वरिष्ठ पत्रकार और संपादक श्री जय शंकर मिश्र ने अगस्त 2025 में मुझे प्रख्यात समाज सेवी डा0जी०पी० भगत के बारे में बताया था |उन पर लिखी गई पुस्तक भी उन्होंने दी थी और पुस्तक समीक्षा की भी बात कही थी |हाथ की रेत के फिसल जाने की तरह समय भागता रहा और मैं अपनी निजी व्यस्तताओं में उलझा रहा और यह पुस्तक पढ़ नहीं सका | अंतत: मानो अपने आप से जिद करके मैंने दो फरवरी को इसे पढ़ डाला |
पुस्तक के केंद्र बिन्दु में हैं अपने जीवन को दीन दुखियों,असहायों और वंचतों,परित्यक्त वृद्ध जनों की नि:स्वार्थ सेवा में समर्पित करने वाले डा. जी. पी. भगत और उनका एन.जी.ओ.|लेकिन पुस्तक पढ़ते हुए इसके लेखक श्री जय शंकर मिश्र ने अनेक ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है जो पाठको के लिए रोचक, रोमांचक और प्रेरक हैं | यह पुस्तक किसी की आत्म प्रशस्ति में लिखी गई पुस्तक बन जाती अगर लेखक ने अपने लेखन चातुर्य से स्वामी विवेकानंद,संत कबीर,गौतम बुद्ध,अरबिन्द घोष,महात्मा गांधी,आचार्य बिनोवा भावे,मदर टेरेसा, खलील जिब्रान, मनुस्मृति,गरुण पुराण , पदम पुराण,चरक संहिता आदि अमर ग्रंथों और महान व्यक्तियों के जीवन से उद्धरण नहीं दिए होते |
अपनी अभिव्यक्ति में डा. भगत ने स्पष्ट कर दिया है कि “मेरा जीवन खुली किताब है |मैं समाज सेवी हूँ और वही रहूँगा |” स्पष्ट है कि उनके नेतृत्व में चल रहे वृद्ध आश्रमों के लिए भी यही बात लागू होती है |इसीलिए उन के भारत में चल रहे एन.जी.ओ. शीओस (संत हरदयाल एजूकेशन एण्ड ऑरफंस वेल्फेयर सोसायटी ) अन्य सभी एन.जी.ओ. से सर्वथा अलग हैं जिसे आप स्वयं वहां जाकर महसूस कर सकते हैं | उनका यह कहना कि “अपने लिए नहीं सबके लिए जियो “ स्वामी विवेकानंद की उन बातों से प्रेरित है जिसमें स्वामी विवेकानंद कहते हैं – “मैं उस प्रभु का सेवक हूँ जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं |”
गाजीपुर (उ. प्र.)स्थित सिद्ध संत हरदयाल साहिब के मठ में जाने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ है |वहाँ जाकर दर्शन करने और प्रसाद पाने का भी सौभाग्य मिला है |मठ में प्रवेश करने मात्र से मन की भौतिक लोलुपता लुप्त हो गई थी और यह चंचल मन सात्विक भाव से लबरेज हो उठा था | भगत जी के पिता श्री विश्राम मानव भी इन्हीं संत के शिष्य थे और इन्हीं संत की कृपा से एक अद्भुत रत्न के रूप में 29 नवंबर 1960 को भगत जी का जन्म केशवपुर (चंदौली) में हुआ था |इस समय भगत जी की उम्र 66 वर्ष हो रही है लेकिन उनका सेवा कार्य उनको बूढ़ा नही होने दे रहा है |सेवा भाव अदृश्य किन्तु प्रभावी मंत्र है जो हर सेवक को प्राप्त हो सकता है बशर्ते उसका सेवा भाव निर्मल हो , बिना किसी आकांक्षा के किया जा रहा हो |
लेखक ने भगत जी के जीवन के शुरुआती दिनो का वर्णन जीवन के धूप छाँव शीर्षक अध्याय में किया है |बी.एच.यू. से एम.ए. की डिग्री लेने के बाद 1981 में वन विभाग में इनको नौकरी मिली थी लेकिन उसे छोड़ कर इन्होंने जे. एन.यू. से 1984 में एम. फिल. की डिग्री ली |यह डिग्री इन दिनों चर्चित ए. आई. से संबंधित थी , विषय था - कंप्यूटर साइंस में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस /लॉजिक बेस्ड मेडिकल कंसल्टेंट सिस्टम | इसके तुरंत बाद टेक्सास अमेरिका से इनको नौकरी का ऑफर मिला किन्तु माता पिता के प्रेम और दुखी दरिद्रों की सेवा भावना ने इनको अमेरिका नहीं जाने दिया |लेकिन आप चुप नहीं बैठे और आपने रेकी के माध्यम से उसके मूल सिद्धांतों के साथ अपने गुरुदेव के मंत्रों को मिला कर कल्याण रेकी की खोज की जिस पर नेशनल आल्टरनेटिव मेडिकल एसोशियेशन ने इन्हें एम . डी . की मानद उपाधि प्रदान की |
पुस्तक के अगले पाठ में इनके सेवा पथ पर निकल पड़ने की रोचक कहानी है |तीसरे पाठ में इनके सेवा को समर्पित सम्पूर्ण जीवन के बारे में सविस्तार बताया गया है |
पीड़ित मानवता की सेवा का इतिहास रच रहे डा. भगत और उनकी संस्था को आरंभिक दौर में देश,काल पात्र की चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसे उन्होंने जीवन मूल्यों के परीक्षण की प्रयोगशाला माना और अपने उद्देश्य से विरत नहीं हुए |आश्चर्य तो इस बात का है कि डा. भगत के संकल्पों की सिद्धि की योजनाओं में जब जब आर्थिक गतिरोध आया अदृश्य स्त्रोतों से उनको आर्थिक सहयोग मिलता गया और वे अपना संकल्प सिद्ध करते चले गए |इस पुस्तक में लेखक मिश्र जी ने उन सभी कठिन दिनों का सविस्तार विवरण दिया है |जगह जगह पर डा. भगत की संवेदन शीलता के उद्धरण हैं जैसे- एन.जी.ओ. चलाने के लिए कर्ज लेना,स्वयं रेकी और ज्योतिष से धन अर्जित करना ,आश्रित वृद्ध जनों की स्वयं अपने हाथों सेवा करना आदि |
पुस्तक के पृष्ठ 45-46 पर यूरोप के एक देश नार्वे की उस परंपरा का उल्लेख है जिसमें अक्सर संवेदनशील लोग रेस्तरां में अपने ऑर्डर के साथ भूखों वंचितों को नि:शुल्क खाना देने के लिए एक आइटम का पेमेंट कर देते हैं जिसे "सस्पेंशन" कहा जाता है |पृष्ठ 87 से 95 तक गढ़ मुक्तेश्वर और गुरु विश्राम वृद्ध आश्रम के बारे में लेखक सविस्तार बताते हैं |उसी क्रम में 86 वर्षीय श्री सुरेश अग्रवाल का जिक्र भी आता है जो प्रयाग से संबंध रखते हैं और अनेक उच्च पदों पर काम करने के बाद अंतत:वर्ष 2011 में इसी आश्रम की शरण लेते हैं | आगे लेखक ने डा. भगत की निष्ठा और सेवा भाव को मजबूती प्रदान कर रही उनकी अगली पीढ़ी का भी जिक्र किया हैं |इस प्रकार तीन पीढ़ियाँ -पिता श्री विश्राम मानव ,डा. जी. पी.भगत और पौत्र सौरभ भगत संकल्पित हैं इन सस्थाओं को चलाते रहने के लिए |
इस पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में भारत में बुजुर्गों की उपेक्षा के कारण और निवारण पर सविस्तार तथ्य दिए गए हैं |हर साल 21 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व सिटिजन डे और पहली अक्टूबर को अन्तराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस का भी उल्लेख है किन्तु साथ ही इस यक्ष प्रश्न को भी उठाया गया है क्या देश के वरिष्ठ नागरिकों की अपेक्षाएं पूरी हो पा रही हैं ?
पुस्तक के पृष्ठ 102 के अंतिम पैराग्राफ में मिश्र जी ने ज़िंदगी के फलसफे को कुछ इस तरह बयान किया है –“ज़िंदगी एक यात्रा है -जन्म से मृत्यु तक का सफर |अपने हौसले को यह खबर करते रहिए कि ज़िंदगी मंजिल नहीं सफर है इसलिए हमेशा चलते रहिए |इसमें पड़ाव है ,मंज़िलें हैं , पथरीली पगडंडियाँ ,नदियां पहाड़ -सब कुछ है |...... मौत भी आपसे आपके नाम को जुदा न कर सके|”
लेखक मिश्र जी ने अपनी पत्रकारिता और सम्पादन कला की विशिष्टता दिखाते हुए पिता के आशीर्वाद के संदर्भ में जंजीबार के सुल्तान का रोचक प्रसंग दिया है |पृष्ठ 70 पर लेखक ने आश्रम के दौरे पर आए शीर्ष पत्रकार रविश कुमार की उस उक्ति का संदर्भ दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि “ लोग इंडिया इंडिया कहते रहते हैं कि यह सदी आज के नव युवकों की है लेकिन भारत के माँ बाप की कोई सदी क्यों नहीं है |”पुस्तक में एक स्थान पर एक पिता की अपने पुत्र से की जाने वाली अभिलाषा का मार्मिक आख्यान है |प्राक्कथन में डा श्याम नारायन पांडे ने ठीक ही लिखा है कि यह पुस्तक सेवा के अपराजेय योद्धा डा .भगत के बेशकीमती व्यक्तित्व और सेवा की अनुपम , अनुकरणीय कहानी है और निश्चित रूप से डा. भगत भारत में सेवा क्षेत्र के महान शिल्पकार हैं ।
पुस्तक- सेवा का अपराजेय योद्धा -डा. जी. पी. भगत
लेखक-संपादक- जय शंकर मिश्र
कुल पृष्ठ- 152
मूल्य- 495 रूपये
प्रकाशक- शिवाँक प्रकाशन ,नई दिल्ली