भाग एक: वो पहली बारिश
मीरा को बारिश से नफ़रत थी। शायद इसलिए कि उसकी ज़िंदगी में जो भी बुरा हुआ, बारिश के दिन ही हुआ था। पापा का जाना, नौकरी का छूटना, और अब ये... एक टूटी छतरी लिए, भीगती हुई, दिल्ली के इस अनजाने इलाके में भटकना।
"ऑटो! भैया, रुकिए!" वो चिल्लाई, लेकिन पानी में छप्पर-छप्पर करती गाड़ी आगे निकल गई।
"आप ठीक हैं?" एक आवाज़ आई।
मीरा ने पलटकर देखा। एक लड़का, कुर्ता-जींस में, छाते के नीचे खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो परेशान करने वाला था—जैसे वो सब कुछ जानता हो, मीरा के दिल की हर बात।
"मुझे आपकी मदद नहीं चाहिए," मीरा ने रूखाई से कहा।
"मैंने पूछा नहीं कि चाहिए या नहीं। मैंने पूछा—आप ठीक हैं?" वो लड़का बोला, और अपना छाता उसके ऊपर कर दिया।
मीरा कुछ बोलती, उससे पहले ही उसने अपना फ़ोन निकाला। "मेरा ड्राइवर पाँच मिनट में यहाँ होगा। आप जहाँ जाना चाहें, छोड़ दूँगा।"
"मैं किसी अमीर लड़के की कार में नहीं बैठती," मीरा ने तल्ख़ी से कहा।
उसने हँसकर कहा, "अच्छा है। मैं अमीर नहीं हूँ। बस... ठीक-ठाक हूँ। नाम है अर्जुन। और आप?"
"मीरा," वो अनचाहे ही बोल गई।
भाग दो: कहानी का मोड़
तीन महीने बाद, मीरा को नहीं पता था कि उस बारिश वाले दिन से उसकी ज़िंदगी इतनी उलझ जाएगी। अर्जुन... वो हर जगह था। कॉफी शॉप में, उसी लाइब्रेरी में जहाँ मीरा पढ़ने जाती, और अब तो उसी कंपनी में जहाँ मीरा ने नई नौकरी शुरू की थी।
"ये संयोग नहीं हो सकता," मीरा ने एक दिन गुस्से में कहा।
"बिल्कुल नहीं," अर्जुन ने सच बोल दिया। "मैंने तुम्हें फॉलो किया। पर अच्छे इरादे से।"
"क्या?" मीरा के हाथ से कॉफी का कप छूटते-छूटते बचा।
अर्जुन गंभीर हो गया। "मीरा, तुम्हें सच बताता हूँ। मैं पिछले छह महीने से बीमार हूँ। डॉक्टरों ने कहा है कि मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं। पर तुमसे मिलने के बाद... मुझे लगा कि शायद मेरी ज़िंदगी में कुछ मायने हो सकते हैं।"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ झूठ नहीं था, बस एक गहरी उदासी थी।
"तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो," उसने धीरे से कहा, हालांकि उसके दिल को पता था कि नहीं।
"काश बोल रहा होता," अर्जुन ने कहा।
भाग तीन: जो कहा नहीं गया
अगले हफ़्ते अर्जुन अस्पताल में था। मीरा रोज़ जाती, पर अंदर नहीं जाती। बस बाहर बैठी रहती, सोचती रहती—क्यों? क्यों ज़िंदगी इतनी क्रूर है? पहले पापा, अब ये लड़का जो किसी अजनबी से ज़्यादा क़रीब हो गया था।
एक शाम, अर्जुन की माँ बाहर आईं।
"तुम मीरा हो ना?" उन्होंने पूछा। उनकी आँखें लाल थीं।
मीरा ने सिर हिलाया।
"वो तुम्हारा नाम लेता रहता है। अंदर आओगी?"
मीरा के पैर काँपे, पर वो अंदर गई। अर्जुन बेड पर लेटा था, कमज़ोर, पर मुस्कुराता हुआ।
"आखिरकार आ ही गई तुम," उसने धीमे से कहा।
"बेवकूफ़ हो तुम," मीरा की आवाज़ भर्रा गई। "मुझसे कभी बोले नहीं कि इतनी तकलीफ़ है।"
"क्योंकि तुम भाग जाती। और मैं चाहता था कि तुम रहो... थोड़ी देर के लिए ही सही।"
मीरा बैठ गई। उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा।
"अब कहीं नहीं जा रही," उसने कहा।
भाग चार: वो 47 दिन
अगले 47 दिन मीरा और अर्जुन ने साथ बिताए। अस्पताल के कमरे में, छत पर, कभी-कभी गार्डन में व्हीलचेयर पर। उन्होंने बातें कीं—ज़िंदगी की, मौत की, प्यार की।
"तुम्हें पता है मीरा," अर्जुन ने एक दिन कहा, "मैं तुमसे प्यार नहीं करूँगा।"
मीरा रुक गई। "क्या?"
"क्योंकि प्यार करने का मतलब है तुम्हें तोड़कर जाना। और मैं वो नहीं करना चाहता। मैं बस... तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ, जितना भी वक़्त बचा है।"
"बहुत देर हो चुकी है," मीरा ने आँसू पोंछते हुए कहा। "मैं पहले ही टूट चुकी हूँ। और तुम्हें प्यार भी कर चुकी हूँ।"
अर्जुन ने उसका हाथ चूमा। "तो फिर ये 47 दिन... हमारी पूरी ज़िंदगी है।"
भाग पाँच: आख़िरी ख़त
अर्जुन ने मीरा को एक डायरी दी थी—47 पन्नों की। हर पन्ने पर एक दिन के लिए कुछ लिखा था।
"जब मैं ना रहूँ, तब रोज़ एक पन्ना पढ़ना," उसने कहा था।
अर्जुन के जाने के बाद, मीरा ने वो डायरी खोली नहीं। एक महीना बीत गया। दो महीने। तीन।
फिर एक दिन, बारिश में, उसी जगह जहाँ वो मिले थे, मीरा ने डायरी खोली।
पहला पन्ना:
"मीरा, आज तुमने मुझसे पूछा था कि मैं इतना हँसता क्यों हूँ जबकि मुझे पता है कि मेरे पास वक़्त कम है। जवाब है—क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ। तुमने मुझे जीना सिखाया, मरना नहीं।"
मीरा रोई। फिर दूसरा पन्ना पढ़ा। फिर तीसरा।
दसवाँ पन्ना:
"मीरा, मैं चाहता हूँ तुम फिर से प्यार करो। हाँ, मैं स्वार्थी नहीं हूँ, मैं बेवकूफ़ हूँ। पर तुम्हें ख़ुश देखना चाहता हूँ। वादा करो कि तुम जीओगी—मेरे लिए नहीं, अपने लिए।"
तीसवाँ पन्ना:
"आज तुमने मुझे अपने पापा के बारे में बताया। तुम्हारी आँखों में वो दर्द देखकर मैं टूट गया। मीरा, तुम इतनी मज़बूत हो। मुझसे ज़्यादा। शायद इसीलिए मुझे तुमसे प्यार हो गया।"
47वाँ पन्ना:
"मीरा, ये आख़िरी पन्ना है। मैं नहीं जानता मैं कब तक रहूँगा, पर जानता हूँ कि तुम ये कब पढ़ोगी—जब तुम तैयार होगी। सुनो, मुझे कोई अफ़सोस नहीं। तुमसे मिला, तुम्हें जाना, तुम्हें प्यार किया—इससे बड़ी ज़िंदगी क्या होगी?
पर एक बात कहनी है। मेरे जाने के बाद, मेरे नाम की एक फ़ाउंडेशन बनेगी। कैंसर के मरीज़ों के लिए। मैंने अपनी माँ से कहा है कि इसे तुम संभालोगी। पैसे की चिंता मत करना, सब व्यवस्था है।
ये मेरा सपना है। और तुम मेरे सपने हो।
हमेशा तुम्हारा,
अर्जुन।
P.S. - उस बारिश वाले दिन, जब मैं तुम्हें छाते के नीचे ले गया था... वो संयोग नहीं था। मैं तुम्हें एक हफ़्ते से देख रहा था—उसी कॉफी शॉप में, उसी बस स्टॉप पर। पर हिम्मत नहीं हुई। फिर वो बारिश हुई, और मुझे लगा—अब या कभी नहीं। शुक्रिया कि तुमने मुझे मौक़ा दिया।
भाग छह: नई शुरुआत
दो साल बाद, "अर्जुन फ़ाउंडेशन" दिल्ली की सबसे बड़ी कैंसर सहायता संस्था बन गई थी। मीरा रोज़ वहाँ जाती, मरीज़ों से मिलती, उनकी हिम्मत बढ़ाती।
एक दिन, एक लड़का अस्पताल में भर्ती हुआ। उसका नाम था रोहन। वो भी कैंसर से लड़ रहा था, पर उसकी आँखों में उम्मीद थी।
"आप मीरा मैम हैं ना?" उसने पूछा। "अर्जुन सर के बारे में मैंने बहुत पढ़ा है। वो बहुत बहादुर थे।"
मीरा मुस्कुराई। "हाँ, थे। और तुम भी हो।"
रोहन ने कहा, "मैडम, एक बात बताऊँ? मुझे भी किसी से प्यार हो गया है। पर डर लगता है... कि अगर मैं ना रहा तो?"
मीरा ने उसका हाथ थाम लिया। "तो भी प्यार करो। क्योंकि प्यार सिर्फ़ ज़िंदा रहने के बारे में नहीं, बल्कि असली ज़िंदगी जीने के बारे में है। अर्जुन ने मुझे यही सिखाया।"
वो शाम, मीरा ने अर्जुन की क़ब्र पर फूल रखे। बारिश हो रही थी—पर इस बार उसे नफ़रत नहीं थी। बल्कि प्यार था।
"तुम्हारा सपना पूरा हो रहा है अर्जुन," उसने फुसफुसाकर कहा। "और मैं... मैं जी रही हूँ। तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। जैसा तुमने चाहा था।"
हवा में जैसे अर्जुन की आवाज़ गूँजी—"मुझे तुम पर गर्व है, मीरा।"
और उस पल, मीरा को एहसास हुआ कि प्यार कभी मरता नहीं। वो बस... शक्ल बदल लेता है।
समाप्त
लेखक की बात: कभी-कभी ज़िंदगी हमें वो लोग देती है जो हमेशा के लिए नहीं रुकते। पर जो निशान छोड़ जाते हैं, वो कभी मिटते नहीं। अर्जुन और मीरा की कहानी हमें याद दिलाती है कि प्यार का मतलब सिर्फ़ साथ रहना नहीं—बल्कि एक-दूसरे को बेहतर इंसान बनाना है।
क्या आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसा है?