Stubbornness: A silent crime in Hindi Love Stories by julie books and stories PDF | जिद्द: एक खामोश गुनाह

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जिद्द: एक खामोश गुनाह

बाहर बिजली कड़क रही थी, लेकिन मेरे अंदर का शोर उससे भी तेज़ था। मैं उस आलीशान बंगले के दरवाज़े पर खड़ी कांप रही थी। मेरे हाथ में वो कागज़ थे जिन्होंने मेरी पूरी ज़िंदगी को एक सौदे में बदल दिया था।

"अंदर आओ, अवनी!" एक भारी और ठंडी आवाज़ गूंजी।

मैंने नज़रें उठाकर सामने देखा। हॉल के बीचों-बीच, सिगार का धुआं उड़ाते हुए सिद्धार्थ सिंघानिया खड़ा था। उसकी काली शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो मुझे अंदर तक झकझोर रही थी।

"मैं... मैं यहाँ नहीं रह सकती," मैंने अपनी आवाज़ को मज़बूत करने की कोशिश की, लेकिन वह लड़खड़ा गई।

सिद्धार्थ धीमे कदमों से मेरी तरफ बढ़ा। उसकी हर आहट दिल की धड़कन बढ़ा रही थी। वह मेरे इतने पास आकर रुका कि उसके महंगे परफ्यूम की तेज़ खुशबू मेरे दिमाग पर छाने लगी। उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपनी ओर खींचा।

"तुम रहोगी... और यहीं रहोगी," उसने मेरी ठुड्डी को अपनी उंगलियों से ऊपर उठाया। "तुम्हारे पिता ने तुम्हारी आज़ादी के बदले अपनी जान बचाई है। अब तुम मेरी मिल्कियत  हो।"

"मैं कोई सामान नहीं हूँ जिसे आप खरीद लें!" मैंने उसका हाथ झटकना चाहा, पर उसकी पकड़ लोहे जैसी सख्त थी।

उसने झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाया, "सामान नहीं, मेरी 'ज़िद' हो तुम। और सिद्धार्थ सिंघानिया अपनी ज़िद कभी नहीं छोड़ता।"

उसकी गर्म सांसें मेरी गर्दन को छू रही थीं, जिससे मेरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उसने मुझे अपनी बाहों के घेरे में भर लिया। मुझे अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था, लेकिन उसका स्पर्श... वह नफरत भरा होने के बावजूद भी एक अजीब सा खिंचाव पैदा कर रहा था।

"आज से तुम इस घर की रानी हो, और मेरी क़ैदी भी। तुम्हारी हर रात मेरे नाम होगी," उसने अपनी आवाज़ में एक अधिकार के साथ कहा।

उसने ज़ोर से मेरा हाथ पकड़ा और सीढ़ियों की तरफ ले जाने लगा। मुझे पता था कि उस बड़े से कमरे के दरवाज़े के पीछे मेरी पुरानी ज़िंदगी हमेशा के लिए खत्म होने वाली थी।

कमरे का दरवाज़ा एक भारी आवाज़ के साथ बंद हुआ। यह कमरा किसी महल से कम नहीं था, पर मेरे लिए यह कालकोठरी जैसा लग रहा था। सिद्धार्थ ने लापरवाही से अपना कोट उतारकर सोफे पर फेंका और घड़ी उतारने लगा।

"यहाँ खड़े रहने से सच नहीं बदलेगा, अवनी। बैठो," उसने बिस्तर की तरफ इशारा करते हुए कहा।

मैं वहीं दरवाज़े के पास जमी रही। "आपने जो किया है, उसे दुनिया गुनाह कहती है।"

सिद्धार्थ के चेहरे पर एक डार्क मुस्कुराहट आई। वह धीरे-धीरे चलकर मेरे पास आया और मुझे दीवार से सटा दिया। उसके दोनों हाथ मेरे सिर के दोनों तरफ थे, मुझे पूरी तरह ब्लॉक करते हुए।

"दुनिया? मेरी दुनिया यहाँ से शुरू होकर यहीं खत्म होती है। और अब तुम उसका हिस्सा हो।" उसने अपना हाथ मेरी ज़ुल्फों में डाला और धीरे से मेरे बाल पीछे किए। "मेरा एक नियम है—जो मेरा है, वो सिर्फ मेरा है। मैं उसे किसी के साथ साझा नहीं करता।"

उसकी नज़रों में एक गहरा नशा था, जो मुझे डरा भी रहा था और सुन्न भी कर रहा था।

"आप मुझसे चाहते क्या हैं?" मैंने कांपती आवाज़ में पूछा।

"वफ़ादारी... और पूरा समर्पण," उसने झुककर मेरी आंखों में सीधे देखते हुए कहा। "इस घर के अंदर तुम मेरी पत्नी हो। तुम मेरे साथ खाओगी, मेरे साथ रहोगी और..." वह थोड़ा रुका, उसकी आवाज़ और भी गहरी हो गई, "और जब मेरा मन करेगा, तुम मेरे करीब रहोगी।"

उसने अपनी जेब से एक सोने की चेन निकाली जिसके बीच में एक छोटा सा लॉकेट था। उसने उसे मेरी गर्दन के चारों तरफ लपेटा। उसके ठंडे हाथों का स्पर्श मेरी गर्म त्वचा पर बिजली की तरह लगा।

"यह तुम्हारी बेड़ियों का प्रतीक है। इसे कभी उतारने की कोशिश मत करना," उसने मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए कहा।

उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे धीरे से बिस्तर की ओर ले जाने लगा। मेरी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे अपने कानों में सुनाई दे रही थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं भागना चाहती हूँ या उस खिंचाव में डूबना, जो सिद्धार्थ की हर हरकत में था।

"आज रात," उसने मुझे करीब खींचते हुए कहा, "तुम्हें यह सीखना होगा कि सिद्धार्थ सिंघानिया की पत्नी होने का असली मतलब क्या होता है.....