सामर्थ्य अखंडित बना रहे
(काव्य - संग्रह)
"सामर्थ्य मात्र बाहुबल का पर्याय नहीं, अपितु पराभव के भस्म अवशेषों से पुनर्जीवित होने के उत्कट संकल्प का उद्घोष है।"
'सामर्थ्य अखंडित बना रहे' केवल छंदों का संकलन नहीं, वरन उन अंतर्निहित वेदनाओं, प्रसुप्त संघर्षों और स्वाभिमान की उस प्रज्वलित अग्नि का काव्यात्मक प्रलेख है, जो मानवीय चेतना के अंतस्तल में निरंतर प्रवाहमान है। सुविज्ञ रचनाकार 'ईशू' की लेखनी से प्रस्फुटित यह संग्रह जीवन के विविध सोपानों—पुरुषार्थ, वियोग, राष्ट्रभक्ति और आत्म-साक्षात्कार—को एक सूत्र में पिरोता है।
यह कृतित्व उन अजेय योद्धाओं को समर्पित है -
* जो अपनों के छल से क्षत-विक्षत होकर भी, मेरुदंड सीधा कर शत्रुओं की आँखों में आँखें डाल खड़े हैं।
* जो ग्रामीण अंचलों की धूलि से उठकर महानगरों के पाषाण-हृदय परिवेश में अपने अस्तित्व का उत्खनन कर रहे हैं।
* जो शून्यता के अंधकार में स्थित होकर भी संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी मुट्ठी में बांधने का साहस रखते हैं।
इस संग्रह के स्तंभ -
वीर रस का ओज - जहाँ विखंडित खड्ग लेकर खड़ा सैनिक भी उद्घोष करता है— "चिंतित हैं, भयभीत नहीं हैं!"
ग़ज़ल की सूक्ष्मता - जहाँ छद्मवेशी समाज और पतनशील मानवीय मूल्यों का मार्मिक विश्लेषण है।
करुण और भावुक पक्ष - गृह-त्याग की विवशता और स्मृतियों के गलियारे में भटकते मन का सजीव चित्रण।
दार्शनिक चेतना - जहाँ 'बुद्ध' की शांति और 'चाणक्य' की नीति के माध्यम से आधुनिक द्वंद्वों का समाधान निहित है।
'ईशू' की काव्य-दृष्टि पाठक की आत्मा से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करती है। ये पंक्तियाँ आपको भग्न नहीं होने देतीं, अपितु आपके आत्मविश्वास को पुनः धार प्रदान करती हैं। यह संग्रह एक दिव्य आह्वान है—कि कालचक्र कितना भी प्रतिकूल हो, नियति कितनी भी निष्ठुर हो, मनुष्य के भीतर का 'सामर्थ्य अखंडित बना रहे'।
रचनाकार की ओर से -
"जब समस्त विश्व आपको पराजय स्वीकार करने का परामर्श दे, जब निस्तब्धता आपकी सामर्थ्य को अवरुद्ध करने का कुचक्र रचे, तब इन पृष्ठों में शरण लेना। ये पंक्तियाँ आपको बोध कराएंगी कि आप उस अक्षुण्ण तत्व के अंश हैं जिसे मर्दन तो किया जा सकता है, किंतु विलोपित नहीं।"
प्रस्तावना
'सामर्थ्य'—यह मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विद्यमान उस ईश्वरीय अंश का प्रमाण है जो पराजय की राख से भी पुनर्जन्म लेने का साहस रखता है। जब जीवन के रणक्षेत्र में परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों, जब अपनों के ही हाथों में साज़िशों के खंजर हों, और जब समय की गति हमारे विरुद्ध खड़ी हो जाए, तब हमारे भीतर की जो शक्ति हमें झुकने से रोकती है, वही सामर्थ्य है।
'सामर्थ्य अखंडित बना रहे' उन तमाम संघर्षों का काव्य-दस्तावेज़ है, जिन्हें अक्सर हम शब्दों में नहीं ढाल पाते। यह संग्रह उन युवाओं के नाम है जो अपनी जड़ों से कटकर शहरों की अनजानी भीड़ में अपनी पहचान खोज रहे हैं। यह उन योद्धाओं के नाम है जो घायल होकर भी रणभूमि छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
इस संग्रह की यात्रा 'शून्य' से शुरू होकर 'अनंत' तक जाती है। इसमें जहाँ एक ओर 'सावधान! हम घायल हैं, पर भयभीत नहीं हैं' जैसी उग्र हुंकार है, वहीं दूसरी ओर जीवन के कटु सत्यों को उजागर करती ग़ज़लें और घर छोड़ने की विवशता को दर्शाते मार्मिक गीत भी हैं। मेरी लेखनी ने यहाँ केवल शब्द नहीं बुने हैं, बल्कि अपने अनुभवों को लहू बनाकर कागज़ पर उतारा है।
एक लेखक के रूप में मेरा यह मानना है कि कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह वह मशाल है जो घोर अंधकार में भी मार्ग प्रशस्त करती है। यदि इन कविताओं को पढ़कर किसी एक टूटते हुए मन को फिर से खड़े होने का साहस मिले, तो मैं अपने इस सृजन को सार्थक समझूँगा।
आइए, इस काव्य-यात्रा में मेरे सहभागी बनिए और अपने भीतर के उस विश्वास को फिर से जगाइए जो कहता है—चाहे कुछ भी हो जाए, हमारा 'सामर्थ्य अखंडित बना रहे'।
— संदीप सिंह 'ईशू'
साहित्यकार
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