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अब जब बच्चे अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहने लगे तब गृहस्थी में व्यस्त आना की पलकों ने झपकी ली | बच्चों के स्कूल जाने के बाद उसे अपना खाली रहना अखरने लगा |कोई खोया हुआ सा सपना उसकी आँखों में फिर से भर आया | कपड़ों की अलमारी व्यवस्थित करती तो लगता यहाँ तो पुस्तकें रखनी थीं फिर कपड़े क्यों ? बच्चों की पुस्तकें खोलकर बैठती तो लगता, कुछ भी नहीं आता उसे, फिर से बच्चों के साथ पढ़ना शुरू कर देना चाहिए | सब ओर पुस्तकें ही पुस्तकें दिखाई देतीं | बच्चों के स्कूल जाने के बाद गुजरात विद्यापीठ के पुस्तकालय में जा पहुँचती जो पास ही था|वहाँ की सदस्यता लेनी मुश्किल थी, किसी विद्यापीठ के छात्र/अध्यापक /कर्मचारी का पहचानवाला होना ज़रूरी था|पुस्तकालय का सदस्य बनने के लिए एक फॉर्म भरना पड़ता और उस पर किसी सदस्य अथवा किसी कर्मचारी या अध्यापक के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती | न जाने किस-किससे मिलकर सदस्यता ली और पुस्तकें घर लाकर पढ़नी शुरू कीं |तब महसूस किया कि वह अपनी किशोरावस्था में पाठ्य पुस्तकों में छिपाकर क्या पढ़ती रही थी ? अब जाकर उसने साहित्य की पुस्तकों का रसास्वादन करना शुरू किया था |
पति का जॉब भी ऐसा कि महीने भर घर में हैं तो महीने भर बाहर!सो, पुस्तकों ने उसका एकाकीपन बाँटना शुरू किया, दोस्त बन गईं वे उसकी !मार्गदर्शक दोस्त !
जब चौदह/पंद्रह वर्ष के हो गए बच्चे तब उसको और भी शिद्द्त से लगने लगा कि शिक्षा के क्षेत्र में अंतर से जुड़े माता -पिता की बिटिया होते हुए भी उसका पढ़ाई में मन क्यों नहीं लग सका ?अब अफ़सोस हुआ उसे खुद पर, तिलमिलाहट सी होने लगी| ख़ालीपन से भर उठती वह !
"मिसेज़ गौड, क्यों न आप भी हमारे साथ किट्टी जॉयन कर लें ?"बड़ी सभ्यता से पूछा था उन्होंने अनामिका से |
पास के फ़्लैट वाली मिसेज़ गीता सिंह कुछ अधिक ही मॉडर्न थीं | पता नहीं क्यों जब तक पूर्णिमा भाभी का और उसका साथ था, न तो उसे किसीकी ज़रूरत पड़ी और न ही किसीने उससे कुछ कहने का साहस किया | होता है न किसी -किसी का व्यक्तित्व ऐसा कि उसके सामने बेशक नज़रें इधर-उधर चलती रहें लेकिन ज़ुबान नहीं चलती | पूर्णिमा भाभी के सरल किन्तु सुदृढ़ व्यक्तित्व के सामने कभी किसीने मुँह नहीं खोला था लेकिन अब गीता की आँखों के साथ उसकी ज़ुबान भी चलने लगी थी |
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के किसी कस्बे से अहमदाबाद पहुँचीं मिसेज़ गीता सिंह वैसे तो एम.ए पास थीं, न जाने उन्होंने कैसे इतनी शिक्षा ग्रहण कर ली थी! उनके मुखारविंद से गालियाँ फूलों सी झड़तीं|असभ्य भाषा व असभ्य व्यवहार का शब्दकोष थीं वे ! विवेक कभी हँसी में जब उन्हें एम. ए पास की जगह ‘ऐवें ही’ कहते, आना को बड़ा खराब लगता लेकिन बात तो सच ही थी आख़िर कागज़ के टुकड़े बटोरने में और शिक्षित होने में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता है न !
उसे याद आए अपने वो मित्र जिनके परिवारों में पढ़ाई को लेकर कुछ इस प्रकार की चर्चाएँ होती रहती थीं ;
"अरी ! पढ़ ले, ढंग का लौंडा, ढंग की सुसराल मिल जावेगी ---"
"फलाना की लौंडिया ने एम.ए में एडमिसन क्या लिया जी, ऐसे बढ़िया घर से रिस्ता आया के बस---अर , देखियो चप्पल भी नी घिसनी पड़ी हैंगी फलानी के घरवालों को ---" अपने परिवार के सदस्यों के बीच की ऎसी चर्चाएँ साझा करते हुए उसकी सब मित्र और वह स्वयं खूब दाँत फाड़तीं |
यानि पढ़ने का मतलब अच्छे घर का कमाऊ लड़का और प्रतिष्ठित, पैसे वाला परिवार तो पक्का ! ये बातें पहले तो समझ नहीं आती थीं कि सच ही लक्ष्मी के बिना साँस लेनी कठिन ही नहीं, असंभव है |खाओ तो लक्ष्मी, पीओ तो लक्ष्मी, कपड़ा लक्ष्मी, रहना लक्ष्मी ---यानि मौज-मस्ती सब ही तो लक्ष्मी जी के बल पर ! लेकिन रोज़ाना की साँसें भी तो बिना उनके --फिज़ूल !जीवन के एक-एक पल का प्राण लक्ष्मी जी के सहारे ही तो टिका रहता है |
आहिस्ता-आहिस्ता दिमाग़ में कहीं बैठने लगा, सच ही तो है लक्ष्मी जी के बिना सूना सब संसार !---सहेलियों के घरों में होने वाली चर्चाएँ इतनी बेमानी भी नहीं थीं |जितना और जैसा उन परिवारों के लोगों का मानसिक स्तर, वैसे ही विचार !स्वाभाविक था चर्चाएँ भी वैसी ही होनी थीं |
अपना मध्यमवर्गीय परिवार होते हुए भी उसे कभी किसी संगीन परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा था लेकिन उसकी एक सखी को कॉलेज की फ़ीस भरने में दिक्क़त होती देखकर उसका मन बुझ सा गया था | उसने मन में सोचा कि भैया, माँ लक्ष्मी के बिना जीवन में साँस लेना कठिन ही नहीं, असंभव है और जैसे वह पहले लोगों को कहते हुए सुनती थी, 'लक्ष्मी हाथ का मैल है जी' उसे यह बात ग़लत लगने लगी थी |
यह घटना उसकी बहुत क़रीबी सहेली के साथ हुई थी | बहुत साधारण परिवार की थी संतोष ! बी.ए में ही पढ़ रही थी उसके साथ कि उसका रिश्ता शहर के एक नामी डॉक्टर के घर से आ गया |
थोड़ी सशंकित थी वह !
"क्या करूँ, समझ में नहीं आ रहा ---"उसने आना को उस लड़के का पत्र दिखाया जिसमें उसने संतोष से स्पष्ट रूप से पूछा था कि क्या वह उस रिश्ते के लिए राज़ी है ? यदि नहीं तो मना कर सकती है |
बात कुछ ऎसी थी कि लड़के का एक पाँव कुछ खराब था, वह एक छड़ी के सहारे चलता था जिसकी मूठ सोने की थी और उस पर सुंदर नक़्क़ाशी की गई थी, बेशक यह उन दिनों की बात है जब सोना डेढ़ सौ रूपये तोला था लेकिन 'सोने की मूठ वाली छड़ी!' लोगों की जेब में पैसे भी तो गिने-चुने होते थे उन दिनों ! उसकी अम्मा को सेकेंडरी स्कूल में डेढ़सौ रुपए मिला करते थे और पाँच सौ शायद पापा को ‘मिनिस्टरी ऑफ़ कॉमर्स में’ ! इतने रुपयों में परिवार की सारी ज़रूरतों को, लेन –देन को पूरा कर लिया जाता था |हाँ, माह के आख़िर में थोड़ी कोर-कसर करनी पड़ती थी लेकिन वह तो आज इतने ज़्यादा पैसे मिलने के बाद भी करनी ही पड़ती है |
उसे अच्छी तरह याद है उनकी गृहकार्य सँभालने वाली विमला पचास पैसे किलो चीनी खरीदकर लाती थी | शुद्ध घी वास्तव में शुद्ध ही होता था और छ्न्नूमल घी वाले से रुपए या शायद डेढ़ रुपए में किलो के हिसाब से लाया जाता था | विमला नाम की यह सेविका पूरे दिन घर में ही रहती थी जो सारा काम करती थी, गरम-गरम रोटियाँ खिलाती थी | सुबह सात बजे आकर रात को दस बजे अपने घर जाती थी जो पास ही था |बीच में ज़रूरत पड़ने पर वह अपने घर चक्कर काट लेती | जहाँ तक उसे याद है, उसे शायद बीस या पच्चीस रुपए दिए जाते थे पूरे दिन घर का काम करने के | लोगों के घर में पूरे दिन काम करने वाले लोग कम ही घरों में देखने को मिलते थे उन दिनों | अनामिका के माता-पिता का घर उन ‘कम’ घरों की सरहद में इज्ज़त पाता था | ख़ैर, यहाँ उसकी मित्र संतोष की बात हो रही थी |
संतोष के विवाह के लिए इतने बड़े घर से रिश्ता आना, सोने की मूंठ की छड़ी हाथ में लेकर चलने वाले लड़के से उसकी साँठ -गाँठ कैसे बैठेगी ?यह प्रश्न विकट था |उस लड़के का हवाई-जहाज़ के कुछ विशिष्ट कलपुर्ज़े बनाने का व्यापार बहुत बड़े स्तर पर सफ़लतापूर्वक ऊँचाइयाँ छू रहा था | शहर में उसके परिवार को बहुत ऊँची दृष्टि से देखा जाता |शहर के सुप्रतिष्ठित डॉक्टर का लड़का शिक्षित भी ख़ासा था और नई कॉलोनी में एक बड़ी सी कोठी में उनका परिवार रहता था जिसके बाहर दरबान खड़ा रहता, वहीं उसके लिए एक केबिन भी बनाई गई थी जिसमें पँखा भी लगा हुआ था|उन दिनों में ये सब चोंचले या तो धन्ना-सेठों के होते या फिर राजाओं के जिनकी ज़मींदारियाँ अब तक ख़त्म हो चुकी थीं लेकिन उनके नाज़-नख़रे वैसे ही थे | उस कोठी के पिछवाड़े कई 'सर्वेंट-क्वार्टर्स' भी दिखाई देते थे |
अपने परिवार में एक संतोष ही थी जिसमें खूबसूरती के साथ सभ्यता भी थी और वास्तव में शिक्षा के प्रति एक सम्मान का भाव था जबकि उसके अन्य भाई-बहन उससे बिलकुल विपरीत थे | पिता पंडिताई करते, डेढ़ पसली की माँ अपने आधा दर्जन बच्चों की चिल्ल-पौं में थकी-टूटी सी साँसें लेती रहतीं |वे हर समय गृहस्थी के पसीने में डूबी रहतीं और चूल्हे के आगे बैठी अपने सूती मलगजे पल्लू में आँखें, नाक से निकलते पानी पोंछती नज़र आतीं |घर में ज़ोर-ज़ोर से किचर-पिचर मची रहती | एक संतोष के अलावा कोई भाई-बहन माँ को सहायता करता दिखाई नहीं देता था |
यजमानों के यहाँ संस्कृत के श्लोकों से पूजा-पाठ कराने वाले पंडित जी पत्नी को माँ--बहन की गालियों से नवाज़े बिना बात ही नहीं कर सकते थे | अनामिका ने संतोष की माँ को अक़्सर रोते और नाक-मुख पर आँसुओं से भीना पल्लू लपेटे देखा था |
पिता के यजमान के ऊँचे परिवार से रिश्ता आना, कुछ असहज कर गया था संतोष को !
"बिना किसी संकोच के शादी के लिए हाँ कर दे ---" आना ने उसे सलाह दी |
"लेकिन यार ----" दूसरी सहेलियों को उसकी यह बात कुछ जँची नहीं थी |
"पैर से ही तो अपंग है, दिमाग़ से तो नहीं --? भई, तेरी मर्ज़ी ! मैं होती तो कर लेती |अपने घर के ज़हालत भरे वातावरण से दूर होकर कुछ बेहतर ज़िंदगी ही जी लेगी | "
संतोष के दिमाग़ में आना की बात फ़िट हो गई और उसने विवाह के लिए स्वीकृति दे दी|
संतोष बहुत समझदार, बुद्धिशाली व विवेकी थी | उसकी शादी खूब धूमधाम से सम्पन्न हुई, उसकी पढ़ाई में भी कोई व्यवधान नहीं पड़ा | वह कॉलेज आती रही और अपनी करीबी मित्र अनामिका से अपने ससुराल के अनुभव साझा करती रही |
“आना ! आज तो हमने गज़ब ही कर दिया –“एक दिन खाली पीरियड में दोनों कॉलेज के लॉन में बैठी गप्पें मार रही थीं | अनामिका संतोष के लिए बड़ी खुश थी क्योंकि संतोष बहुत खुश व संतुष्ट थी | वह अपने आपको बड़ा तीसमारखाँ भी समझने लगी थी | संतोष के बेहतर जीवन का माध्यम वही बनी थी न ! संतोष बेचारी तो कितनी घबराई हुई थी |
“क्या हो गया ?सब ठीक तो है न ?”उसने चिंतित होकर संतोष से पूछा |
“तुम जानती हो न हमारी कोठी के पीछे गौशाला है---?”
“तो ?गौशाला में तुम्हारा बिस्तर तो नहीं लगवा दिया गया ?” आना ! यानि शैतानियत का पिटारा !
“तुम भी आना ---लो मैं नहीं बताती –“संतोष उससे रूठ गई |
“अरे ! बोल न यार ! आदत पड़ गई है क्या रूठने की --?”अनामिका ठठाकर हँसी |
“सुनो तो, मैंने क्या कबाड़ा किया---“संतोष को जब उससे कोई बिलकुल अंदर की बात करनी होती, वह उसको कहीं अकेले में चलने का आग्रह करती थी |
“बोलो तो ---“
“पहले दाँत फाड़ना बंद करो –“
“ठीक है, अब बताओ ---“ अनामिका ने अपने फटे हुए मुख पर चुप्पी की पट्टी चिपकाने का प्रयत्न किया |
“अभी हम कॉलेज आ रहे थे न ---हम रसोईघर में माता जी के पास कहने गए कि हम कॉलेज जा रहे हैं |माता जी महाराजिन मौसी के साथ खाने की तैयारी में थीं | बोलीं;
“कोई दिखाई ही नहीं दे रहा, बहुरानी ये रात की सब्ज़ी बची हुई है, इसे ज़रा तुम ही पीछे गौशाला की नांद में डाल आओ|”
(उस ज़माने में चीनी मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तनों के सैट आते थे जिनमें दही जमाई जाती या बची हुई सब्जियाँ, चटनी आदि रखी जाती थीं |इन चीनी मिट्टी के बर्तनों को कुंडी कहा जाता था |)
“हमने कुंडी ले ली और डालकर आ गए |”
“बेटा ! खाली कुंडी कहाँ है ?”माता जी ने हमसे पूछा |
“आपने कहा था, हम तो फेंक आए –“
माता जी बड़ी ज़ोर से हँसीं, उन्होंने बताया कि सब्ज़ी फेंकने को कहा था, कुंडी नहीं|
हमें लगा, बड़ा घर है, इसमें बर्तन भी फेंक देते होंगे |
“फिर उन्होंने वो बात भी याद दिला दी जब हमने दूध में एक बाल देखकर पाँच किलो दूध का भगौना नाली में बहा दिया था |”
अनामिका फिर से खी-खी करके हँसने लगी –
“यार संतोष ! अपनी बुद्धि भी तो चला लिया कर –“
“सच्ची ! हम इतने बड़े उल्लू हैं |” वह सच में उदास थी |
“हमें लगा।बड़े घरों में ऐसा ही होता होगा !”
“अब अपनी बुद्धि चलाना शुरू कर, नहीं तो तेरी सास तुझे ही किसी दिन गौशाला की भूसे की नांद में फिकवा देंगी –“अनामिका की हँसी रुक ही नहीं रही थी | सामने से और लड़कियों का झुंड आ रहा था, संतोष का बेचारा सा चेहरा देखकर उसने अपनी हँसी बड़ी मुश्किल से रोकी और उसके सिर पर एक टपली दे मारी |
संतोष का तो यह हाल था और उसकी दूसरी बहनें बिलकुल अनामिका की पड़ौसन गीता सिंह और उनकी तथाकथित सखियों जैसा व्यवहार करती थीं | एक ही माँ के उदर से जन्म लेने वाले बच्चों में कितना अंतर होता है ! आना को बड़ा आश्चर्य होता, पर ऐसा होता है तो होता है |