The horrors of digital games in Hindi Magazine by Vivek Ranjan Shrivastava books and stories PDF | डिजिटल गेम्स के भयावह रूप

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डिजिटल गेम्स के भयावह रूप

डिजिटल डेथ ट्रैप: मासूमों की जान और गेम संचालकों का कुत्सित 
व्यापार

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव

आज के दौर में स्मार्टफोन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक ऐसा प्रवेश द्वार बन चुका है जिसके दूसरी ओर अंधेरी गलियां भी हैं। गाजियाबाद में फरवरी 2026 की वह हृदयविदारक घटना, जिसमें तीन सगी बहनों ने कथित तौर पर एक कोरियन टास्क-बेस्ड गेम के प्रभाव में आकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, इस खतरे की भयावहता का जीवंत प्रमाण है। 
इस तरह के डिजिटल मोबाइल खेल अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि एक सुसंगत वैश्विक 'डार्क इकोनॉमी' और मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं।
इन घातक खेलों की दुनिया को समझने के लिए इनके फैलाव और इनकी प्रकृति का विश्लेषण आवश्यक है। रूस से शुरू हुआ 'ब्लू व्हेल चैलेंज' इस श्रृंखला का सबसे कुख्यात नाम रहा है, जिसने मुख्य रूप से 'VKontakte' और इंस्टाग्राम जैसे सोशल प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेकर किशोरों को 50 दिनों के आत्मघाती जाल में फंसाया जाता था। इसके बाद व्हाट्सएप और यूट्यूब के माध्यम से जापान और मेक्सिको की जड़ों से निकले 'मोमो चैलेंज' ने दस्तक दी, जो डरावनी कॉल्स और ब्लैकमेलिंग के जरिए बच्चों को मानसिक आघात पहुँचाता रहा। वर्तमान में, के-पॉप संस्कृति की लोकप्रियता का फायदा उठाकर कुछ अज्ञात स्रोतों से 'कोरियन लव या टास्क गेम्स' संचालित हो रहे हैं, जो चैटबॉट्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जरिए बच्चों से भावनात्मक जुड़ाव बनाकर उन्हें अंतिम आत्मघाती कदम उठाने के लिए उकसाते हैं। सिंगापुर और चीन जैसे देशों से संचालित होने वाले 'फ्री फायर' जैसे आधिकारिक बैटल गेम्स भी अपनी अत्यधिक लत और वित्तीय नुकसान के कारण बच्चों में अवसाद और आत्महत्या का कारण बन रहे हैं।
इन खेलों के पीछे का आर्थिक ढांचा अत्यंत भयावह है। 

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि किसी बच्चे की जान लेने से किसी को क्या आर्थिक लाभ हो सकता है, लेकिन इसका उत्तर 'डार्क वेब' की काली दुनिया में छिपा है। गेम के संचालक, जिन्हें अक्सर 'क्यूरेटर' कहा जाता है, शुरुआती टास्क के दौरान ही बच्चों से उनकी निजी तस्वीरें, वीडियो और परिवार की बैंकिंग जानकारी हासिल कर लेते हैं। अंत में, इसी डेटा का उपयोग फिरौती वसूलने या बच्चे को अंतिम टास्क (आत्महत्या) के लिए मजबूर करने के लिए किया जाता है ताकि वह अपनी गोपनीयता बचा सके। इससे भी वीभत्स पहलू डार्क वेब पर होने वाली सट्टेबाजी है, जहाँ दुनिया भर के विकृत मानसिकता वाले लोग इन टास्क्स के पूरा होने पर 'बिटकॉइन' जैसी क्रिप्टोकरेंसी में सट्टे के दांव लगाते हैं।

मनोवैज्ञानिक रूप से ये खेल बच्चे को पूरी तरह से दुनिया से काट देते हैं। संचालक बच्चे के मन में यह विश्वास भर देते हैं कि टास्क पूरा न करना कायरता है और मृत्यु ही उसे एक विशेष 'डिजिटल पहचान' दिलाएगी।

 अभिभावकों के लिए यह अनिवार्य है कि वे तकनीक के इस स्याह पक्ष को पहचानें। जब बच्चा अचानक एकांतप्रिय हो जाए, रात के समय जागने लगे या इंटरनेट के उपयोग को लेकर जरूरत से ज्यादा गोपनीयता बरतने लगे, तो इसे खतरे की घंटी समझना चाहिए।
तकनीक की प्रगति जब मानवता की बलि लेने लगे, तो उसे प्रगति नहीं, विनाश समझना चाहिए।

 माता-पिता की जागरूकता और बच्चों के साथ खुला संवाद ही वह एकमात्र 'फायरवॉल' है जिसे कोई भी डिजिटल शिकारी भेद नहीं सकता।
UNO तथा सरकारों को ऐसे गेम्स रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर समझौते करने के की आवश्यकता स्पष्ट है। 

विवेक रंजन श्रीवास्तव