alif laila - 13 in Hindi Fiction Stories by Rajveer Kotadiya । रावण । books and stories PDF | अलिफ लैला - 13

Featured Books
Categories
Share

अलिफ लैला - 13

किस्सा तीन राजकुमारों और पाँच सुंदरियों का

शहरजाद की कहानी रात रहे समाप्त हो गई तो दुनियाजाद ने कहा- बहन, यह कहानी तो बहुत अच्छी थी, कोई और भी कहानी तुम्हें आती है? शहरजाद ने कहा कि आती तो है किंतु बादशाह की अनुमति हो तो कहूँ। बादशाह ने अनुमति दे दी और शहरजाद ने कहना शुरू किया। खलीफा हारूँ रशीद के राज्य में बगदाद में एक मजदूर रहता था। वह स्वभाव का बड़ा हँसमुख और बातूनी था। एक दिन प्रातःकाल वह बाजार में एक बड़ा टोकरा लिए मजदूरी की आशा में खड़ा था। कुछ देर बाद एक परम सुंदरी स्त्री, जिसके मुँह पर जाली का नकाब पड़ा हुआ था, वहाँ आई और मुस्करा कर मजदूर से कहने लगी कि अपना टोकरा उठा और मेरे साथ चल। मजदूर अच्छी मजदूरी मिलने की आशा और स्त्री के मधुर व्यवहार से प्रसन्न होकर उसके साथ चल दिया। वह इस बात से बहुत ही प्रसन्न हुआ कि सुबह-सुबह ही अच्छा काम मिल गया था। कुछ दूर जाकर स्त्री ने एक मकान के सामने खड़े होकर ताली बजाई। कुछ देर में एक सफेद लंबी दाढ़ी वाले ईसाई ने द्वार खोला। स्त्री ने उसे कुछ रुपए दिए और ईसाई बूढ़े ने उसका आशय समझ कर घर के अंदर से उत्तम मदिरा का एक घड़ा उसे दे दिया। स्त्री ने घड़ा मजदूर के टोकरे में रखवाया और बाजार में आ गई।

बाजार में उसने बहुत-सी वस्तुएँ खरीदीं। इनमें स्वादिष्ट फल यथा सेब, नाशपाती आदि तथा भाँति-भाँति के सुंदर सुगंध वाले फूल, इत्र, स्वादिष्ट अचार, चटनियाँ और मुरब्बे, माँस, सूखे मसाले आदि घूम-घूम कर कई दुकानों से खरीदे। इतनी चीजें उसने लीं कि टोकरे में बिल्कुल जगह न रही। मजदूर कहने लगा, अगर मुझे मालूम होता कि आप इतना सामान खरीदेंगी तो मैं अपने साथ एक घोड़ा बल्कि ऊँट रख लेता। खैर, मजदूर टोकरा उठाकर स्त्री के साथ चला। काफी दूर जाने के बाद वे दोनों एक विशाल भवन के पास पहुँचे जिसके शिखर बड़े सुंदर बने थे और दरवाजे हाथी दाँत से निर्मित थे। स्त्री ने दरवाजे के आगे खड़े हो कर ताली बजाई। दरवाजा जब तक खुले तब तक मजदूर सोचता रहा कि न मालूम यह स्त्री घर की नौकरानी है या मालकिन, इसके साज-सिंगार से तो यह नहीं मालूम होता कि यह नौकरानी होगी। कुछ ही देर में एक स्त्री ने दरवाजा खोला। मजदूर उसका अनुपम सौंदर्य और मनोहारी भाव देख कर बेसुध-सा होने लगा और सामान से लदा टोकरा उसके सिर से गिरने-गिरने को होने लगा। जो स्त्री उसे बाजार से लाई थी वह कौतुकपूर्वक उसकी बदहवासी का तमाशा देखने लगी लेकिन घर के अंदर से आई हुई स्त्री ने उससे कहा, 'तू खड़ी-खड़ी क्या देख रही है, यह बेचारा सामान के भार से दबा जा रहा है। तू जल्दी से इसे अंदर ले जा और इसका सामान उतरवा।'

मजदूर अंदर गया तो दोनों स्त्रियों ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और उसे ले कर एक बड़े मकान में आई। इसके खंभे कीमती लकड़ी के बने थे और एक बड़ा कक्ष था जिसके चारों ओर दालान थे। दालान में एक और बैठने का स्थान था जहाँ पर बहुत-से मूल्यवान नर्म आसन बिछे थे और सुविधा के भाँति-भाँति के मूल्यवान पात्र रखे हुए थे। सब के बीच में चंदन और अगर की लकड़ी का बना एक बड़ा सिंहासन था। उस पर एक बहुत ही मूल्यवान आसन पड़ा था जिसमें चारों ओर मोतियों और माणिकों की झालर लटक रही थी। इसके अलावा उस विशाल कक्ष में एक संगमरमर का बना हौज था जिसमें फव्वारे छूट रहे थे। मजदूर यद्यपि दूर तक भारी बोझ लेकर चलने के कारण बहुत थक गया तथापि उस कमरे की सामग्री और सजावट देख कर अपना श्रम भूल गया और वह प्रसन्न चित से इस शोभा को देखने लगा। विशेषतः उसे सिंहासन पर बैठी हुई अतीव सुंदर स्त्री ने बहुत आकृष्ट किया। उसे बाद में मालूम हुआ कि सिंहासन पर बैठी स्त्री का नाम जुबैदा है, वह उस घर की मालकिन है। जिस स्त्री ने दरवाजा खोला था उसका नाम साफी था और जो स्त्री बाजार से उस पर सामान लदवाकर लाई थी उसका नाम अमीना था।