261
Jamiil musamman saalim
mufaa'ilaatun mufaa'ilaatun mufaa'ilaatun mufaa'ilaatun
12 122 12122 12122 12122
हमे ज़माना नहीं करे याद तो कोई बात ख़ास होगी
मगर उसे आदमी की पहचान होगी जब बद-हवास होगी
#
तज़ुर्बा कहता है शेर उनको मिरे ये अच्छे नहीं लगे हैं
मगर ये भी जानता हूँ ऐसी भी सोच मेरी क़यास होगी
#
ये दौड़ है ज़िन्दगी की लोगों ने फ़ायदा- लुफ़्त भी उठाया
मगर निराशा नसीब चलते अपंग ज्यादा हताश होगी
#
लिखा है क़ुदरत ने पुस्तकों में तो एक वो दिन भी आएगा ही
तज़ुर्बे तेरी शिक़ायते- शोहरतें सभी जब ख़लास होगी
#
वो रिश्तों में घोलता है मीठा भी ख़ूब ज्यादा कहीं-कहीं पर
वहीं इशारों में देखना कोई दिन इजाफ़ा ख़टास होगी
##
262
16.3.25
Madiid musamman saalim
faa'ilaatun faa'ilun faa'ilaatun faa'ilun
2122 212 2122 212
मेरी गर्दन तेरी तलवार है मंजूर सब
लोग अहमक सिर्फ भरमार है मंजूर सब
#
लक्ष्य का पीछा हमसे कराना चाहते
कम से कम कुछ हाथो पतवार है मंजूर सब
#
वो खपा है जिंदगी से न जाने बात क्या
लापता उसकी ही सरकार है मंजूर सब
#
कातिलों को मिल रही छूट जाने आजकल
सामने ही तो गुनहगार है मंजूर सब
#
फैसले लेने से पहले कभी सोचा कहीं
मालिकों मर्जी क्या दरकार है मंजूर सब
#
कौन सन्नाटा बुलाता है अपने सामने
कौन ज्यादा लगता बीमार है मंजूर सब
#
ख़ामुशी को खुद भुनाने चले थे आप ही
आज दुखिया सारा संसार है मंजूर सब
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
263
221 1221 1221 122
अब रोज कहीं खेल तमाशा नहीं लगता
पहले सा ये मौसम कहीं अच्छा नहीं लगता
#
टूटी रहा करती हैं तेरी बालियाँ माना
गिरवी में अमानत रखा चेहरा नहीं लगता
#
मिलना जुदा होना है नसीबों से यहां पर
तू साँस भी लेता है तो जिन्दा नहीं लगता
#
लौटा दे मुझे कोई मेरे खोए से अरमां
आदत सी तुझे क्या हुई हैराँ नहीं लगता
#
सुन - सुन के पका हूँ मैं दिनों-रात कहानी
तुम लाख मिला लो मेरा किस्सा नहीं लगता
#
264
19.3.25
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
1212 1122 1212 22
मै एहतियात से अनजाने सोचता उसको
क़रीब दिल के इलाक़ेही रोकता उसको
#
वो ख़ूबियों को नहीं जानती मेरी लेकिन
मै हौसलों में कहीं रोज तौलता उसको
#
वो आग है तो चलो माना हम भी हैं क़ाफिर
हमारे बारे में है ख़ूब सब पता उसको
#
ये बद-हवास निगहबानी काम की होगी
शिकायतों में करूँ दर्ज लापता उसको
#
हमी थे जानते राहें वफा कहाँ जाती
अलग ये बात थी मालूम रास्ता उसको
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
265
19.3.25.
Hazaj musamman saalim
mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun
1222 1222 1222 1222
यही अपराध की दुनिया इसी से प्यार है मुझको
निवाला बाँट कर खाना कहां इंकार है मुझको
#
तरफदारी में तेरी तो लगे होते हजारों में
यहां हासिल जमा पूँजी में पहरेदार है मुझको
#
बँधे उम्मीद के धागे जहां दीवारो दर हर सूं
कोई ताबीज किस मतलब कहो दरकार है मुझको
#
खिरदमन्दो से मेरी इल्तिजा ये है न बोले यूँ
लगा दे आग चौराहे सबब तकरार है मुझको
#
शहादत की छपी ख़बरें या मुल्कों की लड़ाई हो
कहीं जो बाख़बर करता यही अखबार है मुझको
#
गरीबों को मिले रोटी हो पूरी सब तमन्ना भी
हवा इस मुल्क की बदले वो सारोकार है मुझको
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
266
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fa'ilun
12 12 1122 1212 22)
नसीब में तेरा होना नहीं बुरा सा लगे
अकेले दिल बुझ़ा तो शाम ही बुझ़ा सा लगे
#
थी रौनक़े यहां तेरे वज़ूद की क़ायम
चली जो दूर तो मौसम ये अनमना सा लगे
#
कहाँ तो शाख़ में होती थी शोरग़ुल ज्यादा
कहाँ उदास ग़मो में कोई घिरा सा लगे
#
यही वो शहर है आई थी मैं यहाँ दुल्हन
बदल गई फ़िजा फिर मन कहीं जुड़ा सा लगे
#
उमंग की क़िसी दुनिया में आदमी जी ले
मुखौटे नफ़रतों के पहने ग़र डरा सा लगे
#
उसूलों की जो मिसालें रखी है बुनियादें
किताब भी वही कानून- कायदा सा लगे
#
क्यों वक्त ने दिया हमको नहीं कोई मौक़ा
सियासी चाल तुम्हारा तो चोचला सा लगे
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
267
19.3.25
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
1212 1122 1212 22
मै एहतियात से अनजाने सोचता उसको
क़रीब दिल के इलाक़ेही रोकता उसको
#
वो ख़ूबियों को नहीं जानती मेरी लेकिन
मै हौसलों में कहीं रोज तौलता उसको
#
वो आग है तो चलो माना हम भी हैं क़ाफिर
हमारे बारे में है ख़ूब सब पता उसको
#
ये बद-हवास निगहबानी काम की होगी
शिकायतों में करूँ दर्ज लापता उसको
#
हमी थे जानते राहें वफा कहाँ जाती
अलग ये बात थी मालूम रास्ता उसको
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
268
20.3.25
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
1212 1122 1212 22
उजाले में उठो तो मामला बदल जाए
शिकायतों का यहां सिलसिला बदल जाए
#
जो आप देख लो जादूगरी कहीं अपनी
तुम्हारे जीने का सोचा हुआ बदल जाए
#
बदलती है नहीं रेखाएं हाथ की लोगो
नसीब का ही लिखा कायदा बदल जाए
#
थे होशियार वही जो कतार में बैठे
हवा के रूख कहीं फल-सफा बदल जाए
#
बड़े बड़ों की यहां सोहबत में रहता हूँ
पता नहीं कहाँ जा फायदा बदल जाए
#
अभी तो खींच कमाई के दिन नहीं बीते
अँधेरे में कहाँ फिर रास्ता बदल जाए
#
उसे महारतें हासिल है जुल्म सहने की
कहीं मसीहा बनाओ हवा बदल जाए
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
269..
26.3.25
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
2122 1122 1212 22
हम तिरे शहर से मायूस गुजर जाते हैं
उस गली में जहाँ मिलते थे ठहर जाते हैं
@
दस्तबस्ता हुए हमने ये जमाना देखा
लोग बीमार मिरे जैसे किधर जाते हैं
@
हम उसी के लिए क्या क्या न किए बैठे थे
वक्त पर वो कहीं खामोश मुकर जाते हैं
@
अब अदावत की झलक साफ हुई जाती है
वो शराफत के इरादों से बिफ़र जाते हैं
@
जो खयालों में कभी भूल के भी आ जाओ
हम परेशां तभी खुद ही निखर जाते है
@
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
@
270..
28.3.25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
क्यों ढूढ़ते अमन यहां तलवार बेचकर
क्या फ़ायदा हुआ तुझे क़िरदार बेचकर
#
अब लोग इस ज़माने में मिलते नहीं हमे
शाग़िर्द क़ातिलों के कहीं ज्वार बेचकर
#
वो अब कमा सकी है ग़ुजारे की नौकरी
महफ़िल नुमाइशें कहीं दीदार बेचकर
#
हर फ़ैसला अमीर को देता है राहतें
ख़बरें भी बेचता है तो अख़बार बेचकर
#
हक़ में ग़रीब के यहाँ क्या इंतज़ाम है
ख़लहान ख़ेत भी बचा क्या हार बेचकर
#
तुम क़ामयाबी के कोई परचम तो फ़हरा लो
लानत है आदमी हुए सरकार बेचकर
#
दुनिया तुझे सलाम करेगी यहाँ तभी
तुम छोड़ दो तमाशा भी तक़रार बेचकर
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
271
31.3.25
Ramal musamman saalim
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun
2122 2122 2122 2122
लोग बोलें तो सही राहों पता किसको दिया है
फैसला उसने कभी हक़ में बता किसको दिया है
कातिलों के शहर में आए अभी तुम अजनबी से
हरकतों से कोई वाकिफ़ ये बता किसको दिया है
छोड़ कर जाओ नहीं प्रियतम रंगून ऐसे हमे तुम
क़्या करोगे जानकर राहों हटा किसको दिया है
सल्तनत में थी हमारी बोलती औरों से ज्यादा
रौंद के पैरों तले तुमने दबा किसको दिया है
माजरा क़्या है नहीं मालूम हमको आज शायद
ये तरक्की सी हुई उसने हरा किसको दिया है
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
272
31.3.25
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
2122 1122 1122 22
हम ही चोरों कि तरह ख्वाब में आने लगते
तुमको ये बात बताने में जमाने लगते
#
फिर पलट के नहीं आया मुझे जो छोड़ा था
हम कयासों में जिसे और बुलाने लगते
#
आजमा लो मैं वही शोर बियाबानों का
जो मुक़द्दर कहीं ढूढो तो घराने लगते
#
मै जो बदनाम हुआ बोलो खता है किसकी
मेरी सीरत के कई घाव पुराने लगते
#
हैं मुसाफिर इसी दुनिया में अकेले हम तो
बोझ सा रोज सरे आम हटाने लगते
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
273
1.4.25
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
2122 1122 1122 22
आग पानी में लगी हो तो बुझाएँ कैसे
कोई रूठा हो बिना कारण मनाऍं कैसे
है अँधेरा घना कोई तो दिखाई देता
तुम कहो फ़िर ये निशाना ही लगाएँ कैसे
हम हवादिस के सताए हुए इंसानों को
और राहत के दिलासों में सताएँ कैसे
जब ये तासीर हमारी बुरी लगती तुझको
शौक के बादलों में तुझको बुलाएँ कैसे
रंग महफिल का उजाड़ा है किसी ने शायद
और महफिल में चलो रंग जमाएँ कैसे
अब दवा की जरुरत पड़ती नहीं है हमको
हम दुआओं में तुझे चाहें तो पाएँ कैसे
एक उल्फत ही निभाई है तिरे दरवाजे
और के दर कहीं ठोकर कभी खाएँ कैसे
सुशील यादव दुर्ग 7000226712
274
1.4.25
Muzare.a musamman aKHrab
maf'uul faa'ilaatun maf'uul faa'ilaatun
221 2122 2212 122
कुछ बात ही न करनी थी तो बुलाए क्यों थे
चुप था इरादे में तेरे तो सताए क्यों थे
#
ये जिन्दगी अभी बेतरतीब सी हुई है
यूँ रोज ख्वाब तुमने मुझको दिखाए क्यों थे
#
थी अश्कबार मेरी आँखे गमो की जद में
मै पूछती हूँ किस मकसद से रुलाए क्यों थे
#
तुम जानते थे कुछ फूलों में महक नहीं है
जूड़े में फिर उन्ही फूलों को सजाए क्यों थे
#
कुछ रंग बिखर सी जाती है इन हवाओं में तब
तुम गीत सब वफा के ही गुनगुनाए क्यों थे
#
रहना था हद में जाने- समझे थे हम यहाँ पर
फिर बारहा हमें तुम भी आजमाए क्यों थे
#
ये चार दिन बसेरा था जिन्दगी में शायद
यूँ लाख -लाख घर ये माटी बसाए क्यों थे
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
275
3.4.25
KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
2122 1212 22
काम अपना यूँ मोतबर कर लें
खुद को दुनिया से बा-खबर कर लें
#
मानता हूँ कमी है मुझमे भी
कुछ सुधारें चलो फिकर कर लें
#
रोज आती नहीं बहारें खुद
पत-झरों को जिला बदर कर लें
#
एक मुमकिन सवाल तुझसे है
साथ अपने वफा सफर कर लें
कौन पूछे जमाने की बातें
सामने है वही ठहर कर लें
#
है खराबी जो सोच में मेरे
ठीक उसको बहुत अगर कर लें
#
नासमझ लोग टकरा जाते हैं
फेर के चे'हरा इधर कर लें
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
276
2.4.25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
इन रास्तों में रोज गुजरना मुहाल है
खतरे हैं जान के यही रस्ता कमाल है
हम प्यार से नहीं कभी वाकिफ यहाँ रहे
ये प्यार सच कहो तो जमीनी बवाल है
है रतजगा यहाँ नहीं है आदमी सही
लड़की यहाँ खरीद ले पीछे दलाल है
संभावना की कोई नदी बहती थी यहाँ
सूखे किनारे चार तरफ तो अकाल है
जरखेज सी जमीन सभी बेच कर अभी
बस सामने मिरे बुरे सपने- ख़याल है
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
277
3-4-25
Jadiid musaddas saalim
faa'ilaatun faa'ilaatun mustaf'ilun
212221222212
भीड़ में कितना अकेला है आदमी?
पाव भर जितना ढकेला है आदमी।
मेरे अरमानों के होते जो पंख तो।
मैं बता दू क्या झमेला है, आदमी?
देख कर चलना सड़क को तुम आज भी
बस फिके छिलको में केला है आदमी
जो कमी थी अब हमारी खूबी वही
हाँ गुरू की शक्ल चेला है आदमी
मेहनतों में है मुकाबिल कोई नहीं
दंड बैठक रोज पेला है आदमी
जीत पाओगे कहाँ तुम घुड दौड़ ये
बस सियासत खेल खेला है आदमी
नीम जैसा हो कभी वो दातून वो
बस कहीं खट्टा कसैला है आदमी
जब जिला से जो बदर उसका क्या पता।
दुर्ग रहता कब सुपेला है आदमी?
सुशील यादव दुर्ग
278
7.4.25
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf
mufaa'ilun maf'uulun mufaa'ilun fa'ilun
1212 222 1212 112
नदी में पानी तो है बहाव की कमी है
ये देश की खामी या चुनाव की कमी है
#
मुझे है हासिल तेरी तमाम मुश्किल हल
उतार देता भी पार नाव की कमी है
#
चला नहीं क्यों औजार सरहदों कोई भी
विचार से मेरे रख-रखाव की कमी है
#
है आदमी दहशत में तमाम उम्र यहाँ
नसीहतें हैं भारी कटाव में कमी है
#
चढ़ा दे फाँसी दे- दे तमाम उम्र सजा
अदालतों मुंसिफ से बचाव की कमी है
#
उड़ी पतंगे तेरे ही सोच की यहाँ फिर
कहीं जरा पहले सी तनाव की कमी है
#
सुलग रहा है कैसे विवाद में अवसर
ये आग की कम तासीर, ताव की कमी है
#
जो कौड़ियों की कीमत बिका गरीब का तन
पता नहीं कोई तो उठाव की कमी है
#सुशील यादव दुर्ग
279
Ramal musamman saalim
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun
2122 2122 2122 2122
हम शराफ़त में कहीं तो आड़े, या तिरछे मिले हैं
होश में देखो हमे, हम ख़ुद कहीं बिख़रे मिले हैं
बस हक़ीक़त है यही, अफ़सोस जानोगी नहीं तुम
आँधियों में खुद की ताक़त, रोज ही ज़लते मिले हैं
सामने से अब हटा दो, रेशमी परदे यहां के
मेरी बीनाई को, क़ूवत देखने ग़हरे मिले हैं
आज क़ारोबार में धक्का लगा है, देखिए अब
लोग फिर नुक्सान से कितने, यहाँ हिलते मिले हैं
हम बग़ावत के नहीं बोते, फ़सल कोई यहाँ पर
दुश्मनी से आज भी हम, दूर तक हटते मिले हैं
थी बगीचे शान ओ शौक़त भी बिना तेरे मग़र हम
ताप से मुरझ़ाए शाखों ज़र्द से पत्ते मिले है
ये हमारी बात है औक़ात के बाहर नहीं तो
आदमी सूरत से हम भी खूब तो अच्छे मिले है
अब तलाशी खानदानो की तुम्हारी हो रही है
बोलते है लोग शायद हाथ में कट्टे मिले है
सुशील यादव दुर्ग
280
3-4-25
KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
2122 1212 22
क्या हैं क्या तो दिखाना पड़ता है
खुद को कितना सजाना पड़ता है
#
कौन खुदगर्ज को बताए ये
वक्त पे आजमाना पड़ता है
#
मय-कदे का नियम यही जानो
हैसियत से पिलाना पड़ता है
#
आप तशरीफ लाइए तो अब
बारहा क्यों बुलाना पड़ता है
सुशील यादव दुर्ग