ठुमरियों की छलकती भावपूर्ण रसधार - अतीत से फ़िल्मों तक
श्री के .एल . पांडेय
[प्रस्तुति- नीलम कुलश्रेष्ठ ]
आइए कुछ विशेष फ़िल्मी गीतों को याद कर लिया जाए --के .एल. सहगल के गाये `लग गई चोट करेजवा में ` और `बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये`, लता मंगेशकर के गाये `जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ`,`जा जा रे जा बालमवा `, `कदर जाने ना मोरा बालम बेदर्दी `मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे`, `नदिया किनारे हेराय आई कंगना`,मन्ना डे के `जा रे बेईमान तुझे जान लिया जान लिया `,`आयो कहाँ से घनश्याम`, ‘फुलगेंदवा न मारो’,’ हटो काहे को झूठी बनाओ बतियाँ’, परवीन सुल्ताना का `कौन गली गयो श्याम’
वाणी जयराम का `मोरा साजन सौतन घर जाए ` से लेकर श्रेया घोषाल का ` चले आयो सैंयां ` और श्रेया घोषाल व पं .बिरजू महाराज का गाया `बाजीराव मस्तानी `का गीत `मोहे रंग दो लाल`I ऐसे और भी न जाने कितने फ़िल्मी गीत हमें बाक़ी गीतों से अलग लगते हैं क्योंकि ये गीत एक विशेष गायन विधा ‘ठुमरी’ पर आधारित हैं । इनके अलावा और भी गायक ठुमरी पर आधारित फ़िल्मी गीत गाते रहे हैं जैसे - राजकुमारी, शमशाद बेग़म, आशा भोंसले, संध्या मुखर्जी, आरती अंकलिकर आदि l ऐसे गीतों का पूरा आनन्द लेने के लिए हमें ‘ठुमरी’ को भली भाँति समझना अत्यन्त आवश्यक है ।
यदि देखा जाए तो उपशास्त्रीय विधाओं में ठुमरी जनसाधारण में सबसे लोकप्रिय गायन विधा है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि रागानुगामी गायन की चार विधाएं हैं --ध्रुपद ,ख़्याल ,टप्पा और ठुमरी । पहले दो शुद्ध शास्त्रीय हैं व बाद के दो उपशास्त्रीय। ठुमरी का नाम सुनते ही लोगों के मन में झुरझुरी होने लगती है कि यह कोई कठिन शास्त्रीय गायन तो नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है । अक्सर कुछ फ़िल्मी गीत लोगों को बहुत पसंद होते हैं बिना यह जाने कि वह ठुमरी पर आधारित होते हैं । ठुमरियों का प्रयोग कलात्मक,ऐतिहासिक फिल्मों में नृत्यों, मुजरों तथा पार्श्व संगीत के रूप में हुआ है। दर्शकों की बदलती अभिरुचि के कारण आजकल यह उपयोग कम हो गया है।
ठुमरी भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक गायन शैली है। ठुमरी की कुछ विशेषता यह है कि यह बहुत सहज है और इस पर नृत्य व भावाभिनय भी किया जा सकता है। इसमें सौंदर्यसिक्त एवं रसमय आरोह - अवरोह होते हैं, जो मन को आनंदित करते हैं। इनमें सामान्यत: दस – बारह, चपल /धुन प्रधान शास्त्रीय रागों अथवा सरल गेय रागों का ही प्रयोग होता है जैसे - भैरवी ,खमाज ,पहाड़ी ,काफ़ी ,पीलू ,गारा , देस ,तिलक ,कामोद ,तिलंग ,शिवरंजनी। ठुमरी में ताल की बात की जाये तो इसमें छोटे आवर्त्तन की तालों का प्रयोग करते हैं जैसे कहरवा ,दादरा ,दीपचंदी ,व जत। प्राय: विलम्बित लय तथा बाद में द्रुत कहरवा लग्गी प्रयोग की जाती है। ठुमरी के माध्यम से अनेक तरह के भाव या रस प्रकट किये जाते हैं जिनमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है, इसमें राग की शुद्धता के स्थान पर भाव सौंदर्य को अधिक महत्व दिया जाता है, इसलिए इसे उपशास्त्रीय गायन के अंतर्गत रखा जाता है। ।
आइए पहले ठुमरी का इतिहास जान लिया जाये। संगीतशास्त्री ठाकुर जयदेव सिंह के अनुसार इसका इतिहास 200 वर्ष के लगभग पुराना है। ठुमरी अर्थात ठुमक ठुमक + री = ठुमरी (सखी को सम्बोधन) अर्थात वह गायन जो सखी को सम्बोधित करते हुए ठुमक ठुमक कर किया जाये । यह सदैव भाव और रस से भरी हुई होती है, शास्त्रीय संगीत की कठिन वर्जनाओं से मुक्त एवं जन साधारण से जुड़ी हुई । मूल रूप से यह अभिनय व नृत्य से जुड़ी हुई थी और लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह से पहले भी तवायफ़ें महफ़िलों में ठुमरी गातीं थीं। वे स्वयं एक अच्छे नर्तक व गायक थे। उन्होंने अख्तर पिया के नाम से ठुमरियां लिखीं थीं। नवाब साहब ने ही नृत्य के साथ ठुमरी की प्रस्तुति आरम्भ की थी। यह अलग अलग यानी लखनवी अंदाज़ की ठुमरी ,बोल बाँट की ठुमरी, खड़ी ठुमरी, पछाहीं ठुमरी आदि नामों से भी जानी जाती थी।
जब अँग्रज़ो ने वाजिद अलीशाह को कोलकाता भेज दिया तो पंडित बिंदादीन महाराज व ग्वालियर के गणपत राव के प्रयासों से बनारस, मिर्ज़ापुर,पटना से ले कर कोलकाता तक यह मशहूर हो गई। ।लेकिन इस यात्रा में मूल ब्रज भाषा एवं अवधी के साथ भोजपुरी एवं अन्य भाषाओं के शब्द भी जुड़ गए और एक नई शैली का उद्भव हुआ जो बैठ कर गाई जाती थी । इसे बनारसी ठुमरी, पूरबी ठुमरी या बोल बनाव की ठुमरी कहा गया । समय के साथ इसमें कजरी, चैती,चौमासा, बारहमासा, सावन, झूला आदि लोक शैलियों के शब्दों और शैलियों का भी समावेश होता चला गया । बाद में पूरब अंग की ठुमरी के एक हल्के संस्करण ने भी जन्म लिया जिसे दादरा कहा गया । यह ठुमरी से अधिक मुक्त द्रुत एवं उन्मुक्त रूप में सामने आया ।
इसका उपयोग कथक के साथ भरपूर तरीक़े से किया गया, जो कि आज भी हो रहा है और मध्यकालीन नृत्य परम्परा के अंगहार,रेचक ,पिंडी को समाप्त कर कत्थक में सुर, ताल, लय, बंदिशों,तराने, ख्याल,ठुमरी,ग़ज़ल आदि के समावेश से इस नृत्य शैली में अनेक मनोहारी प्रयोग हुए जो आज तक जारी हैं l साथ ही दोहों, श्लोकों, शेरों,ग़ज़लों के ठुमरी में प्रयोग के साथ कथक नृत्य में चार चाँद लग जाते हैं ।
ठुमरी, कैशिकी (सजीली) प्रवृत्ति की उपशास्त्रीय भाव प्रधान गायकी है। अक्सर इसे श्रंगारिक या भक्तिरस में सराबोर कर प्रस्तुत किया जाता है। आलाप में सारंगी का प्रयोग रहता है तथा प्रारम्भ में तबले की धीमी लय तथा मुखड़े से ही विभिन्न अलंकारों जैसे खटका, मुर्की, आह, पुकार एवं काकु के प्रयोग से कलापक्ष में निखार आता है ।
शास्त्रीय दिखने वाला गीत ठुमरी या ठुमरी शैली से प्रभावित है, यह पहचान पाना भी बहुत कठिन नहीं है, बस उसे ब्रज या अवधी भाषा या उससे प्रभावित होना चाहिए, शृंगारिक होना चाहिए अदाकारी में नाज़, नख़रा, क्रोध, क्षोभ, उलाहना रूठने - मनाने एवं शिकायत के भाव होने चाहिए, बोलों को अथवा पूरी पूरी पंक्ति को बार बार अलग अलग रूप में दोहराते हुए प्रस्तुति होनी चाहिए और बहुत अधिक शास्त्रीय नहीं होनी चाहिए तो ऐसी रचना ठुमरी या ठुमरी शैली से प्रभावित ही होगी। गीतों की पृष्ठभूमि अधिकतर, भगवान कृष्ण और गोपियों के प्रेम प्रसंगों, होली की अठखेलियों अथवा नायक नायिकाओं के मिलन तथा वियोग पक्ष की सूक्ष्म संवेदनाओं से परिपूर्ण होने के कारण अत्यन्त मनभावन लगती है ।
वैसे तो ठुमरियाँ अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा पिछले २०० वर्षों से गायी जाती रही हैं लेकिन हमारे शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायक एवं गायिकाओं ने कुछ ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं जिनकी उत्कृष्टता उन्हें उनके नाम से ही सम्बद्ध कर देती है । हम इतिहास में छिपे बहुत से कलाकारों की प्रस्तुतियों को सुन पाने से अवश्य वंचित रह गए, लेकिन १९०२ से रेकोर्डिंग प्रारम्भ हो जाने के कारण, बहुत से कलाकारों की प्रस्तुतियों को रिकॉर्डेड रूप में अथवा प्रत्यक्ष कार्यक्रमों में सुनने का हमें अवश्य अवसर मिलता रहता है । इनमें सबसे पुरानी रेकॉर्ड की हुई ठुमरियाँ गौहर जान, मलका जान की मिलती हैं जो १९०२ और उसके बाद रेकॉर्ड हुई हैं। इनमें सबसे पुरानी ठुमरी गौहर जान की है -`रस के भरे तोरे नैन` है। बाद में महबूब जान शोलापुर, जानकीबाई इलाहाबाद, ज़ोहराबाई आगरा, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ, हीराबाई बड़ोदकर, केसरबाई केरकर, बड़ी मोती बाई, सिद्धेश्वरी देवी, रसूलन बाई, काशी बाई, जद्दन बाई, इन्दुबाला, अंगूरबाला, की गाई ठुमरियों के भी रेकॉर्ड बने हैं ।
इसके बाद की गायिकाओं में बेगम अख़्तर, गिरिजा देवी, निर्मला देवी, लक्ष्मी शंकर, अनीता सेन, किशोरी अमोनकर, शोभा गुर्टू, नैना देवी, सविता देवी, हीरा देवी मिश्रा, मालबिका कानन, छाया गांगुली, कनकना बैनर्जी, पूर्णिमा चौधरी, शुभा मुद्गल, कौशिकी चक्रवर्ती, सोमा घोष, सुचरिता गुप्ता तथा गायक कलाकारों में पं नारायण राव व्यास, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ, उस्ताद नज़ाकत अली - सलामत अली खाँ, मुनव्वर अली खान, पं. ए.टी. कानन, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, पं. पशुपतिनाथ मिश्र, पं. छन्नूलाल मिश्र, पं. अजय चक्रवर्ती, पं. बिरजू महाराज, पं. जगदीश प्रसाद तथा पं. वसन्तराव देशपांडे, उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खाँ एवं उस्ताद राशिद खाँ शामिल हैं ।
हिन्दी फ़िल्मों में प्रारम्भ से ही ठुमरियों का प्रयोग मिलता है । कहानी की दृष्टि से इन्हें शास्त्रीय गायन एवं नृत्य प्रस्तुतियों , संवेदनशील दृश्यों एवं मुजरों में समावेशित किया जाता रहा है । चित्रपट संगीत में कहानी के अनुरूप अनेक ठुमरी के शुद्ध एवं व्यावहारिक रूप और कई ठुमरीनुमा गीत दिखाई देते हैं ।
कुछ चयनित फ़िल्मी ठुमरियों एवं उनमें प्रयोग हुए रागों का विवरण निम्न हैं -
१.लग गई चोट करेजवा में - यहूदी की लड़की (१९३३) - के.एल. सैगल - काफ़ी
२.पिया बिन नहीं आवत चैन - देवदास (१९३५)- के.एल. सैगल - झिंझोटी
३.बाबुल मोरा नैहर - स्ट्रीट सिंगर १९३८ - के.एल. सैगल - भैरवी
४.पा लागूँ कर जोरी रे - आपकी सेवा में १९४७ - लता मंगेशकर - पीलू
५.चले जइहो बेदरदा - बेक़सूर १९५० - राजकुमारी - खमाज + यमन कल्याण
६.सौतन घर ना जा - वारिस १९५४ - राजकुमारी - खमाज
७.ना जाने ना जाने रे - बिराज बहू १९५४ - शमशाद बेगम - खमाज
८.जा मैं तो से नाहीं बोलूँ - सौतेला भाई १९६२ - लता मंगेशकर - अड़ाना + बहार + गारा + मियाँ की मल्हार + काफ़ी + शहाना
९.तोरे नैना लागे - ममता १९६६ - सन्ध्या मुखर्जी - गौड़ सारंग + मेघ + देस + आभोगी
१०.जा जा रे जा बालमवा - बसंत बहार - १९५६ - लता मंगेशकर - खमाज + रागेश्री + काफ़ी
११.जा रे बेईमान तुझे जान लिया - प्राइवेट सेक्रेटेरी १९६२ - मन्ना डे - बागेश्री
१२.छोटा सा बालमा १९५८ - लता मंगेशकर - पहाड़ी + तिलंग + माँझ खमाज
१३.आयो कहाँ से घनश्याम - बुड्ढा मिल गया १९७१ - मन्ना डे - खमाज
१४.कौन गली गयो श्याम - पाकीज़ा १९७१ - परवीन सुल्ताना - पहाड़ी
१५.मोरा साजन सौतन घर जाए - पाकीज़ा १९७१ - वाणी जयराम - पहाड़ी + मारू बिहाग
१६.नजरिया की मारी - पाकीज़ा १९७१ - राजकुमारी - मारू बिहाग + पहाड़ी + खमाज
१७.घर नहीं हमरे श्याम - सरदारी बेगम १९९७ - आरती अंकलिकर - नंद
१८.घिर घिर आई बदरिया कारी - सरदारी बेगम १९९७ - आरती अंकलिकर - नन्द
१९.मोरे कान्हा जो आए पलट के - सरदारी बेगम १९९७ - आरती अंकलिकर/आशा भोंसले - पीलू
२०.कदर जाने ना मोरा बालम - भाई भाई १९५६ - लता मंगेशकर - भैरवी
२१.नदिया किनारे हेराय आई कंगना - अभिमान १९७३ - लता मंगेशकर - पीलू
२२.मोहे पनघट पे नंदलाल - मुग़ल ए आज़म १९६० - लता मंगेशकर - गारा
२३.चले आओ सैयाँ - खोया खोया चाँद २००७ - श्रेया घोषाल - पीलू + गारा + खमाज
२४.बावरा मन देखने चला - हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी २००५- शुभा मुद्गल - छायानट
२५.मोहे रंग दो लाल - बाजीराव मस्तानी २०१५ - श्रेया घोषाल एवं पं. बिरजू महाराज - पूरिया धनाश्री + पूरिया कल्याण + काफ़ी + यमन ।
आजकल जो शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम होते हैं उनमें अंत में रस परिवर्तन के लिए ठुमरी का प्रयोग किया जाता है । हमें कुछ पुरानी कला प्रधान सामाजिक एवं ऐतिहासिक फिल्मों में अक्सर इनका प्रयोग मुजरों या पृष्ठभूमि में देखने को मिलता था अब तो केवल नाममात्र की बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों में इनका प्रयोग मिलता हैl आशा है आगे हमें कलात्मक, संगीत एवं नृत्य प्रधान तथा ऐतिहासिक फ़िल्मों में कुछ नई ठुमरियों के प्रयोग अवश्य देखने को मिलेंगे ।
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[नोट --ठुमरी पर मेरा ये आलेख सुप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत विशेषज्ञ श्री के. एल. पांडेय जी के मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद ,भोपाल के ` गमक` कार्यक्रम के अंतर्गत पटल पर `ठुमरी `पर व्याख्यान व इनके ठुमरी पर आलेख पर शत प्रतिशत आधारित है-- नीलम कुलश्रेष्ठ ]
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श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ
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अहमदाबाद ---380058 [ गुजरात ]
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