Movie Review - Subedar in Hindi Film Reviews by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | फिल्म समीक्षा - सूबेदार

Featured Books
Categories
Share

फिल्म समीक्षा - सूबेदार

फिल्म समीक्षा :_ सूबेदार

बालू माफिया और भ्रष्ट सिस्टम का सच बताती बेजोड़ फिल्म

 -------------------------------------------

क्या होता है जब रिटायर्ड आर्म्ड फोर्सेज के लोग,जवान, हवलदार, सूबेदार, मेजर आदि निजी क्षेत्र में कार्य ढूंढते हैं। किस किस तरह के कार्य उन्हें मिलते हैं और अपने घर लोगों के लिए उन्हें कैसे कैसे समझौते करने पड़ते हैं। सुरक्षा अधिकारी,अनपढ़,बदतमीज अमीरों,अपराधियों के बॉडीगार्ड से लेकर बैंक,हॉस्पिटल, फैक्ट्री,मॉल तक में आप सेवानिवृत फौजियों को ड्यूटी करते देख सकते हैं।

 इनकी निजी जिंदगी की ख्वाहिश यही होती है कि रिटायर्ड होने के बाद बीवी बच्चे के साथ सुकून से रहें। लेकिन देश सेवा और काम में दशकों निकल जाते हैं, फिर बीवी , मां,पिता अपनी जिंदगी जी चले जाते हैं।और यह उम्र के उतार के वक्त अकेले हो जाते हैं। 

     ऊपर से जो स्थानीय खनन,भू माफिया हैं उनसे इनका स्वाभिमान पटरी नहीं बैठता तो झगड़े होते हैं। अक्सर देश की रक्षा करने वाले फौजी को जान गंवानी पड़ती है। क्योंकि यह सिविल है सरहद नहीं।जहां हथियार के साथ दुश्मन सामने होता है। यहां न हथियार चलाने की छूट और न दुश्मन सामने। बल्कि कब,कौन धोखे से वार करदे नहीं जानते।

 

      कहानी और अभिनय

  -----------------------------------

 कहानी प्रारंभ होती है बालू माफिया की कारगुज़ारियों से ।किस तरह बड़ी बड़ी नदियों के घाटों,डूब क्षेत्र से बालू निकालकर शहरों में सोने के भाव बेची जा रही है। नदी, तालाब,झील के बीचों बीच से बड़ी बड़ी मशीनों से मिट्टी भर भरके निकाल ली जाती है और पानी के नीचे गहरा खड्डा हो जाता है। ऐसे ही अनेक खड्डों में कई बच्चे और जवान डूब कर मर गए।

कहानी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है और आधे देश की सच्चाई सामने रखती है। अब तो झील,नदियों को गहरा करने का सरकारी हुक्म भी हो गया है।यानि माफियागिरी अब लीगल हो गई। हमारे ही शहर में ,तीनों मुख्य झीलों को करीब दो सौ करोड़ रुपए में बिना पानी हटाए गहरा करने के टेंडर जारी हो गए हैं। अब जो बालू निकलेगी वह यूं ही पड़ी रहेगी। क्योंकि कुछ शहरों के लोग बड़े भोले (मूर्ख,रीढ़विहीन समझें) होते हैं। भ्रष्ट अधिकारी और राजनेता पहले दिखाएंगे ,यह बहुत हो रहा कि जनता देख ले ,काम हो रहा है। बालू यह निकली अथाह, झीलों को अंदर से दस फीट अतिरिक्त गहरा करने से।फिर घेरे में सौ सौ फीट समतल बढ़ाकर चालीस फीट गहराई में,एक ही झील से करीब चार सौ करोड़ की बालू मिल जाएगी। लेकिन हमारे शहर में खास तौर पर,बालू ,अखबार वाले भी दिखाएंगे कि जगह घेर रही,कहां जाएगी? परेशानी हो रही काम करने में। तो अलग से नेताओं के आदेश पर टेंडर जारी होंगे, "इस बेकार की बालू को दूर फेंककर आने के" जिसमें करीब सौ करोड़ रुपया और सरकार देगी इस फिजूल बालू को दूर फेंककर आने का। यह है छोटे सोए हुए शहरों,कस्बों का सच। किसी को भवन निर्माण को बालू चाहिए तो वह ट्रेक्टर ट्रॉली चार हजार का और डंपर ,ट्रक कम से कम तीस हजार का मंगवाए। और यहां नजरों के सामने अरबों की बालू के वारे न्यारे हो रहे।

सारे यह व्यवसाय करने वाले किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के नेता बने होते हैं।

मार्च छब्बीस में आई यह सशक्त फिल्म अपनी कहानी और उसके ट्रीटमेंट से बांधकर रखती है। बालू माफिया के शहर में रिटायर्ड सूबेदार (अनिल कपूर) अर्जुन मौर्य का घर है। उसकी पत्नी उसके इंतजार में चल बसी। जवान बेटी(राधिका मदान )है और अलग रहता छोटा भाई,(सौरभ शुक्ला) है।

  रिटायर्ड सूबेदार की नौकरी माफिया बबली दीदी( माफिया पिता की विरासत संभालती मोना सिंह) के छोटे भाई प्रिंस (आदित्य रावल) की सुरक्षा में लगाई जाती है। वजह यह कि छोटे भाई की सिक्यॉरिटी एजेंसी के पच्चीस लोगों को भी कानपुर में यही लोग जॉब पर रख लेंगे।भाई सूबेदार से कहता है अपने पर कंट्रोल रखना यह फौज की जगह नहीं सिविलियन हैं। शहर में माफिया, गुंडों का राज है।

 लेकिन यह नौकरी दो दिन चलती है।क्योंकि प्रिंस और उसके साथी निहासत बदतमीजी और अश्लीलता से सूबेदार को हर कदम जलील करते हैं। छोटे लोगों और शहरों का न्यूसेंस। यहां गाड़ी मेरी लगेगी से लेकर दूसरे की पत्नी के बारे में अश्लील बातें। अनिल कपूर,रिटायर्ड फौजी के रूप में बहुत संयत और बेहतरीन अभिनय करते हैं।वह सब्र से प्रिंस के लिए गाड़ी का दरवाजा भी खोलते हैं। जब वह उन्हें खैनी बनाने को कहता ह तो सब्र से कहते हैं," बनानी नहीं आती।"

  फिल्म की पटकथा जबरदस्त और कई परतों वाली है।संवाद बेहतरीन लिखे हैं। एक उप कथा है, सूबेदार की बेटी विद्या को, कॉलेज में छेड़ते युवक की। जो तेजाब फेंकने की धमकी देता है। दूसरी कथा विधवा मां ,जिसके बेटे की घाट पर डूबने से मौत हुई। विरोध करने पर उसके भाई को भी गोली मारकर जमीन में गाड़ दिया। आप कहेंगे पुलिस? कानून? तो वह देश के अधिकतर शहरों,कस्बों में इन माफिया वालों के साथ खड़ा होता है। कुछ नहीं करता। सूबेदार की पत्नी की अंतिम इच्छा के तहत खरीदी लाल रंग की जिप्सी में प्रिंस तोड़फोड़ करके यूरिन कर देता है। 

यहां सूबेदार का गुस्सा सामने आता है और वह गुर्गों को पीटता हुआ प्रिंस के हाथों से ही अपनी गाड़ी साफ करवाता है।

एक कहानी छोटे शहरों के बैंक कर्मचारियों के घटिया व्यवहार और बार बार चक्कर लगवाने की है ,जो तीखा व्यंग्य करती है।

    फिल्म आगे बढ़ती है सूबेदार की रिपोर्ट पुलिस नहीं लिखती और समझाकर विदा कर देती है।

 उधर सॉफ्टी भैया (फैजल खान,पंचायत फेम) बार बार फोन करते हैं कि सूबेदार के पास एक खास गन,जो स्वर्गीय माफिया लल्लन सिंह की है,वह वापस करवाएं।और सूबेदार माफी मांगे।

     आगे की घटनाएं नई नहीं हैं पर ट्रीटमेंट,संवाद और अनिल कपूर के दमदार अभिनय और मोना सिंह के नए अंदाज के अभिनय ने फिल्म को थ्रिल और ऊंचाइयां प्रदान की हैं।

 

निर्देशन,संवाद और अभिनय

---------------------------------------

सूबेदार और एक बेटी के जिम्मेदार पिता और पत्नी को समय नहीं दे पाने के दुख से बोझिल कई भावों को चेहरे और बॉडी लैंग्वेज से अनिल कपूर क्या शानदार ढंग से दिखाते हैं। लगता है मानो हम सुबेदार के साथ साथ चल रहे हों।

   कई जगह निर्देशक ने बिना संवादों के,मात्र चेहरे से अभिनय करवाया है।वह दृश्य जहां बैंक क्लर्क दूसरी बार ,सूबेदार को अगले दिन फिर आने को कहता है।चेहरे से गुस्सा फिर भी सहन करने के जो भाव अनिल कपूर लाए हैं ,वह देखने लायक हैं।उनका मेकअप पचपन साठ वर्ष की आयु ,चेहरे पर हल्की झुर्रियां सब कुछ कह देती हैं। निर्देशन सुरेश त्रिवेणी का बहुत कसा हुआ है।उन्होंने कम संवाद और घटनाओं,कैमरा वर्क से बेहतरीन डर का माहौल बनाया है। 

अभिनय में नया लड़का आदित्य रावल,राधिका मदान असर छोड़ते हैं। दोनों की अनिल कपूर जैसे बेहतरीन चार दशकों से अभिनय कर रहे,अभिनेता के साथ पहली फिल्म है। दोनों कही भी झिझकते नहीं लगे। सौरभ शुक्ला अब इसी तरह की,ग्रामीण परिवेश का दबंग,भूमिकाओं में टाइप कास्ट होते जा रहे हैं। बिंदिया के बाहुबली में भी ऐसे ही लगे थे बस किरदार नेगेटिव था। मोना सिंह,बबली दीदी से काफी उम्मीदें थी पर उनका किरदार,लेडी माफिया का ज्यादा विस्तार नहीं पा सका। बाकी ऐसे छोटे मोटे ,बेलौस किरदार हैं जो लड़कियों को वस्तु समझते हैं,इज्जत से खेलते हैं उनकी, यह देखकर भय लगता है कि ऐसा हमारे राज्यों के कुछ कस्बों में आज भी होता है।

अच्छी फिल्म एक बड़ी समस्या को सामने रखती है।भू माफिया और इसी के साथ लोकेल माफिया,कानून की बेकद्री की बात भी उभारती है।फिल्म अमेजन प्राइम ओटीटी पर देखी जा सकती है। अनिल कपूर ने एक अच्छी कहानी और अभिनय के साथ ओटीटी पर कदम रखा है।

 

फिल्म सवाल उठाती है कि यदि कोई सर्विस करता व्यक्ति अपने गांव,कस्बे ,अपनी जड़ों में लौटना चाहता है तो उसके साथ बुरा भी हो सकता है,यदि वह आंख,मुंह बंद नहीं रखेगा। क्योंकि हर कोई सूबेदार नहीं हो सकता,जिसे फौज से ट्रेनिंग मिली हो। यह गम्भीर सवाल है कि क्यों हमारी आने वाली अधिकांश पीढ़ी उच्श्रृंखल,स्त्री शोषित और जिंदगी को बर्बाद करने वाली होती जा रही है? क्या वजह है जीवन मूल्य ह्यस की? क्या कोई इसकी रोकथाम करेगा? फिलहाल तो नजर ठहरती है लेखक,शिक्षकों,साहित्यकारों पर जो इस पीढ़ी को साहित्य,कविता,कहानी, गीतों के माध्यम से जीवन,अपनेपन और नैतिक आदर्शों से जोड़ें। हालांकि उनमें से भी अधिकांश अपने ही स्वार्थ और छोटी छोटी बातों की गिरह बांधे बैठे हैं।

   उपाय क्या हो यह सभी सोचें भी और हो सके तो उस पर अमल भी करे ।

 

         -----------------

(डॉ संदीप अवस्थी,

आलोचक और मोटिवेशन स्पीकर, 804,विजय सरिता एनक्लेव, बी ब्लॉक पंचशील,अजमेर,305004

मो 7737407061)