break away from the shadows in Hindi Poems by sushil yadav books and stories PDF | साए से अलग होके

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साए से अलग होके

241..

28.2.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

 

2122 1122 1122 22

ज़िंदगी में कभी क्या सोचा हुआ होता है

यार, हर हाल पुराना ही नया होता है।

#

हार जाते जो कभी जीत के बाज़ी अपनी

तुमने सोचा कभी ये कितना बुरा होता है

#

साफ   तस्वीर के पहलू कई  होते मानो

तुमने अच्छा ही  अगर  देखा  बुरा होता है

#

अपनी नीयत की बुलंदी पे नजर रख लेना

लेख  अफवाह से अक्सर ही  भरा होता है

#

बोलो  ग़हराई नदी की  कहाँ तक हम  नापें

दिल उतर   सामने  ही डूब मरा  होता है

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

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1.3.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf

fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun

1122 1122 1122 112

अभी   जो जान गँवाना हो बग़ावत में रहो

निभेगी अब नहीं तुमसे बस अदावत में रहो

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कहीं  फ़ीकी न पड़ें रौनके महफ़िल की यहाँ

यहां उम्मीद के आलम इसी आदत में रहो

#

जहां ख़र्चे भी अगर आय  से ज्यादा कहीं तो

हदें जानो ऊसूलो से क़िफायत  में रहो

#

कोई बद- नाम करे और भी इल्ज़ाम धरे

लतेँ अपनी भी सुधारो या शराफ़त में रहो

#

यहां लोगो को दिखाना  बे-बसी  ही तुझे ग़र

कि अदालत इसी जनता की  क़हावत में रहो

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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2.3.25

Hazaj musamman saalim

mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun

"122 2 1222  1222 1222

#

गुनाहों पर कभी वो  फैसला  होने से डरता है

छिपाना चाहता खुद, लापता होने से डरता है

#

उसी की देख- भालों पर चला करती क़यामत भी

यही वो समझे बैठा पर, खुदा होने से डरता है

#

खराबी  ही नहीं मालूम, उसको पर जमाने से

शिकायत कर कहीं खुद के, जुदा होने से डरता है

#

वही हड़ताल में शामिल ,सियासत भी वही  देखे

मगर नौबत जहां फँसना, जुड़ा होने से डरता है

#

दिखा देता है रस्ता सब को, पहुँचा देता मंजिल तक

नहीं परखा क़िसी को, आइना होने से डरता है

#

बदौलत बस उसी के है जहाँ  में रौशनी कायम

वही सूरज अँधेरों के बड़ा  होने से डरता है

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

#


 

244..

 

2.3.25

Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun

22112211221122

 

देखा है मुहब्बत में, हया  कुछ भी नहीं है

हम आग से खेले हैं, किया कुछ भी नहीं है

#

मुमक़िन है किनारे में बिठा दोगे  मुझें तुम

परवाह किसे  है ये अदा  कुछ भी नहीं है

#

बस्ती में अभी, बाटने आया है  वो चादर

हमने क़िसी  लहज़े में, कहा कुछ भी नहीं है

#

ग़ुजरी है कई  रात बिना सोए हमारी

तेरी नमी यादों में, ज़िया कुछ भी नहीं है

#

आएंगे हमारी  वो,  हिफाजत के बहाने

उनको बता दो साफ, दिया कुछ भी नहीं है

#

सामान सभी  बेच दिए ज़ेरे- ज़मानत

लोगों ने कहा और   दग़ा कुछ भी नहीं है

#

इस मुल्क़ में आए दिनों होता है हँग़ामा

इस मुल्क़ क़सैली सी हवा कुछ भी नहीं है

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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245..

3.3.25

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fa'ilun

121 2 1122  1212  112

#

उसे  कहीं फ़ँसा दो फ़ायदा मिले न मिले

ये  अहमियत बता भी दो हवा मिले न मिले

#

जो आशियाँ  था हवेलीनुमा बना यहां पर

वही  मकान हवेलीनुमा मिले न मिले

#

वज़ूद तेरा सँभाला हुआ नहीं मिले गर

सँभावना है कहीं वो बचा मिले न मिले

#

हमे दिया नहीं जाता निजामें मुल्क़ कभी

ये हसरतें ले के कोई टिका मिले न मिले

#

मैं जानता  अहमियतें क़्या है वसीयत की

ज़मीन बाँट दो  हिस्सा कुआँ मिले न मिले

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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#


 

 

246

4.3.25

Muzare.a musamman aKHrab

maf'uul faa'ilaatun maf'uul faa'ilaatun

221 2122 221 2122

कब  रास्तों  में रिश्ता करके  दरार गुजरे

हम अजनबी निगाहों बचते हजार  गुजरे

#

वो फैसले सभी अब  लेने लगा है खुद ही

कोई दबाव लगभग हुए दर- किनार गुजरे

#

आएगा  एक दिन उल्फत में लिखा  उसी के

गो सामने से  उम्मीदों की बहार  गुजरे

#

रखने लगा हिसाबों  को बांधकर बिचारा

कब क्या पता कभी लड़की ले उधार गुजरे

#

मनहूसियत  सी छाई रहती है उसके दिल में

ख्वाहिश ये कारवाँ  कोई ले गुबार गुजरे

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सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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247..

5.3.25

Hazaj musamman aKHram ashtr makfuuf majbuub

maf'uulun faa'ilun mufaa'iil fa'al

222 212 1221  12

मौक़ा ए वारदात पाया क्यों गया

क़ातिल मुझको ही बोल उठाया क्यों गया

*

माटी के मोल थे नमूने  सभी तो

क़ारोबारी की ज़द में लाया क्यों गया

*

बस  था वो इश्तिहार आदम से जुड़ा

किसकी शह पे  इसे हटाया क्यों गया

*

समझाने में लगा  हुआ कौन किसे

समझौता  आख़िरी कराया क्यों गया

*

टूटे हैं चाहने में फिर  तुम को हमी

सदियों  ये ज़ुल्म आज़माया क्यों गया

*

जो थे तुम मुंतज़िर नहीं इनके  मतों

सरहद पे शहर के बसाया क्यों गया

*

देखा है पाँव तुमने अंगद के यहाँ

जीवन भर बे-मज़ा हिलाया क्यों गया

*

मेरे सारे उसूल थे सादगी के

मुझको कानून से फ़ँसाया क्यों गया

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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5.3.25

jamel murabba saalim

mufaa'ilaatun mufaa'ilaatun

12 122  12122

कहीं हक़ीक़त उतारनी है

कि ख्वाब मुझको सँवारनी है

*

उसे है मालूम आदमी को

सजायें सालो गुजारनी है

*

कोई मुसाफिर की तरह सोचे

थकान कितनी  सुधारनी है

*

पहुँच  में होगी कभी तो मंजिल

कि शान उसको बघारनी है

*

जमे नहीं  पैर  बन के अंगद

वो  पैर हमको उखाड़नी है

*

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

*

 


 

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6.3.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122   1122  1122  22

रात  भर उनको कभी याद किया करते थे

सब्र के हाथ में तक़दीर दिया करते थे

#

हौसलों में कमी कोई  नहीं थी लेकिन हम

ज़िँदगी की फ़टी चादर ही सिया करते थे

#

वक़्त की बे- दिली   हमने यहां पर है देखी

ज़िक्र  उसका  ही  सरे- आम किया करते थे

#

हाथ तलवार  मगर धार पुरानी लगती

ज़ंग लड़ते ज़रा  तो लोग हँसा करते थे

#

बेवफ़ाई कभी क़िश्तों में अगर की होती

ये ज़माना भी कहा होता वफ़ा करते थे

#

तुझको बेइंतिहा  चाहत ये  अख़र जाएगी

एक हम ही थे तिरे नाम  ज़िया करते थे

#

नाव क़ाग़ज़ की  जहाँ डूबती   थी बचपन में

हम अभी तक उसी जंगल में फिरा करते थे

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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#

 


 

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10.3.25

Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun

221 1221 1221  122

#

मुझसे हुआ अपराध  सजा क्यूँ  नहीं देते

हर बार  निगाहों  से  गिरा क्यूँ नहीं देते

#

सम्हाल रखे  हो मिरी गलती  को, हमी से

मिलते हैं हजारों में दबा क्यूँ  नहीं देते

#

आसूओं को तुमने बना डाला कहीं जरिया

ये अल्म ए तबाही को  बहा क्यूँ नहीं देते

#

जब भी तुझे तेरे किसी किरदार में ढूढा

हरदम  मिला दूजा ये बता क्यूँ नहीं देते

#

हैरान हूँ मै जादू-गरी देख तुम्हारी

क्या खूब ये  करती हो  पता क्यूँ नहीं देते

#

मजबूर निजामो का  भला हौसला  भी क्या

गर होता गुनाहों को हटा क्यूँ नहीं देते

#

लाचार गरीबों का कहाँ होता खजाना

हक़ में भी गरीबों  के लुटा  क्यूँ  नहीं देते

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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10.3.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

21221122112222

#

देख के रूप मुसाफ़िर ही ठहर जाएगा          

गर बुरा वक़्त हो तो वो भी गुज़र जाएगा

#

सोचता हूँ मैं बयाँ कर दूँ हक़ीक़त अपनी

साथ मेरे  उसे  नश्तर सा उतर जाएगा

#

रोकता हूँ  कि गलत- फ़हमी अँदाजा ना हो

कौन अब राह से लौटा हुआ घर जाएगा

#

बारहा  तुमने कहा औऱ हमी ने माना

बारहा  यूँ  हुआ तो हमको अख़र जाएगा

#

अब नहीं कोई शिक़ायत हमे मंज़िल ज़ानिब

जब है ज़न्नत  यहाँ तो कौन उधर जाएगा

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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10.3.25

Mutdaarik murabba maKHl_ muzaa.if

faa'ilun fa'al faa'ilun fa'al212 12   212 12

आदमी हो दमदार  होली में

आओ कर लें तकरार होली में

कौन चिपका देता है गलियों में

लफ्ज  लज्जतों -दार  होली में

बाँटता रहा हूँ मैं  जिंदगी

हँस खरीदो तुम यार होली में

सब के हैं मजे अपने अपने से

मेरी है वो बीमार होली में

ले के  आऊंगा  अबीर बस

जानू रहना  तैयार होली में

गाल  में चमक लाल- लाल है

गोरी खुद है किरदार होली में

सब की नींद भौजी उड़ा रही

है पड़ौस  संसार होली में

हाथ मेरे चक्कू- छुरी  लगा

हाथ उसके तलवार होली में

है कबीर  चादर ये मैली सी

ओढ़ फिरते हर बार  होली में

रंग  डाल जाया नहीं करो

गिर-गिटो  जनाधार होली में

ये हवस  मिटेगी नहीं कभी

डालो सारे हथियार होली में

 

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

253

तवील मुरब्बा सालिम

फ़ऊलुन मुफ़ाईलुन

1221222

उसूलो में  आदमी है

तभी तक ये ज़िंदगी है

@

रहे दिन जो  गर्दिशो में

ये क़िस्मत की बस कमी है

@

सज़ा के तू आइना रख

मगर धूल मुँह  ज़मी है

@

किसी ज़िद को याद करो

बहाना है बेबसी है

@

यही साफ़  क़ायदा है

कि चुपचाप सादगी है

@

बुझाना  पहेलियाँ भी

ये शब्दों की बस ठगी है

@

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

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Hazaj musamman saalim11.3.25

mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun

1222  1222 1222 1222

यहां अब भीड़ में कोई  हमें रस्ता नहीं देता

है मंज़िल दूर मन को बात ये समझ़ा  नहीं देता

#

ख़जाने  ढूढ़ते हो आप दीग़र बात  खंडहर में

सियासत जानता है तू उसे बहका नहीं देता

#

करे क्या, पेड़ का हमको नहीं मालूम, तुम बोलो

ये राहें घेरता है बस मगर साया नहीं देता

#

हमी  तो जानते,  कैसी है नीय़त आदमी की अब

यूँ  ही बुनियाद को क़मजोर वो बतला नहीं देता

#

कहीं चारा-ग़रों  से पूछना होगा बता भी दें

दवायें लिख मरीजों को भला  धोक़ा नहीं देता

#

शरीफ़ों की  ये बस्ती है मिले रहते हैं आपस में

कोई भी आदमी दूजे को अब झांसा नहीं देता

#

मिला करती ज़माने में उसी को शोहरतें शायद

खु़दा से माँगता है कुछ भी तो पैसा नहीं देता

#

हिमाय़त  भी ये कैसी  है वही जाने बड़ा भाई

ज़मीने बाँटता है और वो टुकड़ा नहीं देता

#

वही तो जानता  बाज़ीग़री चाहत की अच्छे से

वो अपने इल्म का लेकिन  कहीं तड़का नहीं देता

#सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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11.3.25

2122 1122  1122

खुद हो के हमको सँवरना नहीं आया

इश्क में गहरे   उतरना नहीं आया

@

खामुशी को  कभी  पढ़ना नहीं सीखा

आदमी हम को   कुतरना  नही आया

@

डूबते  वक्त हमारी थी ये हसरत

क्यों किनारों पे उभरना नहीं आया

@

रोग लगता ही नहीं हमको किसी दिन

यूँ कि बीमारियों  डरना नहीं आया

@

वादा जो करते उसे हम हैं निभाते

हमको वादों  से मुकरना नहीं आया

@

सेंक लो रोटी इसी बात जी  नेता

खेत औरों जहाँ  चरना नहीं आया

@

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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256

१२.3.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122 1122  1122 22

खुद हो के हमको सँवरना नहीं आया अब के

इश्क में गहरे   उतरना नहीं आया अब के

@

खामुशी को  कभी  पढ़ना नहीं सीखा हमने

आदमी हम को कुतरना  नही आया अब के

@

डूबते  वक्त हमारी थी ये हसरत तब भी

क्यों किनारों पे उभरना नहीं आया अब के

@

रोग लगता ही नहीं हमको किसी दिन बेजा

यूँ कि बीमारियों  डरना नहीं आया अब के

@

वादा जो करते उसे हम हैं निभाते मानो

हमको वादों  से मुकरना नहीं आया अबके

@

सेंक लो रोटी इसी बात जी  नेता तुम भी

खेत औरों जहाँ  चरना नहीं आया अब के

@

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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257

12.3.25

221 221 2 21 22

मंजिल के तेरे इशारे कहाँ है

डूबी नदी खुद किनारे कहाँ है

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कैदी बने हैं विधायक यहां के

कुछ लोग अच्छे थे सारे कहाँ है

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हम छोड़ आए हैं फिर बादशाही

अब वो हुकूमत  नजारे कहाँ है

@

लम्हा उदासी का गुजरा है धीमे

माहौल होली नगाड़े कहाँ  है

@

दिल तुमको देकर कहा था सँभालो

पूछा  तू ने चाँद तारे कहाँ है

@

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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258..

13.3.25

1212 1122  1212

ग़रीबों  में यही   ख़ैरात बाँट दो

तसल्लियों  की उन्हें रात  बाँट दो

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अमन  की हो वहां बारिश भी झूम के

ज़ुबान खूब शराफ़ात बाँट दो

#

फ़िज़ा में घोल रहे नफ़रतें यहाँ

नज़रिये  में नए हालात बाँट दो

#

है जँग की जहां मज़बूरियां उसे

उसूल तोड़ ख़यालात बाँट दो

#

रहा नहीं कभी मेरे करीब वो

मिले नसीब के ज़ज्बात बाँट दो

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

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212211221122222

खुद हो के हमको सँवरना नहीं आया होली में

इश्क में गहरे   उतरना नहीं आया होली में

@

खामुशी को  कभी पढ़ना नहीं सीखा था हमने

आदमी हम को कुतरना  नही आया होली में

@

डूबते  वक्त हमारी थी ये हसरत इतनी सी

क्यों किनारों पे उभरना नहीं आया होली में

@

रोग लगता ही नहीं हमको किसी दिन बेकाबू

यूँ कि बीमारियों  डरना नहीं आया होली में

@

वादा जो करते उसे हम हैं निभाते हैं हरदम

हमको वादों  से मुकरना नहीं आया होली में

@

सेंक लो रोटी इसी बात जी  नेता  मुस्काते

खेत औरों जहाँ  चरना नहीं आया होली में

@

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

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17.3.25

Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun

(221 1221 1221 122)

साए से अलग होके  वो जाते  नहीं होंगे

अन्धेरे   उसे रोज सताते नहीं होंगे

#

बस एक मुलाक़ात से वाकिफ हो गया  हूँ

वो रोज   मुसाफिर बने   आते  नहीं होंगे

#

नफरत  की ये दीवार  गिराना है जरूरी

मै जानता हूँ और बताते नहीं होंगे

#

उसकी मुझे  आदत  कभी अच्छी लगा करती

अब जूडे में  फूलो  को सजाते नहीं होंगे

#

ये खौफ का मंजर  तिरे ही शहर में ज्यादा

कुछ  कील  इरादों के गडाते नहीं होंगे

#

आए दिनों की बात भरोसा  सदा  टूटा

ताबीज  सदाचार बँधाते    नहीं होंगे

#

कुनबा बड़ा हो जाए वहीं खून खराबा

मोहब्बतों  के कोने समाते नहीं होंगे

#

वहमों  का है भूगोल  यहां तारी  सभी पर

हम रोज तो गंगा में नहाते नहीं होंगे

#

सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)