17.3.26
हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222
,
इशारों में कहीं पर कुछ, निशानी छोड़ आते हैं
जिसे समझो तुम्ही मन से, कहानी छोड़ आते हैं
,
ये अपनी कोई आदत है, नहीं मालूम हमको भी
अदावत जिससे करते हैं, जवानी छोड़ आते हैं
,
हुआ ये हाल अपना भी ,बगीचे में किसी दिन तो
घड़ी भर राह तकने, ख़ुद के मानी छोड़ आते हैं
,
हमी तो मोल ठहराते कहीं, सामान की हरदम
हमी सौदा कहीं पे ,बद-जुबानी छोड़ आते हैं
,
पटाना बस नहीं आया ,कहीं क़िस्मत हमें अपनी
ये ऐसी शय जहाँ पे , जिंदगानी छोड़ आते हैं,
,
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
2.
17.3.26
Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun
221 1221 1221 122
.
जब दिल मिरा टूटा मुझे आराम ना आया
ये भी तो कबाड़ी के किसी काम ना आया
.
हम दर्द के मारों का नहीं ठौर- ठिकाना
हद से भी गुजरता हुआ पैग़ाम ना आया
.
क्या खास मुलाकातें, बिताई हुई रातें
कुछ आम सी हरक़त किसी के काम ना आया
.
जीने का मज़ा और हुआ करता था मुझको
जाने का जहाँ तक तिरा फ़रमान ना आया
.
साँसे भी लिया करते हमी पूछ जहाँ से
बाज़ार में राहत नया सामान ना आया
.
हम अजनबी सूरत लिए बैठे रहे दिन- भर
बातें सुनी अपनी कोई पहचान ना आया
.
उम्मीद हज़ारों की मिली फूलती- फलती
किस्मत का धनी था वहीं मेहमान ना आया
.
बे- दर्द जमाना, कहाँ फहराते हो झंडे
बारूद का मलमा दबा फिर जान ना आया
.
बस जंग न बेचो ये मिसाइल के बताशे
बरबादियों का जश्न से मुस्कान ना आया
.
सुशील यादव दुर्ग
3.
16.3.26
मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22
.
ये ज़िन्दगी का बहाना बहुत पुराना था
तुझे तो साथ मिरे चल के दूर आना था
.
शिकायतों का लँबा सिलसिला चलेगा कल
बग़ावती सभी मुखबिर यहीं ठिकाना था
.
पसीने छूट रहे कातिलों के थाने में
सिपाहियों का दिखा बंदुके सजाना था
.
यहां किसी को विरासत जमीन मिलती है
हमे तो खंडरें ही नाम का खजाना था
.
क्या बोते और कभी काटते फ़सल क्या- क्या
कहीं तो धार भी सीखा नहीं लगाना था
.
ये चालबाजियां को देख के गुमा होता
कतार में तिरा होना फ़क़त बहाना था
.
तमाम शहर है चस्पा ये इश्तिहार मेरा
बुराइयों यहीं नामोनिशा हटाना था
.
वो आंकते भी नहीं हैसियत का गुब्बारा
'सुशील' कितने दबाओं इसे फुलाना था
.
सुशील यादव दुर्ग
.4.
14.3.26
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
*
आदत नहीं मैं खोल दूँ, बातें हजार की
अब जिक्र क्या करूँ मिरे, शब इंतिजार की
*
हर एक ज़िन्दगी में ,कई मोड़ आते हैं
आई थी ऐसी रातें ,हमारे क़रार की
*
तेरी तरफ से मै नहीं, सदका भी कर सका
क्या हाल देख ले ,तेरे कातिल शिकार की
*
राहत नहीं मिली हमें, रहमत के दौर में
हासिल नहीं हुई , कभी रोटी जुआर की
*
बाजी लगा के हम, यूँ ही बैठे थे सामने
गलती तिरी कमाल की, हमने सुधार की
*
अब फैसला भी आएगा ,कोई तिरे खिलाफ
होगी ढलान पे सभी, राहें उतार की
*
अब वक्त आ गया हमे, रुखसत मिले यहाँ
पहनी हुई तमाम, कमीजें उधार की
*
सुशील यादव दुर्ग