।

मोरित्ज़ चिल्लाया—
“ये क्या है?!”

हन्ना रोने लगी।

लुकास ने हिम्मत करके पूछा—
“तुम कौन हो…?”

गड्ढे से आवाज़ आई—
“तुम… मेरे कमरे में क्यों हो?”

हन्ना ने काँपते हुए कहा—
“यह कमरा… पहले एक छात्र का था… उसका नाम था—एरिक।”

“वह गायब हो गया था… बिना किसी निशान के।”

गड्ढे से आवाज़ (कांपता हुआ भयानक और डरावना आवाज़) आई 
“मैं गया नहीं था…
मुझे यहाँ छोड़ दिया गया था।”

अचानक गड्ढे से पूरा शरीर बाहर निकलने लगा।

लेकिन वह इंसान जैसा नहीं था।

उसका शरीर…
दीवारों के साथ जुड़ा हुआ था।

जैसे वह कमरे का हिस्सा बन गया हो।

उसका चेहरा…
हर सेकंड बदल रहा था।

कभी लुकास…
कभी हन्ना…
कभी मोरित्ज़।

मोरित्ज़ भागने लगा
लेकिन दरवाज़ा बंद था।

हैंडल घुमाया…
वह पिघलने लगा।

दरवाज़ा…
मांस जैसा हो गया।

वह चीज़ बोली
“यह कमरा… अकेला नहीं रह सकता…
इसे हर समय एक निवासी चाहिए।”

उसने मोरित्ज़ को पकड़ लिया।

मोरित्ज़ चीखा…
और धीरे-धीरे…
उसका शरीर दीवार में समाने लगा।

हन्ना और लुकास जड़ हो गए।

मोरित्ज़ की आवाज़…
दीवार के अंदर से आने लगी—
“मुझे… बाहर निकालो…”

अगली सुबह…

हॉस्टल का वॉर्डन नए छात्र को चाबी दे रहा था।
“कमरा नं. 4 खाली है।”
नया छात्र दरवाज़ा खोलता है…
कमरे में सब सामान्य था।

बस दीवार पर…
तीन चेहरे उभरे हुए थे—

लुकास… हन्ना… और मोरित्ज़।

तीनों की आँखें खुली थीं…
और वे…
अभी भी जिंदा थे।

रात के 3 बजे…

ठक… ठक… ठक…

अब आवाज़ दरवाज़े से नहीं आती…
दीवारों से आती है।

और अगर आप ध्यान से सुनें…

तो कोई फुसफुसाता है—
“कमरा नं. 4…
अभी भी भरा नहीं है…”


                               ---