The Morgue - Part 1 in Hindi Horror Stories by fiza saifi books and stories PDF | The Morgue - Part 1

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The Morgue - Part 1

रात के ठीक 2:13 बजे थे।
शहर के पुराने सरकारी अस्पताल का पिछला हिस्सा — जहाँ शायद ही कोई जाता हो — अँधेरे में डूबा हुआ था।

वहीं था… मॉर्ग।

दीवारों पर जमी सीलन, टिमटिमाती हुई पीली लाइट, और हवा में एक अजीब-सी ठंडक। जैसे किसी ने कमरे से सारी गर्मी चुरा ली हो।

रवि, नया वार्ड बॉय, अपनी पहली नाइट ड्यूटी पर था।
उसे चेतावनी दी गई थी —
“रात में अगर मॉर्ग से आवाज़ आए… तो मत जाना।”

वह हँस दिया था।

लेकिन अब…
वो हँसी गले में अटक चुकी थी।


पहली आवाज़
ठक… ठक… ठक…

मॉर्ग के अंदर से किसी धातु के दरवाज़े के हिलने की आवाज़ आई।

रवि ने खुद को समझाया —
“शायद बिल्ली होगी…”

लेकिन अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर बने मॉर्ग में बिल्ली कैसे पहुँच सकती थी?

उसने काँपते हाथों से चाबी निकाली।
दरवाज़ा खोला।

अंदर 12 स्टील के फ्रीजर बॉक्स थे।
हर एक पर एक नंबर।

सब कुछ सामान्य दिख रहा था।

लेकिन…
बॉक्स नंबर 7 थोड़ा खुला हुआ था।

रवि की सांस रुक गई।

रजिस्टर के अनुसार बॉक्स 7 में एक बुज़ुर्ग आदमी की लाश रखी गई थी — जिसकी मृत्यु हार्ट अटैक से हुई थी।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा…
ढक्कन उठाया…

अंदर लाश नहीं थी।



रवि पीछे मुड़ा ही था कि उसकी गर्दन के पीछे किसी ने बर्फ जैसे ठंडे हाथ रख दिए।

उसका शरीर जड़ हो गया।

धीरे-धीरे उसने पीछे देखा…

वही बुज़ुर्ग आदमी…
सफेद आँखें…
नीले पड़े होंठ…
और चेहरा… जैसे मौत के बाद भी गुस्से से भरा हो।

उसके होंठ हिले—

“मुझे… यहाँ… किसने… बंद किया…?”

रवि चिल्लाना चाहता था… पर आवाज़ नहीं निकली।

अचानक सारी लाइटें बुझ गईं।


अँधेरे में हलचल
पूरा मॉर्ग अब अंधकार में डूब चुका था।

फिर… एक साथ…

ठक… ठक… ठक… ठक…

सभी फ्रीजर बॉक्स अंदर से हिलने लगे।

जैसे हर लाश… जाग चुकी हो।

लोहे के दरवाज़ों के अंदर से नाखून घिसने की आवाज़ें आने लगीं।

“हमें बाहर निकालो…”

“हमें ठंड लग रही है…”

“हम अभी जिंदा हैं…”

रवि ज़मीन पर गिर पड़ा।

उसे महसूस हुआ —
दर्जनों हाथ उसकी टांगों को पकड़ रहे हैं।

सड़े हुए, ठंडे, खुरदरे हाथ।



अगली सुबह।

अस्पताल स्टाफ ने मॉर्ग का दरवाज़ा खुला पाया।

अंदर सब कुछ सामान्य था।

सभी 12 बॉक्स बंद थे।

लेकिन बॉक्स नंबर 7 के अंदर एक नई लाश थी।

रवि।

उसकी आँखें पूरी तरह खुली हुई थीं।
चेहरे पर डर ऐसा जैसे उसने मौत को नहीं…
मौत से भी बदतर कुछ देखा हो।

और उसके नाखूनों में फंसा था —
पुरानी जंग लगी धातु का टुकड़ा।

जैसे उसने अंदर से बाहर निकलने की कोशिश की हो।


उस दिन के बाद अस्पताल में एक नया नियम बना —

रात 2:13 बजे के बाद मॉर्ग के पास मत जाना।

क्योंकि कहते हैं…
अब वहाँ 13 बॉक्स हैं।

और कभी-कभी…
बॉक्स नंबर 7 के अंदर से आवाज़ आती है—

“मुझे… बाहर… निकालो…”

अस्पताल ने आधिकारिक रिकॉर्ड में लिख दिया —
“रवि की मृत्यु हार्ट फेलियर से हुई।”

लेकिन सच…
सच फ्रीजर बॉक्स नंबर 7 के अंदर बंद था।

तीन हफ्ते बाद।

नई नाइट ड्यूटी पर आया — अजय।

उसे भी वही चेतावनी दी गई —
“2:13 के बाद मॉर्ग के पास मत जाना।”

अजय ने भी हँसकर टाल दिया।

लेकिन 2:12 पर ही अस्पताल की घड़ी रुक गई।

सुइयाँ वहीं अटक गईं।

और पूरे कॉरिडोर में तापमान अचानक गिर गया।