भाग -1.
लेखक -एसटीडी मौर्य
कटनी मध्य प्रदेश भारत
मोबाईल न. 7648959825
हमारा समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ रूढ़िवादिता और अंधविश्वास का खौफ इस कदर फैल गया है कि लोग इससे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। मैं देखता हूँ कि समाज को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें तो की जाती हैं, किंतु धरातल पर कुछ भी ठोस नहीं होता। वे सारी बातें सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह जाती हैं। लोग गीता, कुरान और बाइबल जैसी पवित्र पुस्तकें पढ़ते तो हैं, मगर उनके बताए आदर्शों पर कोई नहीं चलता। सच तो यह है कि आज के समय में किताबों की दुनिया जितनी खूबसूरत है, बाहरी दुनिया उतनी ही बदसूरत।
यदि कोई व्यक्ति समाज की भलाई के लिए आगे बढ़कर कार्य करना चाहता है, तो उसे यह कहकर दबा दिया जाता है कि— "तू क्या कर सकता है? तेरे जैसे बहुत आए और चले गए।"
आज से दो साल पहले, जब मेरी उम्र मात्र 14 वर्ष थी, मैं अंधविश्वास के खिलाफ लिखा करता था। मेरे लेखन के कारण कई बार विवाद हुए, यहाँ तक कि मुझे जान से मारने की धमकियाँ भी दी गईं। मैंने फेसबुक पर उन चैट को साझा कर लोगों को सचेत करना चाहा, पर कोई भी साथ खड़ा नहीं हुआ। जब मेरे घर वालों को इन विवादों का पता चला, तो डर के कारण उन्होंने मेरी पोस्ट्स डिलीट करवा दीं (हालांकि कुछ पुरानी पोस्ट आज भी मौजूद हैं)। उस समय दबाव और डर की वजह से मैंने लिखना बंद कर दिया था, पर अब मैंने पुनः लेखन कार्य शुरू कर दिया है और आज भी सामाजिक मुद्दों पर लिखता हूँ।
समाज में मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो अंधविश्वास के खिलाफ बोलना और समाज को जगाना चाहते हैं, पर उन्हें भी दबा दिया जाता है। कुछ लोग तो समाज सेवा के नाम पर 'दलाली' कर रहे हैं। यह समस्या बढ़ती जा रही है कि समाज सेवा का चोला ओढ़कर लोग कब अमीर बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
अजीब बात है कि जब कोई अंधविश्वास के खिलाफ बोलता है, तो पूरा समाज उसके विरुद्ध खड़ा हो जाता है, लेकिन जब उन्हीं लोगों की गरीबी का मजाक उड़ाया जाता है, तब उनमें लड़ने का साहस नहीं होता। आज का समाज नेताओं और दलालों की चाटुकारिता में व्यस्त है। उन पर जुल्म हो तब भी वे बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, लेकिन न्याय की बात करने वाले को दबाने में सब एक हो जाते हैं। हमारा समाज अंधविश्वास में इस कदर डूब गया है कि उसे अपनी वास्तविक शक्ति दिखाई ही नहीं देती।
जब किसी महापुरुष की जयंती आती है, तो लोग ऐसे दिखावा करते हैं जैसे उनसे बड़ा भक्त कोई न हो। वे सिर्फ नजरों में आने के लिए आडंबर करते हैं और समाज सेवा के नाम पर पैसा वसूलते हैं। मुझे यह समझ नहीं आता कि यदि कोई वास्तव में समाज सेवा करना चाहता है, तो उसे पैसों की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या समाज के कार्य बिना पैसों के (निस्वार्थ भाव से) नहीं किए जा सकते?
दिक्कत यही है कि लोग महापुरुषों की मूर्तियाँ तो पूजते हैं, पर उनके बताए मार्ग पर कोई नहीं चलता। हमारा समाज निस्वार्थ कर्म में नहीं, बल्कि 'दिखावे' में बहुत आगे है।