Satyagraha, is it eternal? in Hindi Philosophy by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | सत्याग्रह, क्या शाश्वत है?

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सत्याग्रह, क्या शाश्वत है?

सत्याग्रह : जिसने बैरिस्टर गांधी को महात्मा गांधी बना दिया 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

सत्याग्रह केवल एक रणनीति नहीं यह संघर्ष का एक नया दर्शन था, जो दक्षिण अफ्रीका की धूलभरी सड़कों पर जन्मा और भारत की गर्म मिट्टी में पूरी तरह खिलकर दुनिया भर में फैल गया। यह एक विचार है, जिसने शारीरिक बल के स्थान पर आत्मबल को, प्रतिहिंसा के स्थान पर सहनशक्ति को और जीत-हार के स्थान पर हृदय-परिवर्तन को स्थापित करने का साहसिक प्रयास किया।

सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है, ‘सत्य के प्रति आग्रह’। यह एक सक्रिय अहिंसक प्रतिरोध है, जहाँ अन्याय का विरोध करने वाला स्वयं कष्ट सहने को तैयार रहता है ताकि विरोधी का हृदय परिवर्तित हो सके। इसके विपरीत, आंदोलन एक व्यापक शब्द है, जो सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन के लिए किए गए किसी भी संगठित सामूहिक प्रयास को दर्शाता है। 
सत्याग्रह आंदोलन का सबसे नैतिक और अनुशासित रूप माना जा सकता है, जहाँ साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर समान बल दिया जाता है।

सत्याग्रह का पहला प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में हुआ । 1893 में पीटरमैरिट्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन पर हुए नस्लीय अपमान ने गांधी के मन में प्रतिरोध की अलख जगाई। यहीं पर, 1906 में एशियाई लोगों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून के विरोध में पहला संगठित सत्याग्रह शुरू हुआ। 1913 का वोल्क्रस्ट सत्याग्रह, जहाँ गरीब मजदूरों पर लगाए गए 3 पाउंड के अमानवीय कर के खिलाफ हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे, ने इस अस्त्र की शक्ति को पहली बार सिद्ध किया। दक्षिण अफ्रीका में ही गांधी ने सत्याग्रहियों को तैयार करने के लिए फीनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय फार्म जैसे सामुदायिक आश्रम भी स्थापित किए।

भारत आकर यह विचार एक जन-आंदोलन में बदल गया। 1917 का चंपारण सत्याग्रह पहली बड़ी जीत थी, जहाँ नील की खेती के लिए मजबूर किए गए किसानों को ‘तिनकठिया’ प्रणाली के जुए से मुक्ति मिली। इसी क्रम में 1918 के खेड़ा सत्याग्रह ने अकाल पीड़ित किसानों को लगान से राहत दिलाई और अहमदाबाद की मिल हड़ताल ने पहली बार श्रमिक अधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष का मार्ग दिखाया।

इन सभी प्रयोगों की परिणति 1930 के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) में हुई। एक साधारण नमक कानून को तोड़ने के लिए की गई यह 240 मील की प्रतीकात्मक यात्रा दरअसल एक साम्राज्य के नैतिक आधार पर प्रहार थी। इससे उपजे जन-जागरण ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई ऊर्जा दी और दुनिया के सामने अहिंसक संघर्ष की ताकत को अमिट रूप से रेखांकित कर दिया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद सत्याग्रह का सिद्धांत पूरी दुनिया में प्रेरणा के स्रोत बना, हालाँकि प्रत्येक संदर्भ में इन्हें नए सिरे से ढाला गया:

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन का नेतृत्व करते हुए गांधी के सिद्धांतों को सीधे अपनाया। अलबामा में बस बहिष्कार और वाशिंगटन में ऐतिहासिक मार्च सविनय अवज्ञा और नैतिक दबाव के ऐसे ही प्रयोग थे, जिन्होंने नस्लीय विभेद के कानूनों को उखाड़ फेंकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

दक्षिण अफ्रीका में, नेल्सन मंडेला ने रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष किया। यद्यपि प्रारंभिक रणनीति में भिन्नता रही, किंतु सत्ता में आने के बाद सुलह और क्षमा की उनकी नीति तथा सत्य एवं सुलह आयोग की स्थापना, गांधी के ‘हृदय-परिवर्तन’ के सिद्धांत का ही एक सार्थक विस्तार थी।

इसी प्रकार, पाकिस्तानी सीमांत पर, खान अब्दुल गफ्फार खान ने ‘सरहदी गांधी’ के रूप में, अपने खुदाई खिदमतगार आंदोलन के माध्यम से यह सिद्ध किया कि अहिंसा और सत्याग्रह किसी एक धर्म या संस्कृति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये सार्वभौमिक मानवीय मूल्य हैं।

इनके अलावा, अरब स्प्रिंग के प्रारंभिक अहिंसक विरोध और वैश्विक पर्यावरण आंदोलनों में भी सामूहिक अवज्ञा और नैतिक दबाव के सत्याग्रही तत्व स्पष्ट दिखाई देते हैं।

समकालीन जटिल प्रश्न और नई प्रासंगिकता

यह एक गहन प्रश्न है कि यदि सत्याग्रह इतना प्रभावी था, तो आज राष्ट्र संघर्षों के लिए यह मार्ग क्यों नहीं चुनते? इसके पीछे कई कठिन वास्तविकताएँ हैं:

 आधुनिक राष्ट्र संप्रभुता, सुरक्षा और तात्कालिक रणनीतिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं। सत्याग्रह जिस दीर्घकालिक धैर्य, जन-एकता और नैतिक ऊर्जा की माँग करता है, वह अक्सर राजनीतिक समीकरणों में फिट नहीं बैठता।
 युद्ध के लिए एक ‘दूसरे’ या ‘शत्रु’ का निर्माण ज़रूरी है, जबकि सत्याग्रह विरोधी को भी एक संवाद और परिवर्तन की संभावना के रूप में देखता है।
 गांधी का सत्याग्रह एक सापेक्ष रूप से खुले औपनिवेशिक शासन के खिलाफ था, जहाँ नैतिक दबाव का कुछ असर हो सकता था। सैन्य तानाशाहियों या कट्टरपंथी शासनों के सामने इसकी सफलता की संभावना सीमित हो जाती है।

आज कॉर्पोरेट संस्कृति और व्यक्तिवाद के युग में आंदोलनों का स्वरूप बदल गया है। सोशल मीडिया ‘एक्टिविज़्म’ ने अक्सर संघर्ष को सतही और अल्पकालिक बना दिया है। हैशटैग क्रांतियों में वह सामूहिक बलिदान और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता कम दिखती है, जो सत्याग्रह की रीढ़ थी।

फिर भी, सत्याग्रह की भावना आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है, बस उसके रूप बदल गए हैं।

· जलवायु न्याय के लिए ग्रेटा थनबर्ग और युवाओं का आंदोलन।
· नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सूचना का अधिकार (RTI) और न्यायिक प्रक्रियाओं का सहारा।
· किसानों के अधिकार या नागरिकता जैसे मुद्दों पर लंबे और अनुशासित धरने।

ये सभी सत्याग्रह के आधुनिक अवतार हैं, जो नैतिक दबाव, सामूहिक एकजुटता और अहिंसक दृढ़ता के मूलमंत्र को थामे हुए हैं।


 गांधी का सत्याग्रह कोई जादू की छड़ी या सार्वकालिक फॉर्मूला नहीं था। यह मानव संघर्ष के लिए एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण था, जिसकी सफलता विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों, एक करिश्माई नेता और जनता की अदम्य इच्छाशक्ति का संयोग थी। यह सच है कि कोई अन्य देश ठीक उसी ढंग से इससे आज़ाद नहीं हुआ, लेकिन इसके सिद्धांतों ने दुनिया भर में न्याय के संघर्षों को गहराई से प्रभावित किया है।

आज, जब दुनिया हिंसक संघर्षों, पारिस्थितिक विषमताओं और बढ़ती असमानता से जूझ रही है, सत्याग्रह का दर्शन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि वास्तविक और टिकाऊ परिवर्तन की यात्रा आत्म-अनुशासन से शुरू होती है, और सबसे बडी विजय दूसरे को हराना नहीं, बल्कि उसे समझाना और बदलना है। यह मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन मानवता के लिए यही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो शांति और न्याय दोनों को स्थापित कर सकता है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव