कुछ कहानियाँ अचानक शुरू नहीं होतीं।
वे धीरे-धीरे बनती हैं—दिनों के साथ, आदतों के साथ, और उन छोटी-छोटी बातों के साथ जिन पर कोई ध्यान नहीं देता। सुबह घर से निकलना, शाम को लौटना, रास्ते में दिखते चेहरे, और रात में छत को देखते हुए कटता वक़्त। बाहर से सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा होना चाहिए, लेकिन भीतर कुछ खिसकता रहता है। आदमी बदल नहीं रहा होता, बस थोड़ा-थोड़ा सरक रहा होता है—अपनी ही जगह से।
हम सब किसी न किसी जगह से आते हैं। किसी गली से, किसी घर से, किसी आवाज़ों से भरे माहौल से। और वही जगह, वही आवाज़ें, धीरे-धीरे हमारे भीतर उतर जाती हैं। बिना बताए तय करने लगती हैं कि हम कैसे सोचेंगे, कैसे चुप रहेंगे, और किस बात पर टूट जाएँगे। बाहर से सब कुछ सामान्य लगता है—दिन निकलता है, शाम ढलती है, लोग आते-जाते रहते हैं। लेकिन भीतर कुछ चलता रहता है, लगातार, बिना रुके।
यह कहानी भी उसी भीतर की है।
किसी बड़े एलान की नहीं, किसी अचानक मोड़ की नहीं।
बस एक ज़िंदगी की, जो रोज़ जी जाती है—और उसी रोज़मर्रा में कहीं दबकर रह जाती है।
यह कहानी उस लड़के की है, जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसके भीतर कुछ खास चल रहा होगा। जो भीड़ में दिख जाए तो नज़र ठहरती नहीं। जो हँसता है तो लगता है ठीक है, और चुप रहे तो भी कोई सवाल नहीं उठता। लेकिन कुछ लोग ऐसे ही होते हैं—बाहर से आसान, भीतर से भारी।ऐसा ही एक लड़का था—आरव।
वो ऐसा नहीं था जिसे देखकर लोग पलटकर दोबारा देखें, और ऐसा भी नहीं कि नज़र पड़ते ही नज़र हट जाए। उसकी मौजूदगी बीच में अटक जाती थी। कद ठीक-ठाक, शरीर में न ज़्यादा दुबलापन, न कोई दिखावटी ताक़त। चेहरा साधारण नहीं था, लेकिन चमकदार भी नहीं। आँखों में कुछ ऐसा था जो बोलता नहीं था, बस ठहर जाता था। जैसे वो सामने वाले को देख रहा हो, पर अपने भीतर कहीं और खड़ा हो।
वो चलता था तो ज़मीन को घिसता हुआ नहीं, और न ही सीना निकालकर। उसके कदमों में एक आदत थी—आसपास को नापने की। किस गली में कौन खड़ा रहता है, कौन-सी आवाज़ किस घर से आती है, किस मोड़ पर रुकना बेहतर है और किस पर तेज़ चलना। ये सब उसने सीखा नहीं था, ये सब उसके भीतर बैठ गया था।
आरव जिस इलाके में रहता था, वो शहर के नक़्शे में बस एक नाम था, लेकिन लोगों की ज़ुबान पर एक चेतावनी। वहाँ शराब सिर्फ़ दुकानों में नहीं मिलती थी, वहाँ नशा साँसों में घुला रहता था। सुबह से गालियाँ, दोपहर में सौदेबाज़ी, और शाम होते-होते झगड़ों की तैयारी। पतली गलियाँ थीं, इतनी कि दो लोग आमने-सामने आ जाएँ तो किसी एक को दीवार से सटकर निकलना पड़ता। उन्हीं दीवारों पर लिखी गालियाँ थीं, अधूरे नाम थे।
यहाँ लोग जल्दी बड़े हो जाते थे। खेलते-खेलते आवाज़ सख़्त हो जाती थी, और हँसते-हँसते हाथ उठाना आ जाता था। किसी को थप्पड़ लग जाए तो रोने से पहले ये देखना पड़ता था कि मारा किसने है। इस इलाके में कमज़ोर होना कोई भावनात्मक स्थिति नहीं थी, एक गलती थी।
आरव उसी गलती से बचता हुआ बड़ा हुआ था।
उसका घर दो कमरों का था। बाहर लोहे का गेट, जो ठीक से बंद कभी होता ही नहीं था। जैसे घर को भी पता हो कि यहाँ कोई चीज़ पूरी नहीं रहती। भीतर एक छोटा-सा आँगन, जहाँ उसकी माँ रोज़ कपड़े सुखाती थी। माँ कम बोलती थी, लेकिन उसकी चुप्पी में थकान साफ़ दिखती थी। वो सवाल नहीं पूछती थी, जवाब देने से पहले ही समझ जाती थी। उसके हाथ हमेशा काम में रहते थे, जैसे रुक गई तो कुछ टूट जाएगा।
पिता ज़्यादातर बाहर रहते थे। काम के सिलसिले में। जब घर होते भी, तो उनके चेहरे पर दिन भर की धूप और ज़िम्मेदारियों का बोझ जमा रहता था। उनसे डर नहीं लगता था, लेकिन उनके सामने बोलते वक़्त शब्द हल्के पड़ जाते थे।
घर में सबसे भारी मौजूदगी उसके बड़े भाई की थी।
आरव का भाई उससे उम्र में काफ़ी बड़ा था, और शायद इसी वजह से उसका ग़ुस्सा भी ज़्यादा पक्का और सख़्त था।
वो वही था, जिसे मोहल्ला नाम से जानता था। तेज़ आवाज़, जल्दी गुस्सा, और झगड़े से पीछे न हटने वाला। लोग कहते थे—इस घर का बड़ा लड़का हाथ से निकल चुका है। और ये बात कहते हुए उनकी नज़र अपने आप आरव पर टिक जाती थी, जैसे वो अगले अध्याय की तैयारी कर रहे हों।
आरव ने ये सब देखा था। बहुत क़रीब से। भाई के गुस्से को, माँ की चुप्पी को, पिता की मजबूरी को, और मोहल्ले की नज़रों को। शायद इसी वजह से वो शुरू से ही बोलने से पहले रुक जाता था। वो हर बात को पकड़ता नहीं था, पर हर बात को छोड़ता भी नहीं था। वो सुनता ज़्यादा था, और बोलता कम।
जहाँ बाकी लड़के शराब की दुकानों के बाहर खड़े होकर दुनिया को गालियाँ देते थे, आरव वहाँ से निकल जाता था। डर की वजह से नहीं—समझ की वजह से। उसे पता था कि एक बार उस शोर का हिस्सा बन गए, तो बाहर आने के लिए आवाज़ नहीं, वक़्त चाहिए होता है। और वक़्त वहाँ किसी के पास नहीं था।
वो अपने इलाके की सच्चाई जानता था। ये भी कि लोग उससे क्या उम्मीद करते हैं, और ये भी कि वो उन उम्मीदों को पूरा नहीं करना चाहता। उसने खुद को बाँध रखा था—न किसी कसम से, न किसी डर से—बस इस ख़याल से कि एक ग़लत कदम सब कुछ वैसा बना देगा जैसा वो नहीं बनना चाहता।
उसे ये नहीं पता था कि यही रुकना, यही दबाव, एक दिन उसके भीतर जमा होकर फूटेगा। और जब फूटेगा, तो वो सिर्फ़ अपने इलाके का लड़का नहीं रहेगा।
वो अपनी ही कहानी का सबसे मुश्किल हिस्सा बन जाएगा।
आरव जिस स्कूल में पढ़ता था, वो भी उसी इलाके का हिस्सा था—वही तंग गलियाँ, वही शोर, वही आदतें। स्कूल की इमारत बड़ी नहीं थी, न ही वहाँ कोई ख़ास पहचान बनाने की कोशिश होती थी। आठवीं तक की पढ़ाई वहीं खत्म हो जाती थी, जैसे उस जगह को पहले से पता हो कि उसके बच्चों को आगे बहुत दूर नहीं जाना है। लेकिन आरव अब वो आख़िरी क्लास पास कर चुका था। और उसके साथ ही एक बात तय हो चुकी थी—अब उसे वहाँ से बाहर जाना होगा। आगे की पढ़ाई के लिए नया स्कूल ज़रूरी था, और वो स्कूल उसके इलाके का नहीं होगा।
आरव ज़्यादा बाहर जाने वाला लड़का नहीं था। अपने मोहल्ले से आगे उसकी दुनिया बहुत सीमित थी। उसने शहर को कभी पूरे रूप में देखा ही नहीं था। बड़े बाज़ार की भीड़, जहाँ लोग ऐसे चलते थे जैसे उन्हें कहीं रुकना ही नहीं। रेलवे स्टेशन, जहाँ प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े लोग किसी और ज़िंदगी की तरफ़ जाते दिखते थे। बस स्टैंड, जहाँ हर बस किसी अलग दिशा में निकल जाती थी। और कुछ रिश्तेदारों के घर—बस उतना ही उसका शहर था। उसके लिए शहर कोई नक़्शा नहीं था, बल्कि कुछ गिने-चुने रास्तों और जगहों का जोड़ था, जिनसे वो परिचित था और जिनसे बाहर जाने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई थी।
अब बात सिर्फ़ नए स्कूल की नहीं थी, बात उस रास्ते की थी जो उसे हर रोज़ तय करना पड़ता। उस रास्ते की, जो उसे उसके जाने-पहचाने शोर से थोड़ा दूर ले जाता, और ऐसी जगहों से गुज़ारता जहाँ लोग उसके इलाके की तरह नहीं दिखते थे, न वैसे बोलते थे, न वैसे देखते थे। ये सोचकर ही उसके भीतर एक अजीब-सी घबराहट उठती थी—ऐसी घबराहट, जिसे वो किसी से कह नहीं पाता था, क्योंकि उसे खुद नहीं पता था कि वो किस बात से डर रहा है। रास्ते से, लोगों से, या इस बात से कि अब वो वही नहीं रहेगा जो अब तक रहा है।
घर में इस बदलाव पर ज़्यादा बातें नहीं हुईं। पिता ने बस इतना कहा कि पढ़ाई ज़रूरी है, और जो ज़रूरी है, वो करना ही पड़ता है। माँ ने चुपचाप उसके कपड़ों और किताबों की चिंता शुरू कर दी, जैसे हर नई चीज़ में वो उसे थोड़ा सुरक्षित कर देना चाहती हो। बड़े भाई के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी—उसने हँसकर कहा कि शहर देखने को मिलेगा, और बात वहीं खत्म हो गई। लेकिन आरव के भीतर, ये बात खत्म नहीं हुई। उसके लिए नया स्कूल एक इमारत नहीं था, बल्कि एक दरवाज़ा था, जिसके उस पार की दुनिया को वो देख तो सकता था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था।
उस रात, वो देर तक सो नहीं पाया। छत के ऊपर टीन पर पड़ती हवा की आवाज़ सुनते हुए वो सोचता रहा कि रोज़ का रास्ता कैसा होगा, क्लास में लोग कैसे होंगे, और क्या वो वहाँ भी वैसे ही चुप रह पाएगा जैसे अब तक रहा है। उसे नहीं पता था कि शहर उससे क्या लेगा, या क्या देगा। बस इतना पता था कि अगली सुबह से उसकी दुनिया थोड़ी और बड़ी होने वाली थी—और वो खुद इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं था।