कमरे में गूंजती हंसी धीरे-धीरे अंधेरे में खो गई।
विजय बोतल मेज़ पर रखते हुए हंस पड़ा।
विजय –
"हा क्यों नहीं… चलो एक और टीवी चैनलों के लिए सनसनीखेज खबर तैयार करते हैं।
वैसे भी भारत में इन खबरों से बाजार बड़ा गर्म रहता है।"
अजय सिंह ने हल्की मुस्कान के साथ अपना बैग उठाया।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा… और बिना कुछ बोले दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गए।
रात की ठंडी हवा चल रही थी…
और अंधेरे में दो परछाइयां चुपचाप गायब हो गईं।
दो दिन बाद
भारत के एक बड़े न्यूज़ चैनल पर तेज़ संगीत के साथ ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी।
न्यूज़ एंकर (गंभीर आवाज़ में) –
"पिछले कुछ समय से भारत के दुश्मनों की पाकिस्तान में हो रही मौतों का सिलसिला लगातार जारी है।
इस साल अब तक एक दर्जन से ज्यादा आतंकियों की रहस्यमयी मौत हो चुकी है।"
स्क्रीन पर फोटो उभरती है।
"और अब इस सूची में एक और बड़ा नाम जुड़ गया है
लश्कर-ए-तैयबा का कुख्यात आतंकी हंजला अदनान।"
एंकर आगे बोलता है।
"हंजला अदनान वही आतंकी है जिसे जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ काफिले पर हुए हमले का मास्टरमाइंड माना जाता है।"
टीवी स्क्रीन पर कराची की तस्वीरें दिखाई देती हैं।
"सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान के कराची शहर में 2 और 3 दिसंबर की रात अज्ञात हमलावरों ने उसके घर के बाहर उस पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं।
अदनान को चार गोलियां लगीं।"
"गंभीर हालत में उसे कराची के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया…
लेकिन आज सुबह इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।"
एंकर की आवाज़ और तेज़ हो जाती है।
"बड़ा सवाल ये है कि आखिर पाकिस्तान में भारत के दुश्मनों को चुन-चुन कर कौन मार रहा है?"
उसी समय – लाहौर
लाहौर के एक पुराने बाज़ार में चाय की दुकान थी।
लोहे की केतली से भाप उठ रही थी…
और चारों तरफ लोग छोटी-छोटी मेज़ों पर बैठे चाय पी रहे थे।
दीवार पर एक पुराना टीवी लगा था…
जिस पर वही खबर चल रही थी।
दुकान के कोने में बैठे दो आदमी चुपचाप टीवी देख रहे थे।
वो थे अजय सिंह और विजय डोभाल।
अजय सिंह ने धीरे से चाय का कप नीचे रखा।
अजय सिंह –
"चल… यहां से चलते हैं।
अपना काम हो गया।"
विजय मुस्कुराया।
विजय डोभाल –
"कहां? भारत?"
अजय हल्का सा हंसा।
अजय सिंह –
"नहीं यार…"
वो धीरे से बोला।
"नूर जहां के पास…
इंतजार करती होगी।"
वो उठते हुए बोला।
"और वैसे भी… अभी बहुत काम बाकी है।"
दोनों पैसे मेज़ पर रखकर दुकान से बाहर निकल जाते हैं।
बाज़ार से बाहर निकलते हुए
सड़क पर हल्की भीड़ थी।
विजय चलते-चलते मुस्कुराया।
विजय डोभाल –
"साले को इतनी गोलियां लगी…
फिर भी दो दिन तक जिंदा रहा।"
वो सिर हिलाते हुए बोला।
"खैर… इससे बाकी आतंकियों में डर जरूर घुस जाएगा।
क्या बोलता है?"
अजय कुछ पल चुप रहा।
फिर शांत आवाज़ में बोला।
अजय सिंह –
"डर घुसेगा या नहीं… पता नहीं।"
"लेकिन इतना जरूर है…
इसकी मौत के बाद वो सावधान जरूर हो जाएंगे।"
विजय ने भौंहें सिकोड़ लीं।
विजय –
"क्यों?"
अजय हल्का मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"क्योंकि न्यूज चैनल वाले खबरों को इतना चढ़ा कर बताते हैं…
कि दुश्मन भी समझ जाता है कि खेल कौन खेल रहा है।"
वो आगे बोला।
"किसी ने ये तक कह दिया कि भारत अपने दुश्मनों को चुन-चुन कर मार रहा है।"
अजय की आवाज़ थोड़ी सख्त हो गई।
"अरे… ये आतंकी किसी एक देश के दुश्मन नहीं हैं…
ये पूरी इंसानियत के दुश्मन हैं।"
विजय हंस पड़ा।
विजय डोभाल –
"खैर छोड़…"
"ये बता… अगला नंबर किसका है लिस्ट में?"
वो मजाक में बोला।
"ये तो पहुंच गया 72 हूरों के पास।"
अजय हल्का मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"बताऊंगा…"
"लेकिन उससे पहले जहां जाना है… वहां चलते हैं।"
वो धीमे से बोला।
"कोई हमारा इंतजार कर रहा है।
और वही से अगला टारगेट मिलेगा।"
कुछ देर बाद
दोनों एक तंग गली में पहुंचते हैं।
सड़क किनारे एक मटन की दुकान थी।दुकान पर लटकते मांस के टुकड़े…और पास में खड़ा दुकानदार।
अजय सिंह दुकान के पास जाता है और धीमे से एक कोड बोलता है।
दुकानदार एक पल के लिए उसे देखता है…
फिर बिना कुछ कहे दो किलो मटन पैक कर देता है।
दोनों पैकेट लेकर वहां से निकल जाते हैं।
कुछ दूर चलने के बाद विजय बोल पड़ा।
विजय डोभाल –
"दो किलो मटन?"
वो हैरानी से बोला।
"इतना क्या करेगा यार?"
"और तू तो खाता भी नहीं है।"
वो मजाक में बोला।
"देख… मैं इतना खाने वाला नहीं हूं।"
अजय मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"हम दोनों ही खाएंगे… ओके?"
विजय की आंखें फैल गईं।
विजय –
"अरे… कब से शुरू कर दिया?"
"बताया भी नहीं।"
वो हंसते हुए बोला।
"अगर ऐसा ही था तो घर से निकलने से पहले पार्टी रख लेते।"
अजय हल्का मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"सब बताऊंगा…"
"अभी फिलहाल आगे की प्लानिंग करनी है।"
विजय सिर खुजलाने लगा।
विजय –
"अब इसको बनाने के लिए भी प्लानिंग करनी पड़ेगी?"
"कमाल करता है यार अजय।"
अजय अचानक रुक गया।
वो विजय की तरफ मुड़ा।
अजय सिंह (धीरे से) –
"ये मटन नहीं है…"
"ये एक मैसेज है।"
विजय चौंक गया।
अजय सिंह –
"इस मटन के अंदर वो सब है…
जो हमें अगले टारगेट तक पहुंचाएगा।"
विजय की आंखें फैल गईं।
विजय –
"मतलब… हम ये मटन बनाने वाले नहीं हैं?"
"और… ये दुकान वाला कौन था?"
अजय हल्का हंसा।
अजय सिंह –
"तुझे खाने की बहुत जल्दी रहती है।"
"मटन भी बनेगा… चिंता मत कर।"
फिर उसने धीमे से कहा।
"और जिस दुकान से हमने ये लिया है…
वो भी हमारा एजेंट है।"
"दस साल से यहां मटन की दुकान चला रहा है।
अच्छा बिजनेस जमा रखा है।"
"फ्री टाइम में हमारा काम करता है।"
विजय हैरान रह गया।
अजय मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"अभी तूने देखा ही क्या है…
आगे-आगे देख क्या-क्या दिखाता हूं।"
कुछ देर बाद – उनका कमरा
दोनों कमरे में पहुंचते हैं।
अजय दरवाज़ा बंद करता है और अंदर से कुंडी लगा देता है।
दोनों मटन की पैकिंग खोलना शुरू करते हैं।
अचानक अंदर से एक छोटी चिप निकलती है।
विजय मुस्कुराया।
विजय डोभाल –
"ये रही तेरी चिप।"
"एक काम कर…
तू अपना काम कर…
मैं तब तक मटन कंप्लीट कर देता हूं।"
अजय तुरंत बोला।
अजय सिंह –
"रुक।"
"इसके अंदर और भी कुछ है।"
वो ध्यान से देखने लगता है।
कुछ सेकंड बाद उसे एक छोटी डायरी मिलती है।
अजय सिंह –
"अब हो गया।
जा… अब बना ले।"
विजय हंस पड़ा।
थोड़ी देर बाद
दोनों किचन में बैठे थे।
अजय चिप को फोन से जोड़ता है।
कोई आवाज़ बाहर ना जाए इसलिए दोनों एक-एक एयरबड कान में लगा लेते हैं।
वीडियो शुरू होता है।
एक दाढ़ी वाला आदमी स्क्रीन पर दिखाई देता है।
वीडियो में आदमी –
"कुछ महीनों बाद भारत में राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है।"
उसकी आवाज़ सख्त थी।
"अल्लाह की कसम…
इस बार ऐसा धमाका करना है…
कि बहरे भी सुनने लगें।"
"और इसकी गूंज अमेरिका और भारत के सभी दोस्त देशों तक पहुंचे।"
वो आगे बोला।
"लेकिन उससे पहले…
नसीर और हबीब को गुजरात के बड़े शहरों में तबाही का जश्न मनाने दो।"
"हादिज काजी को संदेश भेज दो…
अगले जुम्मे के दिन हमारे दोनों आदमी ट्रेन से गुजरात पहुंचेंगे।"
"उनके रहने की अच्छी व्यवस्था करना।"
"फोटो बाद में भेजेंगे।"
"खुदा हाफिज।"
वीडियो खत्म हो जाता है।
दोनों धीरे-धीरे एयरबड निकालते हैं।
विजय की आंखों में चिंता थी।
विजय डोभाल –
"ये बहुत बुरी खबर है।"
"लेकिन इसमें उन दोनों आतंकियों की फोटो भी नहीं है।"
"हमारे एजेंट भारत में इन्हें पहचानेंगे कैसे?"
अजय हल्का मुस्कुराया।
फिर उसने फोन विजय की तरफ बढ़ाया।
अजय सिंह –
"ये रहे दोनों।"
विजय चौंक गया।
अजय सिंह –
"ये सोमवार को साबरमती एक्सप्रेस से निकलेंगे।"
"और पहले गांधीनगर में रुकेंगे।"
विजय हैरानी से बोला।
विजय –
"तू इतने यकीन से कैसे कह सकता है?"
अजय मेज़ पर रखी डायरी उठाता है।
अजय सिंह –
"क्योंकि खबर पक्की है।"
"इनका प्लान है गुजरात दंगों का बदला लेना…
और फिर राम मंदिर उद्घाटन के समय बड़ा धमाका करना।"
वो डायरी के पन्ने पलटते हुए बोला।
"ये अकेले नहीं हैं।
कुछ मौलवी और काजी भी इनकी मदद कर रहे हैं।"
विजय गंभीर हो गया।
विजय डोभाल –
"मतलब… पहले हमें इन दोनों को ढूंढना होगा।"
अजय मुस्कुराया।
अजय सिंह –
"उससे पहले एक खबर भेजनी होगी।"
वो हल्के से हंसा।
"कि दो नई दुल्हन आ रही हैं…
स्वागत की तैयारी करो।"
विजय हंस पड़ा।
विजय –
"चौटाला खुश हो जाएगा।"
"उसे नई-नई दुल्हनों को पकड़ने का बड़ा शौक है।"
दोनों हंसते हैं।
विजय मुस्कुराते हुए बोला।
विजय –
"वैसे चौटाला प्लान बनाने में माहिर है।
आखिर चेला भी तो आपका रहा है।"
फिर मजाक में बोला।
"और एक मैं हूं…
आज तक सही फैसला लेना नहीं सीखा।"
फिर उसने कड़ाही में मटन डालते हुए कहा।
विजय –
"चल… पहले पेट पूजा कर लेते हैं।"
"वरना तेरी नूर जहां का बुलावा आ गया…
तो बाहर का खाना खाना पड़ेगा।"
वो मुंह बनाकर बोला।
"पता नहीं क्या खिला दे…
भैंस… गाय… या फिर कुत्ता।"
अजय हल्का मुस्कुराते हुए अपने बिस्तर की तरफ बढ़ता है।
चलते-चलते उसकी नजर डायरी के एक पन्ने पर पड़ती है…
और अचानक उसका चेहरा गंभीर हो जाता है।
क्योंकि उस पन्ने पर लिखा नाम…
Writer bhagwat singhnaruka ✍️