यह विराट सृष्टि अनंत रूपों, रंगों और जीवों से परिपूर्ण है। कहीं नभ में उड़ते पक्षी हैं, कहीं धरती पर रेंगते कीट-पतंगे, कहीं जल में तैरती मछलियाँ और कहीं जंगलों में विचरते पशु। परंतु इन सबके बीच यदि कोई जीवन सर्वाधिक सौभाग्यशाली है, तो वह है मानव जीवन। यह केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना, विचार, संवेदना और आत्मबोध का अद्वितीय संगम है।
मनुष्य को मिला यह जीवन ईश्वर की ओर से मिला हुआ एक अनुपम प्रसाद है। इसलिए इस जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है।
कहा भी गया है—
“मानुष तन अमोल है, यह अवसर है खास,
जिनने इसका मान किया, उनका हुआ विकास।”
किंतु विडंबना यह है कि मनुष्य प्रायः इस अमूल्य जीवन को शिकायतों और असंतोष में व्यर्थ कर देता है। छोटी-छोटी कठिनाइयाँ उसे निराश कर देती हैं, और वह भूल जाता है कि जीवन का सौंदर्य केवल सुख में नहीं, बल्कि संघर्षों से जूझते हुए मुस्कुराने में भी है।
सच तो यह है कि कठिनाइयाँ जीवन की परीक्षा नहीं, बल्कि उसके शिक्षक हैं। जैसे पर्वत से टकराकर नदी अपना मार्ग बनाती है, वैसे ही मनुष्य भी बाधाओं से टकराकर अपनी शक्ति को पहचानता है।
रहीम जी का यह दोहा इसी सत्य को व्यक्त करता है—
“रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय,
हित-अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।”
अर्थात् विपत्ति भी कभी-कभी हितकारी होती है, क्योंकि वह हमें अपने और पराये का सही परिचय करा देती है।
अब जरा एक क्षण ठहरकर कल्पना कीजिए—यदि हमें मनुष्य का यह दुर्लभ जन्म न मिला होता तो हमारा जीवन कैसा होता?
संभव है कि हम चींटी बनकर जन्म लेते और किसी अनजाने पथिक के कदमों के नीचे बिना किसी अपराध के ही कुचल दिए जाते।
या शायद हम मच्छर होते—किसी के कानों के पास अपनी क्षीण ध्वनि में गुनगुनाते और अगले ही पल किसी की तेज़ ताली का शिकार बन जाते।
हो सकता है कि हम मुर्गा बनकर किसी आँगन में दाने चुग रहे होते, और फिर किसी दिन वही आँगन हमें रसोई के बर्तन में बदल देता, जहाँ हमारी ‘बाँग’ किसी के पेट के भीतर गूँज रही होती।
संभव है कि हम बकरा बनकर किसी कसाई की दुकान के बाहर खड़े होते, आँखों में भय और हृदय में मौन करुणा लिए उस चमकती छुरी को निहार रहे होते।
या शायद हम आवारा पशु बनकर किसी गली-कूचे में भटकते, कभी भूख से व्याकुल और कभी लोगों की लाठियों से घायल होते।
कहीं हम गाय या भैंस बनकर किसी खूँटे से बँधे होते—जहाँ हमारा आकाश कुछ हाथ की रस्सी से अधिक विस्तृत न होता।
इन कल्पनाओं में हास्य भी है और एक गहरी चेतावनी भी। यह हमें स्मरण कराती हैं कि मनुष्य जीवन वास्तव में कितना दुर्लभ और सौभाग्यपूर्ण है।
संत कबीर ने भी मनुष्य जन्म की महत्ता को इस प्रकार व्यक्त किया है—
“दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।”
अर्थात मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ है, यह बार-बार नहीं मिलता; जैसे पेड़ से झड़ा हुआ पत्ता फिर उसी शाखा पर नहीं लग सकता।
इसलिए इस जीवन को निराशा और हताशा में व्यर्थ करना मानो ईश्वर के उपहार का अपमान करना है। जीवन का सच्चा सौंदर्य तब प्रकट होता है जब मनुष्य कठिनाइयों के बीच भी आशा का दीप जलाए रखता है।
जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी निर्मल रहता है, वैसे ही मनुष्य को भी परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपने जीवन को उज्ज्वल बनाना चाहिए।
इसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ—
“काँटों की राहों में भी मुस्कान सजानी है,
अंधियारे क्षणों में भी आशा जगानी है।
ईश्वर ने जो जीवन दिया है उपहार बनाकर,
उसको कृतज्ञ हृदय से हर पल निभानी है।”
वास्तव में जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। यह दूसरों के जीवन में प्रकाश भरने का अवसर भी है। जब हम अपने भीतर कृतज्ञता, प्रेम और सकारात्मकता का भाव जाग्रत करते हैं, तब हमारा जीवन केवल हमारा नहीं रहता—वह अनेक लोगों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि मनुष्य जीवन ईश्वर की अनुपम देन है। इसे शिकायतों के अंधकार में नहीं, बल्कि आभार और आशा के प्रकाश में जीना चाहिए।
“हँसते रहो हर हाल में, यही जीवन का सार,
ईश्वर का यह दान है, रखो इसका मान।”
उषा जरवाल 'एक उन्मुक्त पंछी'