“Poles standing in the fields in Hindi Moral Stories by ARTI MEENA books and stories PDF | खेतों में खड़े खंभे

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खेतों में खड़े खंभे


आज काफी दिनों बाद मैं अपने गाँव जा रही थी।
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मन में कई पुरानी यादें घूम रही थीं — बचपन, खेत, मिट्टी की खुशबू, और वो लोग जिनके बीच हम बड़े होते हैं।
मेरा गाँव राजस्थान के दौसा जिले में है। यहाँ मीणा समाज की अच्छी-खासी आबादी है। इसलिए अक्सर विधायक हो या सांसद, अधिकतर इसी समाज से होते हैं।
इससे यह लगता है कि शायद यहाँ दूसरे इलाकों के मुकाबले भेदभाव थोड़ा कम होगा।
लेकिन मैं पूरी तरह यह भी नहीं कह सकती कि समाज से ऊँच-नीच या छुआछूत पूरी तरह खत्म हो गई है।
क्योंकि सच यही है —
चाहे मेरी जाति हो या कोई दूसरी जाति,
कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में,
आज भी यह सोच दिख ही जाती है।
समय जरूर बदला है, लोग पढ़े-लिखे हैं, सोच भी बदली है —
लेकिन कुछ चीजें अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
जैसे बाकी गाँव होते हैं, वैसे ही मेरा गाँव भी है। सड़कें अच्छी हैं। बिजली भी लगभग 24 घंटे रहती है, बस बारिश के समय थोड़ी परेशानी हो जाती है। अब पानी नलों से आने लगा है, क्योंकि पहले के मुकाबले पानी की कमी बढ़ गई है।
जब मैं स्टेशन से गाँव की तरफ आ रही थी, तो रास्ते में हरे-भरे पेड़ और कहीं-कहीं लहराती फसलें मुझे अपनी ओर खींच रही थीं। मुझे हरियाली हमेशा से बहुत पसंद रही है।
लेकिन उसी रास्ते में मुझे बजरी माफियाओं की खदानें भी दिखीं।
जहाँ कुछ साल पहले तक फसलें लहराती थीं, आज वहाँ जमीन को खोखला किया जा रहा था।
उन्हें देखकर मन में एक सवाल उठा —
अगर लोगों की सोच थोड़ी प्रकृति के लिए भी होती, तो क्या आज पानी की इतनी कमी होती?
खेतों से बजरी निकालना कानूनन अपराध है — ये शायद उन्हें भी पता है, और पुलिस को भी।
लेकिन आज का समय ऐसा है कि कई बार सच और गलत के बीच पैसा खड़ा हो जाता है।
यह सोचकर मन थोड़ा भारी हो गया।
लेकिन जैसे-जैसे घर पास आने लगा, मन हल्का होने लगा।
घर पहुँचते ही हमारा कुत्ता “भूरा” मेरे पास दौड़ता हुआ आया और मुझे चाटने लगा — जैसे कह रहा हो, “तू घर की ही सदस्य है।”
उस पल मुझे लगा — दुनिया चाहे कितनी बदल जाए, कुछ अपनापन कभी नहीं बदलता।
घर के चारों तरफ पेड़ थे, ठंडी हवा चल रही थी। रास्ते की सारी थकान जैसे गायब हो गई।
गाँव की जिंदगी में वापस ढलना पड़ता है —
सुबह गाय-भैंसों के पास बैठना,
खेतों में घूमना,
नीम की दातून से दाँत साफ करना —
तभी लगता है कि आप सच में गाँव आए हो।
गाँव के लोगों की बात ही अलग होती है।
कई दिनों बाद मिलो तो हर कोई पूछता है — “कब आई? कैसी है?”
यही गाँव की असली खूबसूरती है।
बारिश के दिन आने वाले थे, इसलिए हम सब भाई-बहन खेतों की सफाई कर रहे थे।
तभी अचानक झगड़े की आवाज आई।
हमने अपने खेत की दीवार से झाँककर देखा —
हमारी ही काकी और हमारे ही परिवार के चाचा आपस में झगड़ रहे थे।
गाँव की लड़ाइयों में कई बार ऐसे शब्द बोले जाते हैं जिन्हें सुनना भी मुश्किल होता है — चाहे वो पुरुष हों या महिलाएँ।
उस पल लगा — महिला सम्मान और बराबरी की बातें गुस्से के सामने कितनी छोटी पड़ जाती हैं।
मैं सोचने लगी —
क्या ये दोनों भाई बचपन में भी ऐसे लड़ते होंगे?
क्या उन्होंने कभी सोचा होगा कि जिस खेत में साथ काम किया, साथ खेले, आज उसी खेत के लिए उनके परिवार ऐसे लड़ रहे हैं?
मुझे जिजी की बात याद आई —
पहले खेतों के बीच इतनी जगह होती थी कि ट्रैक्टर आराम से निकल जाए।
आज हालत यह है कि एक पैर रखने की जगह भी नहीं बची।
क्या मुट्ठी भर जमीन इतनी जरूरी हो गई है
कि रिश्तों को भी शर्मिंदा होना पड़े?
झगड़ा बढ़ता गया।
काकी के बेटे, बहुएँ, बाबा — सब आ गए।
कोई रोक नहीं रहा था, बस सब अपनी-अपनी तरफ खड़े थे।
मैंने सोचा — शायद पढ़ी-लिखी बहू कुछ शांति की बात करेगी।
लेकिन वहाँ शिक्षा भी खामोश खड़ी थी।
बहुत समझाने के बाद सब शांत हुए।
लेकिन जाते-जाते काकी ने कहा —
"मैं अपने खेत के चारों तरफ खंभे गाड़ दूँगी। फिर देखती हूँ कौन मेरी जमीन में आता है।"
अगले दिन सच में खेतों के चारों तरफ खंभे खड़े कर दिए गए।
मैं काफी देर तक दूर खड़ी उन्हें देखती रही।
हवा चल रही थी… खेत वैसे ही थे… आसमान वैसा ही था…
बस अब उनके बीच खंभे खड़े थे।
मुझे लग रहा था जैसे खेत नहीं बँटे…
जैसे यादें बँट गई हों…
जैसे बचपन बँट गया हो…
जैसे रिश्तों के बीच कोई दीवार खड़ी हो गई हो।
मुझे वो दिन याद आए —
जब शायद यही लोग एक ही थाली में खाते होंगे…
एक ही खेत में साथ काम करते होंगे…
एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते होंगे…
आज वही लोग
एक-दूसरे से नज़र तक मिलाने से बच रहे थे।
मैंने मिट्टी को हाथ में उठाया…
वो मिट्टी वही थी —
जिसने उन्हें बचपन में खेलते देखा होगा…
जिसने उनकी माँओं के आँसू भी देखे होंगे…
और उनकी हँसी भी।
पर आज…
शायद वो मिट्टी भी चुप थी।
उस पल मन में एक बात बहुत जोर से आई —
इंसान जमीन का मालिक बनने की कोशिश करता है…
लेकिन सच तो ये है…
आखिर में जमीन ही इंसान को अपने अंदर समा लेती है।
फिर हम क्यों…
मुट्ठी भर जमीन के लिए
पूरी जिंदगी के रिश्ते खो देते हैं?
मैंने आखिरी बार उन खंभों को देखा —
और मन ही मन लगा —
काश…
कभी कोई इन खंभों को हटाकर
फिर से बीच में रास्ता बना दे…
जहाँ से लोग
एक-दूसरे तक वापस पहुँच सकें।
क्योंकि सच यही है —
खेतों में खड़े खंभे
सिर्फ जमीन नहीं बाँटते…
वो धीरे-धीरे
इंसानों को भी बाँट देते हैं।
और शायद सबसे बड़ा सच यही है —
जब तक हमें रिश्तों की कीमत समझ आती है,
तब तक अक्सर…
बहुत देर हो चुकी होती है।