Colorful memories in Hindi Short Stories by Radhika books and stories PDF | रंगीन यादें

The Author
Featured Books
Categories
Share

रंगीन यादें

होली! एक ऐसा त्यौहार जो रंगों की छटा से सबकी बेरंग दुनिया को रंगीन बना देती। यह एक ऐसा त्यौहार है जो नई शुरुआत का संदेश देता है। इस समय सारे दुश्मन भी एक हो जाते हैं और "बुरा न मानो होली है" का नारा लगा कर रंगो से सराबोर कर देते हैं। वैसे ही यह मेरी बचपन की यादें हैं जो कहानी की तरह में यहां पेश कर रहीं हूं।

यह उस समय की बात है जब गांवों की होली बहुत अलग हुआ करतीं थी। 
रानी बहुत खुश थी,आज होली का दिन जो था। उसे पता था कि होली मतलब ढेर सारी मस्ती, ढेर सारा रंगीन पानी और ढेर सारी गुझिए। यहीं तो था जो उसे खुश होने का दुगुना मौका देता था। 
          घर में बन रहें गुझियों की सुगंध उसे अपनी ओर खींच रही थी लेकिन वो डर रहीं थीं क्योंकि मां घर में कुछ भी अच्छा नहीं बनाना चाहती थी क्योंकि उसकी छोटी बेटी शिया बीमार थी और उस पर थोड़ी देर पहले ही छोटे भाई ने गर्म गुझिए से अपना मुंह जला लिया था। अब अगर वो जाकर मां से गुझिए मांगती तो पक्का डांट खाती। लेकिन वह लगातार टकटकी लगाए मां को देखें जा रही थी और तभी मां को उस पर दया आ गई और उन्होंने एक गुझिया निकाल कर उसको दिया जिससे उसकी आंखें चमक उठी। 
 
   वहीं दूसरे कमरे से लगातार हल्की हल्की रोने की आवाजें आ रही थी। और वहीं साथ में होली के गीतों की मधुर आवाजें भी आ रहीं थीं। यह रानी की दादी मां थी जो उसकी छोटी बहन शिया को सुलाने की कोशिश कर रही थी। वहीं बड़े भैया शिवम उसका थपकी लगा कर चुप करा रहे थे। पर शिया का मन तो उतावला सा हो रहा था। शिया पिछले कुछ दिनों से बिमार थी। आज भी उसे बहुत तेज बुखार था 

रानी ने दूर से ही अपनी बहन को देखा क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि इस तरह अच्छे कपड़े पहन कर वह उसके सामने जाएं जो बीमार पड़ी है। वह बहुत दुखी होकर बैठ गई। वह सोचती रही उसका भी मन होगा? भला मैं कैसे उसकी मदद करूं? काश वो ठीक होती तो मैं उसे अपने साथ पूरे गांव के चक्कर लगाती। तभी पापा ने उसे उदास देख कर समझाया कि त्यौहार साल में एक बार आता है इसलिए हमें खुश होना चाहिए। दुःख तकलीफ़ो का क्या? वो तो जिन्दगी भर खत्म नहीं होते। 
     तुम शिया को देख कर उदास मत होना, मैं शिया को डॉक्टर के पास कल फिर से ले जाऊंगा, फिर वो पक्का ठीक हो जाएंगी और इस बात पर रानी को थोड़ा अच्छा लगा। 
   तभी उर्मी आई और उसका हाथ थामे बाहर दौड़ लगा ली। गांव में चारों तरफ चहल पहल था। लड़कों की टोली होली की लड़कियां लाने में मग्न थें तो वहीं लड़कियां सांज श्रृंगार में। और बच्चे? उनका तो काम ही है धमाचौकड़ी मचाना। 
   होली जलने का समय शाम के पांच बजे के बाद था और उसमें काफी वक्त था। रानी अपने बड़ी मां के घर गई जहां उसने अपनी दीदियों को तैयार होते हुए देखा। साड़ियों में लगे सितारे चमक रहें हैं और उनके हाथों की चूड़ियां खनखन बज रहीं थी। किसी कि पायल तो किसी के गले का हार। उसे समझ नहीं आ रहा था कि किसे देखें? मगर इतना तो था। यह कोरकू जनजाति का प्रमुख त्यौहार है जो धूमधाम से मनाया जाता हैं इसलिए उसने मन में ही कहा कि मैं भी बड़ी होकर इनकी तरह सज धज कर होली के गीत गाने जाऊंगी।
       वो अभी खोई हुई थी कि उसका बड़ा भाई दौड़ता हुआ आया और उसका हाथ थाम उसे घर ले गया। एक तरफ जहां त्यौहार का माहौल था तो दूसरी ओर उसके घर में अजीब स्थितियां थी। शिया बार बार बेहोश हो रहीं थी। सब घबराएं हुए थे। मां और दादी के आंखों में आंसू आ रहें थें मगर खुद को सम्भाले हुए थे। शिवम भैया अभि को शांत करने में लगे हुए थे जबकि रानी की आंखें तो मानों समुद्र सी हो गई थी जिसमें आंसू के लहरें उठ रहे थे। उस समय गांव के रास्ते बड़े खराब हुआ करते थे। कच्ची पगडंडी वाला रास्ता और एक पूराना स्कूटर जिस पर मां पापा शिया को डॉक्टर के पास ले जा रहे थे और रानी बस रोते हुए अपनी बहन के ठीक होने की दुआ कर रहीं थीं। अब तो उसे सब कुछ फीका लगने लगा ही था कि ढोल पावी (मुरली) बज उठा और उसके साथ साथ लड़कियों के खेंडेरा ( होली के गीत) गाने की आवाजें आने लगी। 

दादी तीनों बच्चों का हाथ थामे मैदान की ओर निकल गई जहां होलिका दहन हो रहा था। लोग नाच गा रहे थे। बहुत ही अद्भुत नजारा था। गांव के लोग खुशियां मना रहें थें। दो होली के बीच छोटा सा झूला बना हुआ था और लकड़ियों पर धागे और पूरियां लटक रही थी। 
     गांव के मुखिया ने और साथ ही कई बुजुर्गों ने होली की पूजा किया और फिर होली जला दी गई। होली से उठती आग की लपटों के साथ लड़कों के गाने की आवाजें भी तेज हो गई। सब गेंहू के दानों को अपने और बच्चों के ऊपर से उतारते हुए होली से नाकारात्मकता को ले जाने की दुआ कर रहे थे। 

दादी मां ने भी रानी और दोनों भाईयों के ऊपर से दाना उतारा और होली में जला दी। लेकिन इस समय रानी को इन ऊंची आवाजों के बीच अपनी बहन की रोने की आवाजें आ रही थी और अचानक उसके मन में चित्कार सा उठा और वो रो पड़ी। उसने जलती हुई होली से प्रार्थना कि वह अपने साथ उसके बहन के दुख तकलीफों को साथ ले जाएं और उसे एक स्वस्थ जीवन दें ताकि वह हमेशा खुश रहे। 

होली की आग अब ठंडी हो चुकी थी सभी एक दूसरे से गले मिलते हुए होली कि बधाईयां दे रहे थे और गुलाल भी लगा रहें थें। 
मगर रानी अपनी दादी के साथ घर आ चुकी थी। इस समय माहौल बहुत ठंडा था। शाम के सात बज रहे थे और अब तक मां पापा, शिया को लेकर लौटें नहीं थें। किसी ने भी खाने को हाथ तक नहीं लगाया था। बड़े भैया सो चुके थे वहीं छोटा अभि भी बिना खाएं सो गया था और रानी दादी के गोद में सिर रख कर बस रोएं जा रही थी जबकि दादी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बस दरवाजे की ओर देखें जा रहें थें। धीरे धीरे रानी गहरी नींद में सो गई थी।
•••••••🌿
सुबह जब उसकी आंख खूली तो घर का माहौल थोड़ा हल्का लग रहा था। दादी मां, गली में मुर्गियों को दाना डाल रहीं थी वहीं पापा भी नीम की दातून कर रहे थे और मां पानी का घड़ा लिए कुएं से लौट रहें थें। वह जल्दी जल्दी दुसरे रूम में गई जहां मां पापा सोते थें पर वहां कोई नहीं था। वह घबरा सी गई। उसने पूरा घर देख लिया मगर शिया नहीं थीं। वह अभी रोने ही वाली थी कि उसे अभि के हंसने की आवाज आई और वह पीछे कि और गई जहां शिवम भैया रंगीन पानी बना रहे थे और अभि उसे पिचकारी में भर कर शेरू पर निशाना साध रहा था और जब भी शेरू को पानी लगता वो तुरन्त बाल झटक लेता और अभि खिलखिला उठता। तभी उसने देखा कि शिया भी रंग में हाथ डालें बैठी थी और खुश हो रही थी। अपनी बहन को खेलते , मुस्कुराते हुए देख उसके जान में जान आई। उसकी आंखें भर आई और वो सिसक सिसक कर रो पड़ी। उसने होलिका का शुक्रिया अदा किया क्योंकि उसकी मनोकामना पूरी हो गई थी। अपनी बहन को सही सलामत देख वह बहुत खुश थी।
     रानी ने शिया को गले लगा लिया। दोनों बहनों का प्यार देख कर सभी का हृदय भावविभोर हो गया। 

बाहर होली खेलने वालों की आवाजें आ रहीं थीं इसलिए शिया ने अपनी हिस्से की पिचकारी भी उसे देते हुए होली खेलने को कहा। उसके अंदर इस वक्त इतना ताकत नहीं था लेकिन वह चाहती थी कि उसकी दीदी जी भर कर होली खेलें हमेशा कि तरह। खुशी से, रंगो के साथ वह भी रंग जाएं। रानी ने अपनी बहन को गुलाल लगाया और उसके लिए गुझिएंं लाई जो मां आज स्पेशली उसके लिए बना रहीं थीं। उसकी आंखें चमक उठी। गुझिएं खाकर उसे ऐसा लगा जैसे वो बिमार थी हीं नहीं। वह खुद से धीरे धीरे चल पा रही थी हालांकि यह उसके लिए थोड़ा मुश्किल हो रहा था लेकिन वह खुश थी। 

अभि ने दोनों को रंगीन पिचकारी मारी और भाग खड़ा हुआ। लेकिन आगे से शिवम भैया ने उसे पकड़ लिया और आखिर में तीनों ने मिलकर उसे बंदर बना दिया। अभि जब भी हंसता उसके दांत चमकते हुए नज़र आते इस पर तो पूरा परिवार ठहाके लगा कर हंस रहा था। 
  अब रानी अपने दोस्तों के टोली के साथ निकल चुकीं थीं होली खेलने। यह होली भले ही थोड़ा सा दुखदायक था लेकिन अंत बहुत ही सुखद था।
 •••••••••••🌿🎀