अंत से अनंत तक की यात्रा — शिव अंत क्या है? जहाँ सीमाएँ समाप्त होती हैं, जहाँ नाम और रूप विलीन हो जाते हैं, जहाँ अहंकार टूटता है — वही अंत है।
और अनंत क्या है?जहाँ से सब प्रारंभ होता है, जहाँ सब कुछ व्याप्त है, जो काल, दिशा, स्थिति से परे है — वही अनंत है।
अंत और अनंत के बीच जो सेतु है, वही शिव हैं।वह शून्य भी हैं और पूर्ण भी।वह मौन भी हैं और नाद भी।वह ध्यान भी हैं और समाधि भी।
शिव सत्य हैं — क्योंकि सत्य वही है जो कभी बदलता नहीं।शिव शाश्वत हैं — क्योंकि समय भी जिनमें उत्पन्न होकर लय हो जाता है।
शिव अनंत हैं — क्योंकि दिशा और विस्तार भी उनकी सीमा को नहीं छू सकते।शिव अविनाशी हैं — क्योंकि विनाश भी जिनका एक रूप मात्र है।
वह कर्ता भी हैं, कारण भी।वह सृष्टि के उद्गम हैं — जैसे बीज में वृक्ष छिपा होता है।वह पालक हैं — जैसे श्वास जीवन को धारण करती है।वह संहारक हैं — जैसे संध्या दिन को समेट लेती है।
उनका तांडव केवल विनाश नहीं, बल्कि पुनः सृजन की तैयारी है।उनकी जटाओं से बहती चेतना ही जीवन की धारा है।उनके नेत्रों की ज्वाला ही अज्ञान का अंत करती है।
संस्कृत में ‘शिव’ का अर्थ है — कल्याणकारी।यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता कहा गया है।‘शि’ — जो पाप, अज्ञान, मोह और भय का नाश करे।‘व’ — जो कल्याण, मुक्ति और प्रकाश प्रदान करे।अर्थात् जो अंधकार हराकर ज्योति दे — वही शिव है।
शिव के बिना ब्रह्मांड की कल्पना भी अधूरी है।उनके ध्यान से सृष्टि का विस्तार है,उनके तप से प्रकृति में चेतना का संचार है,उनके संकल्प से समय गति करता है,और उनके रुद्रभाव से सब कुछ पुनः मौन में विलीन हो जाता है।
यह समस्त जगत उसी परम तत्व को जानने की यात्रा है।मनुष्य जब जन्म लेता है, तब वह अंत की ओर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है;परंतु वास्तव में वह अनंत की ओर अग्रसर होता है।
चिंतन, मनन, ध्यान, योग, व्रत, तप —ये सब साधन हैं, लक्ष्य नहीं।लक्ष्य है — स्वयं को पहचानना।और जब साधक भीतर झाँकता है, तब उसे ज्ञात होता है —जिसे वह बाहर खोज रहा था, वह तो भीतर ही ज्योति रूप में विद्यमान है।
योगियों ने इसी सत्य को “शिवोऽहम्” कहकर प्रकट किया।अर्थात् —
मैं वही चेतना हूँ।
मैं सीमित देह नहीं, अनंत आत्मा हूँ।
मैं जड़ नहीं, चेतन हूँ।
मैं अंश नहीं, पूर्ण का प्रतिबिंब हूँ।
शिव कोई दूर स्थित देव नहीं—
वह प्रत्येक प्राणी की श्वास में हैं
,हर धड़कन में हैं, हर कण में हैं ,हर मौन में हैं।
जब मन शिवमय हो जाता है,तो द्वेष मिट जाता है।
जब हृदय शिवमय हो जाता है,
तो भय समाप्त हो जाता है।
जब दृष्टि शिवमय हो जाती है,
तो सबमें वही एक तत्व दिखाई देता है।
शिव सा न कोई, शिव सा न होई,
शिव मन जब होई — शिव सब होई।
अंत से अनंत तक की यात्रा तब पूर्ण होती हैजब साधक समझ लेता है —अंत भी शिव है, अनंत भी शिव है,मार्ग भी शिव है, मंज़िल भी शिव है,जिज्ञासा भी शिव है, और उत्तर भी शिव है।जहाँ कल्याण है, वहीं शिव हैं।जहाँ मंगल है, वहीं शिव हैं।जहाँ प्रेम है, करुणा है, शांति है —वहीं शिव का साक्षात् निवास है।
अंततः —अंत मिटता है,अनंत प्रकट होता है,और साधक कह उठता है —शिवोऽहम्।