कुंभलगढ़ किले की गलियों में आज असामान्य हलचल थी। आम दिनों की तरह बच्चों का खेल, सेवकों की भागदौड़ और सैनिकों की चौकसी के बीच अब एक अजीब तनाव था। महल के ऊपरी कक्षों में, राजा उदय सिंह द्वितीय अपने मंत्रियों और सेनापतियों के साथ बैठक कर रहे थे।
“राजा साहब,” मंत्री ने कहा, “मुगल साम्राज्य हर दिन ताकतवर होता जा रहा है। दिल्ली से संदेश आया है कि अकबर अब सीधे मेवाड़ की ओर ध्यान दे रहा है। यदि हम समय रहते सावधान नहीं हुए, तो हमारा स्वाभिमान खतरे में पड़ सकता है।”
उदय सिंह ने गंभीरता से सिर हिलाया। उनकी आंखों में चिंता स्पष्ट थी, लेकिन आवाज में दृढ़ता थी।
“मुझे पता है। लेकिन मेवाड़ हमेशा स्वतंत्र रहेगा। किसी की इच्छा से नहीं झुकेगा।”
साथ में बैठे कुछ दरबारियों ने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन उनमें से कुछ की आंखों में लालच और सत्ता की भूख भी दिख रही थी।
यह समय था जब महल के भीतर राजनीतिक षड्यंत्र अपनी जड़ें जमा रहा था। उदय सिंह की दूसरी रानियों में से एक—जिसका नाम धीरबाई था—अपने बेटे को उत्तराधिकारी बनाने की योजना बना रही थी। उसके बेटे जगमाल को राजा बनाने की इच्छा उसकी आँखों में स्पष्ट थी।
धीरबाई अपने विश्वासपात्र दरबारी से कहती है,
“यदि प्रताप बड़ा हुआ और गद्दी संभाली, तो मेरे बेटे का अधिकार खतरे में पड़ जाएगा। हमें समय रहते कदम उठाना होगा।”
दरबारी ने सिर हिलाया।
“आप चिंता मत कीजिए, महारानी। अवसर आने पर सब व्यवस्थित हो जाएगा।”
महल के भीतर यह षड्यंत्र धीरे-धीरे फैल रहा था। छोटे प्रताप को अभी इस बात का अंदाजा भी नहीं था, लेकिन उसका जीवन अब केवल तलवार और घोड़े का नहीं रहा।
समय बीतता गया। प्रताप अब आठ साल का हो चुका था। उसका प्रशिक्षण जारी था—धनुष, तलवार और घुड़सवारी में वह अब सबसे तेज़ और सबसे निडर हो गया था। लेकिन इस बीच, उसे पहली बार राजनीतिक चालों की झलक भी देखने को मिली।
एक दिन महल के आंगन में प्रताप खेल रहा था। अचानक उसने देखा कि उसके शिक्षक और कुछ दरबारी चुपचाप चर्चा कर रहे थे। प्रताप ने अपने छोटे दिल की जिज्ञासा को दबाया नहीं। वह नजदीक गया और छिपकर उनकी बात सुनी।
“जगमाल को गद्दी पर बैठाना चाहिए। प्रताप अभी छोटा है, और उसकी बुद्धि पूर्ण नहीं। हमें योजना बनानी होगी।”
प्रताप के आंखों में एक चमक आ गई। यह पहली बार था जब उसे समझ में आया कि केवल बहादुरी ही नहीं, बल्कि सावधानी और बुद्धिमानी भी जरूरी है।
कुछ महीने बाद महल में उत्सव का समय आया। मेवाड़ के सभी प्रमुख रियासतों के राजकुमार और दरबारी महल में जमा हुए। यह अवसर प्रताप के लिए पहला सार्वजनिक परीक्षण था।
उदय सिंह ने छोटे प्रताप को सभा में पेश किया। लोग उसके साहस और निडरता के बारे में सुन चुके थे। जब प्रताप ने गले में तलवार और हाथ में धनुष लेकर सभा में कदम रखा, तो सभी स्तब्ध रह गए।
लेकिन उत्सव के बीच, धीरबाई ने अपनी चाल शुरू की। उसने कुछ दरबारियों को अपने पक्ष में कर लिया और प्रताप के सामने छोटी-छोटी बाधाएँ डालनी शुरू कीं।
प्रताप ने देखा कि कुछ दरबारी उसकी आलोचना कर रहे थे, और कुछ उसके काम को नकारने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन प्रताप ने डरने की बजाय धैर्य और साहस दिखाया। उसने सीधे अपने गुरु की ओर देखा, और गुरु ने उसे इशारा किया—“संयम रखो, समझदारी से काम लो।”
प्रताप ने सभा में विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“मेवाड़ का सम्मान किसी की चाल या योजना से कम नहीं होगा। यदि हम सब एकजुट हैं, तो कोई हमें नहीं हरा सकता।”
सभागार में एक गहरी चुप्पी छा गई। फिर धीरे-धीरे सभी ने तालियाँ बजाई। यह पहला अवसर था जब प्रताप ने अपनी राजनीतिक बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की झलक दिखाई।
लेकिन बाहर की दुनिया भी खतरे से खाली नहीं थी। मुगलों के दूत धीरे-धीरे मेवाड़ में पहुंच रहे थे। अकबर ने प्रताप की बहादुरी और मेवाड़ की स्वतंत्रता के बारे में सुना था, और उसने संदेश भेजा—“मेवाड़ को अपने अधीन करना ही मुगलों की नीति है।”
उदय सिंह ने यह संदेश पढ़ा और अपने दरबारियों से कहा,
“यह समय केवल तलवार से लड़ने का नहीं है। हमें अपने राज्य की सुरक्षा के लिए समझदारी से काम लेना होगा। प्रताप को भी यह सब सीखना होगा।”
प्रताप ने यह संदेश सुना। उसके मन में एक प्रश्न आया—“क्या केवल तलवार से ही किसी राज्य की रक्षा की जा सकती है? क्या समझदारी और साहस भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं?”
उस दिन से प्रताप ने केवल योद्धा बनने की ठानी नहीं, बल्कि एक निडर नेता और बुद्धिमान राजकुमार बनने की ठानी।
महल में धीरे-धीरे प्रताप की लोकप्रियता बढ़ने लगी। आम जनता और सैनिक उसे पसंद करने लगे। उसे देखकर लोगों के मन में एक विश्वास जागा—यह बच्चा भविष्य में मेवाड़ का सच्चा शेर बनेगा।
लेकिन धीरबाई और उसके समर्थकों की चालें जारी थीं। वे प्रताप को कमजोर करने के लिए छोटी-छोटी योजनाएँ बनाने लगे। प्रताप ने यह महसूस किया और गुरु से कहा,
“मुझे डर नहीं है। मुझे बस यह जानना है कि सही और गलत में फर्क कैसे किया जाए।”
गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा,
“तुम सीखोगे, राजकुमार। यही वह दिन है जब लड़ाई केवल तलवार की नहीं, बल्कि बुद्धि, धैर्य और नेतृत्व की होगी।”
चैप्टर के अंत में, रात को प्रताप अपने कमरे में बैठा था। चेतक पास खड़ा था। वह अपने छोटे हाथों में तलवार पकड़ कर सोच रहा था—आने वाले वर्षों में कितनी चुनौतियाँ आएँगी, कितनी राजनीतिक चालें उसके सामने होंगी।
लेकिन उसने एक बात तय कर ली थी—
“मैं कभी नहीं झुकूँगा। मैं केवल मेवाड़ और उसके लोगों के लिए ही जियूँगा।”