Mountain Man in Hindi Motivational Stories by Rishav raj books and stories PDF | माउंटेन मैन

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माउंटेन मैन

यह कहानी दशरथ मांझी के जीवन से प्रेरित एक रचनात्मक (creative) प्रस्तुति है।

इसमें दर्शाए गए कुछ संवाद, भावनाएँ और दृश्य लेखक की कल्पना पर आधारित हैं, ताकि कहानी को अधिक प्रभावशाली और भावनात्मक बनाया जा सके।

इस सामग्री का किसी भी रूप में (copy, reproduce, distribute या modify) उपयोग बिना लेखक की अनुमति के करना कॉपीराइट नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।






ये कहानी न किसी राज ,महाराज ना ही किसी सुपर हीरो की ये कहानी है 

बिहार के छोटे से गाँव गहलौर, जिला गया…
जहाँ सूरज उगने से पहले लोग अपने संघर्ष की शुरुआत कर देते हैं, जहाँ सपने छोटे होते हैं, लेकिन दर्द बहुत बड़े…

वहीं जन्मे एक ऐसे इंसान का, जिसे दुनिया बाद में
दशरथ मांझी के नाम से जानेगी।

लेकिन उस समय…
वह बस एक गरीब लड़का था —
नंगे पाँव, फटे कपड़े, और आँखों में अधूरे सपने लिए।




मेरा नाम दशरथ था…

बचपन से ही मैंने जिंदगी को बहुत करीब से देखा था।
जब दूसरे बच्चे खेलते थे, तब मैं काम करता था।

कभी खेतों में मजदूरी,
कभी पत्थर तोड़ना…

घर में इतना भी खाना नहीं होता था कि पेट भर सके।

माँ अक्सर कहती थीं:
“बेटा, गरीबी हमारी किस्मत है…”

लेकिन मेरे अंदर कहीं ना कहीं यह बात चुभती थी —
क्या सच में किस्मत इतनी छोटी होती है?



एक दिन गाँव में शादी का माहौल था।

ढोल बज रहे थे, लोग नाच रहे थे…
और वहीं मैंने उसे पहली बार देखा…

फाल्गुनी…

वह किसी कहानी की तरह थी —
सादा कपड़े, मासूम चेहरा, और आँखों में एक अजीब सी चमक।

मैं उसे बस देखता ही रह गया।

वह मुस्कुराई…
और उस मुस्कान ने मेरे अंदर कुछ बदल दिया।



कुछ दिनों बाद हमारी शादी हो गई।

हमारे पास कुछ भी नहीं था —
न बड़ा घर, न पैसा…

लेकिन हमारे पास एक-दूसरे का साथ था।

वह मेरे जीवन की पहली खुशी थी।

जब मैं काम से थका हुआ घर लौटता,
वह मेरे लिए पानी लाती…
और मुस्कुराकर कहती:

“इतना मत थका करो… मैं हूँ ना।”

उसकी यह बात मेरे सारे दर्द भुला देती।



हमारी जिंदगी बहुत साधारण थी…

सुबह मैं काम पर जाता,
और वह घर के काम करती।

कभी-कभी वह मेरे लिए खाना लेकर खेतों तक आती।

रास्ता आसान नहीं था…

बीच में एक बड़ा पत्थरीला पहाड़ था,
जिसे पार करके उसे मेरे पास आना पड़ता था।

मैं कई बार कहता:

“इतनी दूर मत आया करो… मैं खुद आ जाऊँगा।”

वह हँसकर कहती:

“तुम काम छोड़कर आओगे, तो घर कैसे चलेगा?”

उसकी बातें साधारण थीं…
लेकिन उनमें बहुत गहराई थी।




रात को हम दोनों आँगन में बैठते…

आसमान में तारों को देखते…

मैं उससे कहता:
“एक दिन मैं कुछ बड़ा करूँगा…”

वह मुस्कुराकर कहती:
“तुम पहले से ही बड़े हो… मेरे लिए।”

उसकी यह बात सुनकर मैं चुप हो जाता।

क्योंकि उसके लिए मैं सच में बड़ा था…
और यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात थी।



लेकिन उस पहाड़ को देखकर मेरे मन में हमेशा एक डर रहता था…

वह पहाड़ हमारे और दुनिया के बीच एक दीवार था।

मैं कई बार सोचता:

“अगर कभी कुछ हो गया… तो हम क्या करेंगे?”

लेकिन फिर मैं उस ख्याल को टाल देता।

क्योंकि जिंदगी पहले ही बहुत मुश्किल थी…
और मैं और डर नहीं जोड़ना चाहता था।




हमें नहीं पता था कि वही पहाड़…
जो हमारे बीच खड़ा था…

एक दिन हमारी जिंदगी को पूरी तरह बदल देगा।

एक दिन ऐसा आएगा…
जब वही रास्ता, वही पहाड़…
मेरी दुनिया छीन लेगा।

और उस दिन…
एक साधारण मजदूर
इतिहास बन जाएगा।



( अगर आपको ये भाग पसंद आया तो फोलो जरूर करें)