221..
122 122 122 122
जो तुम देखती हो वो हम देखते हैं
खुदा की नुमाइश करम देखते हैं
#
वजूद आज मुझ सा नहीं है किसी का
यहाँ लोग खुद को ही कम देखते हैं
#
मुझे आजमाने चला था ज़माना
उसे दो बता कुछ जनम देखते हैं
#
खुलासा हुआ समझो जब सादगी का
नजर फेर के अब सनम देखते हैं
#
हूँ मै मुंतजिर जिन्दगी रूबरू हो
चलो खास बहके कदम देखते हैं
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
222..
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
22121211221212
#
अपने ही धुन में थोड़ी हक़ीक़त दिखाई दे
हर सादगी मुझें तिरी सूरत दिखाई दे
#
तेरी निगाह में कोई तो खोट आ गई
हर दोस्ती तुझे क्यों अदावत दिखाई दे
#
हम एक वो जो मानते रस्मो- रिवाज को
लोगों को ये सियासती चाहत दिखाई दे
#
अब फ़ैसलों में हामी भरेगा नहीं कभी
तेरे इरादों साफ बग़ावत दिखाई दे
#
कल आसमान छूने पहुंचा था आदमी
साए से आज उसके ही दहशत दिखाई दे
#
ज़िन्दा है ज़िस्म इसकी हिफ़ाज़त किया करो
लफ़्जो में कम से कम यही हरक़त दिखाई दे
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
223....
16.2/25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
मुझको मिरे नकाब में रहने नहीं दिया
इक फूल बन किताब में रहने नहीं दिया
#
सब लोग सूंघ कर चले जाते हैं आज भी
खुशबू किसी गुलाब में रहने नहीं दिया
#
मै भूल जाऊ उसको ये मर्जी कहाँ रही
वो भी तमाम ख्वाब में रहने नहीं दिया
#
ये मय-कशी की रात थी होशोहवास में
बाकी नशा शराब में रहने नहीं दिया
#
अंदाज था यही, है हिफाजत से जिंदगी
मुझको मगर हिसाब में रहने नहीं दिया
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
#
224..
17.2.25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
मेरा वज़ूद तुझसे भुलाया नही गया
बाकी उधार था जो चुकाया नहीं गया
#
हम ज़िंदगी के मेले तो ख़ुश हो चला किए
दुश्मन से बोझ़ रोज उठाया नहीं गया
#
हम ग़म को बाँट कर ख़ुशी माँगे नसीब से
अहसास रास्तो से हटाया नहीं गया
#
देखो ज़िधर उधर ही मुसीबत बुला रही
हमलावरों से मुल्क़ बचाया नहीं गया
#
अवसर तो आपदा से निकाले है लोग भी
हमसे क़िसी अँदाज कमाया नहीं गया
#
जाने खिला रहे है भरी धूप चांदनी
क्यारी में एक फूल खिलाया गया नहीं
#
जो तोड़ना ही जाने उसूलो को आए दिन
उनसे तो उजड़ा गांव बसाया नहीं गया
#
मनमानी लोग जो दिखा जाते यहाँ वहां
तेवर 'सुशील' तुमसे दिखाया नहीं गया
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
225..
१८.2.25
Ramal musaddas mahzuuf
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilun
2122 2122 212
काटो दामन खींचलाता आदमी
कुछ बुरे संगत बचाता आदमी
#
तुमने हाथो में थमाया झुन-झुना
हर ख़ुशी -गम में बजाता आदमी
#
मेंहनतों एक दरिया आग भी
बारहा डुबकी लगाता आदमी
#
भीड़ में कोई कुचल देता उसे
सबसे यूँ ही लात खाता आदमी
#
खर्च आमद से कहीं ज्यादा मगर
पालने घर को कमाता आदमी
#
तुमने राहों में जँगल बो डाले हैं
वो अकेले ही हटाता आदमी
#
शर्म की दीवार ऊँची हो गई
और दहशत में लजाता आदमी
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
#
226...
18.2.25
unnamed
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun fe'
2122 2122 2 122 2
बात ज़ाहिर हो अभी कितना ज़रूरी है
राज़ को परदे में भी रखना ज़रूरी है
#
शक़्श जो अपराध की दुनिया के होते हैं
जानना इतिहास तो उनका ज़रूरी है
#
क़ातिलों से हमने इतना ग़रचे सीखा है
बुज़दिलो का घर बचा पाना ज़रूरी है
#
फिर तलाशी में निकल आए पता लेकर
खोई है उम्मीद लौटाना ज़रूरी है
#
अब यहाँ रिश्तों की फिर बुनियाद हिलती है
टूटे रिश्तों राह पे लाना ज़रूरी है
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
#
227
19.2.25
Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun
2122 1122 1122 112
ख़ैरियत मेरी नहीं जान सका बैठ गया
मैं भी चुपचाप उसे नब्ज़ दिखा बैठ गया
#
मुझ पे इल्ज़ाम लगाते, कभी आ कर देखा
एक तरफ़ा मुझे क़ातिल ही बता बैठ गया
#
कोई समझौते की उम्मीद रखूं आखिर क्यों
सपनो का ताज महल आज गिरा बैठ गया
#
है तसल्ली मुझे शायद यहाँ तुमने चाहा
कौन ग़ैरो की सुने कुछ भी कहा बैठा गया
#
रोना मुझको है फ़क़त बात पहुंची भी नहीं
बीच गहरे में गया और नहा बैठ गया
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
#
228..
19.2.25
बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़ मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22 22 22
दर्द जहां मैं टांगा करता टूटी आज वो खूँटी लगती
रिश्ते नातों की बाते सारी एक सिरे से झूठी लगती
#
क़शिश कहां थी मेरे शब्दों में जो तुमको भरमा लेता
क़िस्मत की रेखाए तुम बिन मुझको छोटी- छोटी लगती
#
वो बचपन के खेल खिलौने बेमतलब का रोना- धोना
पीछे गुम होती गलियों में पारस जड़ी अँगूठी लगती
#
उत्साहित होकर हमने ज्यादा क्षमता से काम किया है
एक निवाला ही शहद से मीठी प्यारी हमको रोटी लगती
#
दीप उमंगो के जला मनती रहे तेरी हर रोज दिवाली
हमको हरदम यूँ पीठ छोलती महँगाई की सूटी लगती
#
सुशील यादव दुर्ग 7000226712
#
229..
21.2.25
hazaj musamman akhrab
maf'uul mufaa'iilun maf'uul mufaa'iilun
221 1222 221 1222
#
आखों में मेरी अब कोई ख्वाब नहीं पलते
जुगनू न अँधेरों में बेहोश हुए जलते
#
दर के तिरे ठुकराए खामोश हुए हम भी
मकसद से भटक जाते जो दूर जरा चलते
#
वो दर्द के अश आरों को कहने बहुत माहिर
आसान कोई मुश्किल सी बात जुबाँ कहते
#
सहरा के मुसाफिर थे हम भी क़िसी गर्दिश में
अब तेरी रियासत बदली घूप नहीं सहते
#
सीखा है मुहब्बत में जी जान लगा देना
पर मानो बहुत खामोशी से जिया भी करते
#
सुशील यादव दुर्ग (C.G.)
7000226712
230..
22.2.25
Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun
2122 1122 1122 22 ( 112 )
कौन कहता है ज़माना ये तिरा देख लिया
मिल के तुमसे कहीं सदियों की ख़ता देख लिया
#
हमने ज़ालिम उन्ही लोगों की दुआ मांगी है
जिनके कन्धो पे टिकी ग़ोया वफ़ा देख लिया
#
इस मुहकमे के मुलाजिम सभी नल्ले लगते
काम क़मजोर मगर हाथ हिना देख लिया
#
मुल्क़ की सोच तुम्हे कहते कि खाई जाती
सोच खाने की है ये मुल्क़ जरा देख लिया
#
अब न होगी कहीं नफ़रत की खड़ी दीवारें
तुमने जो बोया बबूलों को सदा देख लिया
#
सुशील यादव दुर्ग (C.G.)
7000226712
231..
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221.2121.1221.212
कल रात वो नकाब उठा कर चले गए
तारीख इक तबाही बता कर चले गए
#
चाहा था बेच दूँ टके भावो इमान को
वो भाव मर्जी अपनी गिरा कर चले गए
#
तन्हाई में उसे कभी सोचा हो वैसे ही
दुनिया को सामने ही हटा कर चले गए
#
उनका ख़याल तो हरा कर देगा ज़ख्म को
वो इत्मिनानो- सब्र पढ़ा कर चले गए
#
मुश्किल हुई उसे भुला पाने में आज तक
सूरत अमिट निगाह बिठा कर चले गए
#
वो झांकते है मेरी इबादत में जब कभी
नेकी की राह खूब दिखा कर चले गए
#
सुशील यादव दुर्ग (cg)
232..
221 2121 1221 212
अब कौन कहता उसको वो तन्हा रहा करे
नजदीक आके बस मिरा हिस्सा रहा करे
#
डरती हूँ खो न दूँ उसे मेले में जिन्दगी
रहना उसे जहाँ भी हो ज्यादा रहा करे
#
है सादगी उसे जरा भाती कभी- कभी
मै रोकती कहाँ उसे सादा रहा करे
#
सब तोड़ते रहे यहाँ अपने ही कौल को
आता है जो निभाना तो वादा रहा करे
#
कुछ गुनगुनाने का कोई भी शौक फरमा ले
धुन कोई भी हो राग में गाता रहा करे
#
संजीदा है तू अपने ठिकाने सुशील फिर
बन के कभी -कभी तो तमाशा रहा करे
#
सुशील यादवदुर्ग दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
233..
Ramal musamman mahzuuf
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilun
2122 2122 2122 212
हम तो पहले ही शराफ़त दूर पहचाने गए
बाद मेरे सब मुसीबत वाले दीवाने गए
“
जानते औकात अपनी लोग सब अक्सर यहाँ
लोहा अपनी हैसियत अफ़सोस मनवाने गए
“
अब यहां बारिश का होना है नहीं मुमकिन मगर
छत में छातों को ले कर इक बार अजमाने गए
“
कामयाबी सर उसी के बोलती है अब यहाँ
जो तरफदारी नकाबों पहने पहचाने गए
“
एक दिन की तो फ़क़त मोहलत भी देता वक्त गर
रोक देता आदमी जो बात उलझाने गए
“
सुशील यादवदुर्ग दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
234..
25.2.25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
वो एक घर तू ने जिसे मकतल बना दिया
मुझको बता के सर-फिरा कातिल बना दिया
#
बर्बाद आरजू मेरी तुमको जहाँ दिखी
कैसे मुझे ही घेर के घायल बना दिया
#
अफसाना चाहतो का सुनाते कभी - कभी
मजबूर बात चीत से कायल बना दिया
#
मै सुर्ख़ियों में आज तो आ ही गया यहाँ
अख़बारो- इश्तिहार में हलचल बना दिया
#
जो डाकिया था बाँटता पैगामे- जिन्दगी
उसको अतीत किस्सा ही केवल बना दिया
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
#
235...
24.2.25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
अरमान जिंदगी का बुझा कर चले गए
अहसान एक और जता कर चले गए
#
जाना था उसको मेरी नजर से जो दूर क्यों
ख्वाबो में चाँद- तारे दिखा कर चले गए
#
मैं मॉँगती रही तुझे देनी थी जिंदगी
तुम बस रसीद आह थमा कर चले गए
#
नफ़रत किसी जमात से रुकती नहीं कहीं
इस मुल्क आग आज लगा कर चले गए
#
इस ओर आ रही है बहारो में ताजगी
इस नाम तो करोड़ कमा कर चले गए
#
सदियों के बाद रुकती अदावत जमाने से
तुम इश्तिहार एक लगा कर चले गए
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
#
236...
25.2.25
2122 1212 112
कौन मरता यहाँ किसी के लिए
ज़िन्दा जु़ग़नू है रोशनी के लिए
#
हम उठा चलते हैं सलीब मगर
पूछता कौन सादगी के लिए
#
नस्ल कैसे सुधर सकेगी ,कहाँ
एक मन्दिर है बंदगी के लिए
#
देखते ही रहोगे आइना तुम
ज़िन्दगी रोती ज़िन्दगी के लिए
#
कौन क़ुर्बान आबरू को करे
दुःख की बेइंतिहा घड़ी के लिए
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
#
237..
25.2.25
KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
2122 1212 22
जब मिटा के तुझे सँवारा हो
खेल ऐसा है तो दुबारा हो
#
लोग मिलने मुझे नहीं आते
कब उन्हें मैंने भी पुकारा हो
#
ये शिराजा बिखर न जाए अब
कुछ करीने से जो निखारा हो
#
बोलती अब नहीं ये तस्वीरें
रोज फटते बचा किनारा हो
#
चाँद निकला जमीन पर देखो
आसमा ताकता सितारा हो
#
बाटता है नसीब का हिस्सा
मेरे हिस्से का मुझ गवारा हो
#
ये सियासत तभी रुकी होगी
इसका पुर्जा कोई खटारा हो
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
#
238..
26.2.25 mahashivratri
KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
21 22 1212 22
#
धूल किस्मत में अब जमी सी है
तू नहीं साथ ये कमी सी है
#
आसुओ को निकल भी जाने दो
दर्द भीतर अभी बसी सी है
#
साथ बीते ख़ुशी के कोई पल
जिन्दगी में यही खुशी सी है
#
वो दिखाता नहीं हुनर अपना
खूब उसकी ये सादगी सी है
#
आने से उसके जिन्दगी लौटी
अब अँधेरे ए रौशनी सी है
#
हाथ बाँधे औ बेडियाँ पैरों
और कितनी सुलह कसी सी है
#
तंग-हाली के दिन कहाँ बीते
नाव मझधार में फँसी सी है
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
239..
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fa'ilun
1212 1122 1212 22
तेरी लकीर को हाथो से अब मिटाते हुए
मैं थक गई हूँ ये दुनिया को दुःख सुनाते हुए
#
अजीब हाल है इस दिल का तुम अगर मानो
बची नहीं कोई ताकत तुझे सताते हुए
#
हैं लोग शहर में ऐसे भी जिंदगी जीते
जो इश्तिहार यहीं सादगी लगाते हुए
#
लिया- दिया यहीं रह जाएगा तुम्हारा भी
ये पाप- पुन्य के मंदिर कहीं बनाते हुए
#
चलो अभी उन्ही पेड़ों के नीचे बैठे हम
वफा के गीत पुराने ही गुनगुनाते हुए
#
किताब में लिखा हमने पढ़ा यही काफ़ी
ये सीख ज्ञान की उतरे किसे हटाते हुए
#
मेरा नसीब पहाड़ों में चढ़ के देखा है
बुरा हुआ गिरे जोरों से डगमगाते हुए
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
240..
28.2.25
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
21 22 1122 1122 22
मत पुकारो मुझें यों याद ख़ुदा आ जाए
भेज दो पुर्ज़ा मुझें ख़त ही लिखा आ जाए
#
आज़माते मुझें रहना क़िसी दिन ग़र्दिश में
काम तेरे कभी माँगी वो दुआ आ जाए
#
आज लगते वहां मेले जहां हम मिलते थे
कोई सुनसान से रस्ते में किला आ जाए
#
मुंतज़िर हूँ ‘हाँ’ तेरी ओर से सुन लूँ मैं भी
इससे पहले कोई इंकार तेरा आ जाए
#
जिस हक़ीक़त से यहाँ रोज रहा है नाता
जान के बदले में अच्छी सी बला आ जाए
#
सुशील यादव दुर्ग (छ.ग.)
7000226712