A Stranger in the Rain - 3 in Hindi Love Stories by Avinash books and stories PDF | बारिश के बीच एक अजनबी - 3

The Author
Featured Books
Categories
Share

बारिश के बीच एक अजनबी - 3

भाग 3: बादलों की लुका-छिपी और खुलते राज़


रविवार की सुबह कबीर की आँखें उम्मीद से पहले ही खुल गईं। उसने सबसे पहले अपनी खिड़की का परदा हटाया। बाहर तेज़ धूप खिली हुई थी। आसमान एकदम साफ और नीला था, जैसे कोई कलाकार ताज़ा कैनवास बिछाकर चला गया हो। कबीर के चेहरे पर मायूसी छा गई। ज़ोया ने कहा था—"अगर बारिश हुई, तो मैं मिलूँगी।"
उसने अपनी अलमारी से एक कैज़ुअल शर्ट निकाली, पर फिर रुक गया। "शायद वह नहीं आएगी," उसने खुद से कहा और वापस अपनी ऑफिस की फाइलों की ओर मुड़ गया। पर उसका मन बार-बार उस नीले पक्षी वाली चाबी की ओर जा रहा था। दोपहर के 3 बज चुके थे। सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ चमक रहा था। कबीर ने हार मान ली और अपनी कुर्सी पर ढह गया।
तभी, अचानक मौसम ने करवट ली। जैसे कोई जादुई परदा गिर गया हो। अचानक हवाएँ तेज़ चलने लगीं और काले बादलों ने सूरज को अपनी आगोश में ले लिया। दस मिनट के भीतर, मुंबई की गलियाँ फिर से बूंदों के संगीत से गूँजने लगीं। कबीर के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जो उसके किसी बड़े प्रोजेक्ट के सफल होने पर भी नहीं आती थी। उसने छतरी नहीं उठाई, बस चाबी का गुच्छा जेब में डाला और दौड़ पड़ा।

जब कबीर उस नुक्कड़ वाली टपरी पर पहुँचा, तो वह पूरी तरह भीग चुका था। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ चाय वाला अपनी भट्टी सुलगाने की कोशिश कर रहा था। कबीर पंद्रह मिनट तक खड़ा रहा, फिर आधा घंटा। उसकी उम्मीदें धीरे-धीरे ठंडी पड़ने लगीं। "शायद वह सिर्फ मज़ाक कर रही थी," उसने सोचा।
तभी, दूर से एक पीली स्कूटी आती दिखी। ज़ोया ने स्कूटी रोकी और अपना रेनकोट उतारते हुए उसकी ओर देखा। वह थक कर चूर लग रही थी, उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, पर उसकी मुस्कान अब भी वैसी ही संक्रामक थी।
"देर के लिए माफी, मिस्टर सीरियस! मुझे नहीं लगा था कि तुम सच में इस बारिश का इंतज़ार करोगे," उसने अपने बाल सुखाते हुए कहा।
"मैं... मैं बस देखना चाहता था कि तुम्हारा 'लॉजिक' काम करता है या नहीं," कबीर ने अपनी धड़कनों को छुपाते हुए कहा।
वे दोनों पास के एक पुराने बरामदे में बैठ गए। आज ज़ोया वैसी चहकती हुई नहीं लग रही थी जैसी वह पहले दो मुलाकातों में थी। वह चुपचाप गिरती बूंदों को देख रही थी।
"सब ठीक है, ज़ोया?" कबीर ने धीमे से पूछा।
ज़ोया ने एक लंबी सांस ली। "कबीर, कभी-कभी मुझे डर लगता है कि मैं इन लहरों के साथ बह तो रही हूँ, पर मेरा किनारा कहाँ है, मुझे नहीं पता। लोग कहते हैं कि कला (Art) से पेट नहीं भरता, और शायद मेरे मकान मालिक को भी यही लगता है।"

कबीर को पहली बार अहसास हुआ कि ज़ोया की जिस 'बेपरवाह' ज़िंदगी से वह प्रभावित था, उसके पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी थी। वह अपने सपनों के लिए हर दिन लड़ रही थी। कबीर ने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा। वह हाथ बर्फ की तरह ठंडा था।
"ज़ोया, तुम एक बेहतरीन आर्टिस्ट हो। मैंने उन बच्चों की आँखों में देखा है कि तुम उनके लिए क्या हो। अगर दुनिया तुम्हारी कदर नहीं कर रही, तो इसमें तुम्हारी गलती नहीं है," कबीर ने उसे हौसला देते हुए कहा।
ज़ोया ने उसकी तरफ देखा। "तुम इतने अच्छे क्यों हो, कबीर? तुम तो मुझे जानते भी नहीं।"
"शायद इसलिए क्योंकि तुमने मुझे वो दिखाया जो मैं सालों से नहीं देख पा रहा था। खुद को।"
उस शाम बातें गहरी होती गईं। ज़ोया ने बताया कि वह एक बड़ी प्रदर्शनी (Exhibition) का हिस्सा बनना चाहती है, पर उसकी एंट्री फीस और पेंटिंग्स के सामान के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। कबीर ने उसे मदद की पेशकश की, पर ज़ोया ने उसे तुरंत ठुकरा दिया। "नहीं कबीर, ये मेरी लड़ाई है। मैं इसे अपने दम पर लड़ना चाहती हूँ।"

अचानक ज़ोया उठी और कबीर का हाथ खींचकर उसे बारिश के बीच ले गई। "चलो, आज हम एक ऐसी पेंटिंग बनाएंगे जो कभी नहीं मिटेगी।"
"यहाँ? सड़क पर?" कबीर हैरान था।
ज़ोया ने नीचे गिरती बूंदों से बने बुलबुलों की ओर इशारा किया। "देखो, ये पल। ये दोबारा नहीं आएंगे। यही सबसे बड़ी पेंटिंग है।" वे दोनों बारिश में पागलों की तरह नाचने लगे। कबीर, जो कभी अपनी शर्ट पर एक दाग भी बर्दाश्त नहीं करता था, आज कीचड़ और पानी में सराबोर था, पर वह खुश था।
लेकिन उनकी यह खुशियाँ अचानक थम गईं जब ज़ोया को एक कॉल आया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। "क्या? अभी? पर अभी तो..." उसने फोन रख दिया।
"क्या हुआ?" कबीर ने फिक्रमंद होकर पूछा।
"कबीर, मुझे अभी हॉस्पिटल जाना होगा। मेरी माँ... उनकी तबीयत बिगड़ गई है।" ज़ोया की आवाज़ कांप रही थी।
कबीर ने बिना एक पल गँवाए अपनी कार की ओर इशारा किया (जो वह कुछ दूर पार्क करके आया था)। "चलो, मैं तुम्हें ले चलता हूँ।"

हॉस्पिटल के सफेद गलियारों में, कबीर ने ज़ोया का वो रूप देखा जो उसने कभी नहीं सोचा था। वह टूट चुकी थी। उसकी माँ की सर्जरी होनी थी और खर्च उसकी पहुँच से बाहर था। कबीर वहाँ चुपचाप खड़ा रहा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। ज़ोया ने उसे घर जाने को कहा, पर वह नहीं गया।
रात के 2 बजे, जब ज़ोया बेंच पर सो गई, कबीर ने रिसेप्शन पर जाकर चुपके से बिल का एक बड़ा हिस्सा भर दिया। उसे पता था कि ज़ोया इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी, पर वह उसे इस हाल में नहीं छोड़ सकता था।
अगली सुबह जब ज़ोया जागी, तो कबीर वहाँ नहीं था। नर्स ने उसे बताया कि बिल का भुगतान हो चुका है। ज़ोया को समझने में देर नहीं लगी कि यह किसने किया होगा। उसने कबीर को फोन किया, पर उसका फोन बंद था।

वह कबीर के ऑफिस पहुँची, पर वहाँ उसे पता चला कि कबीर एक ज़रूरी काम से दो हफ्तों के लिए विदेश जा चुका है। उसने उसके डेस्क पर बस एक छोटा सा नोट छोड़ा था— "उस नीले पक्षी को उड़ना सिखाओ, ज़ोया। चाबी अब तुम्हारे पास है।"
ज़ोया वहीं खड़ी रह गई। उसके हाथ में उस नीले पक्षी वाला गुच्छा था। क्या यह उनका आखिरी इत्तेफाक था? क्या कबीर की दी हुई यह मदद उनके रिश्ते को हमेशा के लिए बदल देगी?

अगले और अंतिम भाग (Part 4) में क्या होगा?
 * क्या कबीर वापस आएगा या यह एक 'अधूरी धुन' बनकर रह जाएगी?
 * क्या ज़ोया अपनी प्रदर्शनी में सफल हो पाएगी और कबीर की मदद का कर्ज लौटा पाएगी?
 * इस कहानी का अंत—क्या बारिश उन्हें फिर से मिलाएगी?