“मां ने बैंंक में अपना खाता कब खोला?” मां की स्मृतियों में से एक नई कड़ी मैं ने खोलनी चाही। उनकी मृत्यु के छठे दिन के बाद भी बाबूजी और मैं उन की बातों से अघाए न थे।
“वह संदर्भ याद रखने लायक नहीं,”बाबूजी गंभीर हो गए, “तुम केवल यह सोचो उन का वह खाता वक्त- बेवक्त हमारे कितने काम आया : तुम्हारी शादी में, अरुण की शादी में, तरुण की पढ़ाई में…..”
“वही सोच कर तो मैं पूछ रही हूं, बाबूजी,” मैं ने ज़िद की, “अपना अलग खाता उन्हों ने किस साल खोला था?”
बचपन के पहले बारह- तेरह साल गड्डमड्ड रहा करते हैं। जिन में बीत चुकी घटनाएं तो याद रहती हैं, किंतु उन का क्रम और समय धुंधला जाता है।
जैसे मुझे साफ़ याद है कि टिन का वह ड्रम जो उन दिनों पहले भरा रहता था, जिन्हें मां एक बेकरी को घर से घी, चीनी और आटा दे कर बनवातीं थीं, एकाएक खाली रहने लगा था।
देशी घी के जिस डिब्बे से दाल में छौंक लगाने के लिए घी निकाला जाता था, उस में चम्मच अब सिर्फ़ चपाती चुपड़ते समय डुबाया जाने लगा था।
हर दूसरे- तीसरे दिन पनीर की सब्ज़ी या खीर अब सप्ताह में केवल एक-एक बार ही बनायी जाती।
कमरों में सौ- सौ वौट के बल्बों की जगह अब साठ या चालीस वौट के बल्बों ने ले ली थी।
हर महीने मां की तनख्वाह का दिन जहां हमारे लिए एक विशिष्ट दिन रहा करता था और मां हमें चाट खिलाने या सिनेमा दिखाने ले जाया करतीं थीं अब अपनी विशिष्टता खो रहा था।
“शायद सन अट्ठावन में। लेकिन मेरे आग्रह पर,” बाबूजी गंभीर हो चले।
“ऐसी क्या बात हुई थी?” मैं ने पूछा।
“टाल जाओ अभी….फिर बताऊंगा कभी….,” बाबूजी अपने कंधे उचकाने लगे।
भावावेग अथवा हड़बड़ाहट के क्षणों में बाबूजी अपने कंधे अक्सर उचकाने लगते थे।
“अभी बताइए, बाबूजी,” मैं मचल ली, “फिर कभी क्यों?”
“नहीं, थोड़ी फ़ुर्सत हो ले….”
“यह फ़ुर्सत ही तो है….” कहते- कहते मैं ने अपनी ज़ुबान काट ली।
मां को फ़ुर्सत के विरुद्ध रख कर मैं क्या सिद्ध करना चाह रही थी? मां ने तो ज़िंदगी भर मेहनत की थी। कड़ी मेहनत की थी। बाबूजी के लिए,मेरे लिए, अरुण के लिए, तरुण के लिए, हमारे विस्तारित परिवारों के लिए।
“उस सन अट्ठावन में कचहरी में मेरे मुकदमे का फ़ैसला सुनाया गया था।”
“मगर वह मुकदमा तो आप जीते थे ?” बाबूजी के मुकदमे के बारे में मैं इतना ही जानती रही थी, कि उस की सुनवाई आने की तारीख़ के दिनों में वह खाने- पीने व बोलने- हंसने में अपनी रुचि गंवा बैठते थे और अपने कोने में घंटों विचार-मग्न बैठे रहते थे।
हम बच्चों को यही बताया गया था कि वह मुकदमा उन के एक साझेदार के साथ था जो उन से दस हज़ार रुपए ले कर मुकर गया था। और यह भी कि वह मुकदमा बाबूजी जीत गए थे । हां,लेकिन इतना ज़रूर था कि उस जीत की खुशी मनाते हुए हम ने उन्हें कभी देखा न था। बल्कि उन की चिंता और उद्विग्नता बढ़ती ही चली गई थी।
“उस समय मैं बहुत छोटा था। शायद पांचवीं- छठी में पढ़ता था, जब मेरे पिता ने मेरी शादी रचा दी। वह अनपढ़ लड़की मेरे लिए शुुरू ही से अजनबी रही,क्योंकि जब तक गौने का समय आया मैं बाहर की दुनिया देख- सुन चुका था। और बचपन में हुुई बेमेल उस शादी को अस्वीकार करने की हिम्मत भी जुटा चुका था। इसी बीच मुझे स्वर्णलता मिल चुकी थी और उस से शादी करने का फ़ैसला लेते ही मैं ने अपने पिता के साथ-साथ उस लड़की के पिता को भी स्वर्णलता के संग होने वाली अपनी शादी के बारे में एक पत्र भी लिखा था। इस आग्रह के साथ कि वह अपनी लड़की की शादी अब दूसरी जगह कर दें।”
“सन पैंतालीस में?” मैं ने पूछा। उसी साल मां और बाबूजी की शादी हुई थी।
“हां,लेकिन सुनने में आया वह लड़की ज़िद पकड़ बैठी थी, दूसरी शादी वह न करेगी।”
“फिर?”
“फिर पहले तो सब ओर शांति रही। सुलह- सफ़ाई रही। कि अचानक सन छप्पन में सरकार ने हिंदू मैरिज एक्ट निकाल मारा और उस लड़की की तरफ़ से उस के भांजे ने उससे हुई मेरी शादी के सत्ताइसवें साल में मुझ पर मुकदमा ठोक दिया।”
“कौन से साल?” मैं ने पूछा।
“सन सत्तावन में।उस के पिता तब तक गुज़र चुके थे। भाई उस के थे नहीं। केवल एक सौतेली बहन थी जिस के बड़े बेटे के साथ वह रहती थी और जो उसे मेरे विरुद्ध उकसाने में सफल रहा था….”
“तो उस मुकदमे के दौरान कचहरी में आप ने उन्हें पहली बार देखा?”
“उसे मैं क्यों देखता?” बाबूजी झल्लाए, “उस से मैं कभी मिला न था। उस के घर की एक भी चीज़ मैं ने कभी छुई न थी।जो कुछ भी उस के पिता ने शादी के अवसर पर दिया- लिया था,मेरे पिता को दिया- लिया था और जब कचहरी ने सज़ा सुनाई तो मुझे सुनाई, हमारे पिता- लोग को नहीं….”
“और मां ने क्या कहा?”
“स्वर्णलता एक विशाल-हृदया आत्मा थी,” बाबूजी की आंखें भर आंईं, “उन जैसी स्त्री मैं ने आज तक नहीं देखी। कचहरी में फ़ैसला जब उस दूसरी स्त्री के हक में सुनाया गया, और मेरे सामने दो विकल्प रखे गए कि बतौर हर्जाना या तो मैं एकमुश्त रकम उसे पंद्रह दिन के अंदर दे डालूं या फिर बतौर गुज़ारा उसे उस के या अपने मरने तक अपनी आमदनी का एक चौथाई अंश उस के भांजे के पते पर भेजता रहूं तो स्वर्णलता ही ने सुझाया, उसे हम गुज़ारा भेजेंगे, उसे एकमुश्त रकम हम गांव की ज़मीन बेच कर दे तो सकते हैं, लेकिन उस का वह भांजा उस रकम को हड़प कर उसे घर से बेघर कर सकता है, गुज़ारा भेजेंगें तो उस का घर- घाट बना रहेगा.”
“जज ने उन्हें आप के साथ बतौर पत्नी रहने के लिए नहीं कहा क्या?”
“नहीं, उस के भांजे ने उस की ओर से मुकदमा ही हरजाने और गुज़ारे के लिए किया था। वह जानता रहा था, इस प्रकार उसे घर बैठे अपनी उस मौसी के नाम पर नियमित रूप से हर माह एक अच्छी खासी राशि मिल जाएगी और कष्ट में हमीं रहेंगें….”
“और उन्हें आप गुज़ारा भेजने लगे?”
“हां….जभी से.…अभी भी भेजते रहना पड़ेगा….”
“क्या वह जीवित हैं? क्या मैं उन्हें मिल सकती हूं?”
“नहीं,” बाबूजी की मुद्रा तन गई, “वह मेरी कोई नहीं। स्वर्णलता थीं मेरी….मेरे हर दुख- सुख की साथिन….मेरे हर कष्ट- क्लेश की भागीदार…. जिस के दम पर मैं हर सज़ा काट ले गया….”
“लेकिन बाबूजी,” मां की पाप- शंका मेरे अंदर उतर ली, “आप उन्हें उन की नज़र से देखिए। उन की शादी में उन की मर्ज़ी भी तो नहीं पूछी गई। अनपढ़ भी वह इसीलिए रह गईं क्योंकि उन के परिवार वालों ने उन्हें पढ़ाना ज़रूरी नहीं समझा….”
“लेकिन वह ज़िद? दूसरी शादी न करने की ज़िद? किसलिए की उस ने ज़िद? क्योंकि वह एक परजीवी, एक पैरासाइट की तरह अपने हाथ- पैर बिना हिलाए-डुलाए मुझ पर बोझ बनना चाहती थी….मुझे कष्ट और क्लेश देना चाहती थी….मुझे अपना अपराधी करार करना चाहती थी…. दुष्ट थी वह….”
“आप के तर्क सही नहीं हैं, बाबूजी,” मैं ने कहा, “जिसे आप ज़िद कह रहे हैं, जिसे दुष्ट समझ रहे हैं, वह उस की पति- भक्ति भी हो सकती है। उस की एकनिष्ठता भी हो सकती है….”
“तुम हूबहू स्वर्णलता की तरह बोल रही हो….”
“हां, बाबूजी,” मां का चेहरा मेरे सामने आन प्रकट हुआ और मैं रोने लगी, “मैं भी एक स्त्री हूं….मां भी एक स्त्री थीं….और वह बेचारी भी एक स्त्री ही तो हैं….”