Tere Ishq Mein - Movie Review in Hindi Film Reviews by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | तेरे इश्क में - फिल्म रिव्यू

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तेरे इश्क में - फिल्म रिव्यू

फिल्म आलोचना :_तेरे इश्क में

लड़की की बेवफाई से बर्बाद होते युवक

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लड़कियां सपने राजकुमार के देखती हैं ।उन्हें ऊंचे और रंगीन नज़ारे और भी बहुत कुछ चाहिए होता है।जब आगे जिंदगी की हकीकत खुलती है तो वहां कड़ी मेहनत से रोजी रोटी कमाने वाला इंसान होता है।और सपने..सपने तो कबके हवा हो चुके होते हैं। रहता है सपने मरने की राख और मरा हुआ रिश्ता जिसे ताउम्र हर कोई सहता रहता है। 

ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं अपने आसपास और अपनी जिंदगी में ही झांक लें।

    आनंद एल राय इस बार अपने लेखकों हिमांशु शर्मा और यादव के साथ एक सच के धरातल पर सपनो की पड़ताल करती कहानी कहते हैं। जिसमें यह चौंकाने वाला खुलासा होता है कि आज भी एक तरफ प्यार होता है तो दूसरी तरफ गलतफहमी।

फिल्म प्रारंभ में ही फाइटर प्लेन उड़ा रहे नायक और गर्भवती नायिका को अलग अलग प्रस्तुत करती है। 

ऐसी लव स्टोरी जिसमें पहली रील से ही दर्शक जानते हैं कि मनोविज्ञानिक डॉक्टर नायिका ,इसे प्यार नहीं करती,विवाहित और प्रेग्नेंट है।

 हिंदी फिल्में आजकल इस तरह के बड़े खतरे उठाती हैं। दर्शकों को यह खतरे,अच्छे लेखकों द्वारा लिखे दृश्य,संवाद और उनकी प्रस्तुति से पसंद भी आते हैं। यह कहानी एक ऐसी हकीकत को सामने रखती है ,जो होती सब जगह,शहर में है,पर उसे हम नजरअंदाज या कहें "छोड़ो यार,क्या करें?' की जैसे हैंडल करते हैं। आज के स्त्रीवादी समय में यह फिल्म ताजगी लाती है।

 

कथा एक निर्मम सच की

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कहानी शंकर (धनुष ,यह अभिनेता का नाम है) नामक लाखों युवाओं के जैसे कैंपस में ,बाहर घूम रहे युवाओं की है। वह कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की के द्वारा उसे टोकने पर उसकी तरफ आकर्षित होता है। वह युवती ,मुक्ति(कृति सेनन) मनोविज्ञान की अपनी उच्च शिक्षा के लिए उसे एक ऑब्जेक्ट समझती है।

     फिर किस तरह उस युवक को हिंसक प्रवृत्ति को प्यार से समझाकर,विश्वास दिलाकर उसे एक नो हार्मफुल युवक बनाती है,इसे रोचक ढंग से कुल आधे घंटे में दिखाया गया है।

  अब इसे लड़के प्यार श्यार समझ लेते हैं तो बेचारी ,भोली भाली,सिंधु घाटी सभ्यता के काल या कहें बेहद पर्दे घूंघट में रहती हैं न लड़कियों आजकल की,तो उन्हें थोड़ी समझ आता है कि एक (या अधिक भी) लड़के के साथ बातचीत,वह भी खुलकर करना,उसे छूट देना का वह दूसरा मतलब निकाले तो उनकी तो गलती नहीं।

 तो लड़का अपने पिता ,जो कोर्ट के नोटरी हैं और सामान्य से एक कमरे के घर में रहते हैं,को बताता है। एक दिन लड़की भी आती है,जो फिल्म के अंत में बताती है कि मैं तो उस दिन मना करने आई थी।इशारा भी किया पर तुम तो तुम ,तुम्हारे पिता भी नहीं समझे तो मैं क्या करूं?

         वापस पूर्व में फिल्म जाती है और लड़का खुशी खुशी लड़की के पिता की लुटियंस मार्ग की कोठी में हवा में उड़ता पहुंचता है।

   वहां सुबह सुबह सच्चाई से उसका सामना, लड़की के वरिष्ठ आईएएस पिता करवाते हैं। दिल को छू लेने वाला दृश्य है। लगभग ऐसा ही दृश्य साहिर ने अपनी आत्मकथा (उर्दू में आई,उसके अंश अकार पत्रिका में प्रियवंद ने कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित किए) में लिखा है जब नौजवानी की दहलीज पर कदम रख चुका युवा ,बेरोजगार ,कॉलेज का महबूब शायर रईस अमृता के पापा की कोठी पर अमृता के बुलावे पर उनका हाथ मांगने पहुंच गया था। फिर बेहद अपमानित और जलील होकर अमृता के सामने रुखसत हुआ।अमृता एक शब्द नहीं बोलीं। फिर लन्दन तीन साल पढ़ने चली गई। साहिर तब तक संघर्ष करके नाम कमाने लगे थे मुंबई में। अमृता को आने के बाद साल दो साल लगे साहिर को पूरे देश में लोकप्रिय गीतकार के रूप में जानने में।फिर वह वापिस साहिर के पुराने प्यार में पड़ने लगी। पर तब क्या साहिर और क्या किसी भी युवक को वापस मुड़ना चाहिए? वैसे ही साहिर नहीं मुड़े और उन्होंने अपनी विधवा मां की मर्जी से अपनी पत्नी चुनी,जो बेहद शरीफ और पारिवारिक थी।अमृता बार बार साहिर के प्रति प्रेम इजहार करती रही। यह सलीका ए आशिकी रहा कि साहिर ने कभी भी खुलकर यह नहीं बताया कि असली वजह अमृता का उन्हें धोखा देना, ऐन वक्त पर पिता के सामने पलट गईं। इसी अमृता को देश की अधिकांश स्त्रियां प्रेम का प्रतीक मानती हैं ,बाकी छुप छुपकर ऐसे प्यार की कल्पना करती हैं।

खैर ,फिल्म पर आते हैं वापस ।तो दृश्य में युवा प्रेमी ,लड़की के पिता से मिलता है,बताता है हम प्यार करते हैं। आईएएस पिता बहुत शांति से पूछता है,"तुम करते क्या हो?"

लड़का,गर्व और लिहाज से," जी, यूनिवर्सिटी का अध्यक्ष हूं। सभी लोग जानते हैं।"

पिता _"लेकिन करते क्या हो? अपना पेट भरने के लिए क्या करते हो?"

लड़का सोचता है,कुछ जवाब नहीं दे पाता।

पिता जब बोलता है तो आज का सच रखता है ऐसे लाखों युवकों का जो भ्रम में ही रहते हैं, " मैं बताता हूं तुम क्या करते हो। कैंटीन,पार्किंग के ठेके,छात्र संघ फंड में कट ,पेपर बेचना आदि। और जानते हो मैं कौन हूं?"

 बड़ा ही मार्मिक दृश्य रचा है लेखक हिमांशु और यादव ने। यथार्थ से नवयुवक की मुठभेड़। धनुष ने बेहद अच्छी और अद्भुत अभिनय किया है। खुशी से दमकते,चहकते और फिर धीरे धीरे सपनो की दुनिया से यथार्थ के कठोर धरातल पर पटका जाना।

पिता जो कहते हैं वह आज के सिस्टम का यथार्थ है," मैं केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव ,वरिष्ठ अधिकारी हूं। दो सौ डीएम मेरे नीचे काम करते हैं। उनके नीचे दस हजार सरकारी लोग ।जिनका काम तेरे जैसे दो करोड़ लोगों को जिंदा रखना है। और तू मेरी बेटी से शादी करना चाहता है? तू खुद बोल एक बेटी के पिता के लिए यह जायज है? तेरे से बेटी की शादी करना?"

  इस पूरी बातचीत में निर्लिप्त भाव से नायिका मुक्ति सामने ,पिता के पीछे खड़ी लड़के को अजीब निगाह से देखती रहती है। कृति सेनन ने भी बहुत परिपक्व अभिनय किया है मुक्ति के नेगेटिव किरदार को निभाने में। वह यह जाहिर करती है कि वह उसे प्यार नहीं करती।

लड़का पूछता है ,"आप अपनी बेटी की शादी किसके साथ करेंगे?" लड़के ऐसे ही बेवकूफ,नासमझ,कमअक्ल होते हैं। "जो यूपीएससी पास करेगा।"

  और लड़का ठान लेता है और कहता है यूपीएससी पास करके ज्योति तुम्हे फोन करूंगा।

 यहां बड़े कायदे से लड़की और उसके पिता ने बात खत्म करदी। यूपीएससी न पास होगा न यह आएगा। 

लड़की विदेश चली जाती है पीएचडी करने अमृता की तरह।

    

  प्रेरणा, कब कहां मिल जाए लड़कों को

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लड़का घर जाता है पिता को कहता है सीबीएससी पास करना है।उसे यूपीएससी का पूरा नाम भी नहीं मालूम। प्रकाश राज ने लाचार ,मजबूर पिता का जो बिन मां के बेटे को बहुत प्यार करते हैं,का रोल बहुत रोचक और दमदार ढंग से निभाया है। वह पूरी तरह से सुख,दुख,बेटे की उन्नति और खुश रहे वह,ऐसे भावपूर्ण ढंग से निभाते हैं कि हम भूल जाते हैं कि दबंग ,सिंघम टू का मुख्य विलेन हम देख रहे हैं।

आगे लड़का,शंकर,जो बिल्कुल पढ़ने में होशियार नहीं है,वह कड़ी मेहनत करता है। ढेरों किताबें खरीदता है,पढ़ता है। दो साल फेल होता है फिर तीसरे साल प्रीलिम्स पास कर लेता है।

      उधर मुक्ति विदेश से पढ़ाई करके आ गई है और उसे आर्म्ड फोर्स में साइकोजिस्ट की नौकरी मिल गई है। वह अपने बचपन के दोस्त से मंगनी की खुद अनाउंसमेंट करती बहुत खुश है। उसे तो याद भी नहीं की कोई उसके प्यार में दीवाना भी है।

यहां से कहानी कई मोड़ लेती है।तमाम दावों,विश्वास के बाद भी वह कह देती है कि प्यार नहीं उससे।लड़का बंगले में मेहमानों के सामने तोड़फोड़ करता,आग लगा देता है।

   यहां एक और यादगार दृश्य रचा है निर्देशक आनंद एल राय और लेखकों ने। आईएएस पिता लड़के को थाने में बंद करवा खूब पिटवाता है। अगले दिन पिता,प्रकाश राज उनके बंगले पहुंच अपने बेटे की हरकतों की माफी मांगता है। उसे छुड़वा दें,वह नादान है।

लड़की का पिता सारे नौकरों और उपस्थित कर्मचारियों , प्रत्येक से माफी मांगने को कहता है। दृश्य आपके जहन में आना चाहिए कि किस तरह दादानुमा,कॉलेज या स्ट्रीट हीरो बनते युवाओं की गलतियों की सजा उनके मां बाप भुगतते हैं। वह प्रत्येक,नौकरों के भी,पांवों में सिर रखककर माफी मांगता है।

  आंखे भर आती हैं ऐसा अभिनय किया है लड़के के पिता ने।

     लड़का आईएएस का एग्जाम नहीं देता।इतना बेवकूफ,भावुक और प्यार में चोट खाया होता है। यहां साठ साल पहले ऐसे ही धोखे का शिकार हुए युवा साहिर याद आते हैं,जिन्होंने जिंदगी खराब करने की जगह प्रेमिका को भुलाया और जमकर संघर्ष करके फिल्म और अदबी जगत में नाम कमाया।

  शंकर आईएसएस का आगे एग्जाम नहीं देता पर पिता इस सदमे के बाद टूट जाता है। एक दुर्घटना में उसका देहांत हो जाता है। तब पुत्र को अहसास होता है । वह परीक्षा दे एयरफोर्स में भर्ती हो जाता है।क्योंकि पिता की अंतिम इच्छा थी ।

   

कुछ का बेवफा स्वभाव बदलता नहीं 

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कहानी में अनेक मोड़ और उतार चढ़ाव आते हैं। लड़की विवाह के वर्षों बाद फिर सामने आती है। लड़का उसे इग्नोर करता है। वह उसे किस प्रकार इमोशनली ठगती है यह पर्दे पर देखने की जरूरत है।

लड़का आखिरकार अपनी जान देकर अपनी गलती की कीमत चुकाता है।

       आनंद एल राय और उनके लेखकों की टीम प्रारंभ से ही यथार्थवादी और समाज के उन ढके पन्नों को सामने लाते हैं जो अधिकांश जगह घट रहे होते हैं। लेकिन कोई उन पर बोलता नहीं,बल्कि अपनी ही गलती मानता रहता है। जब आज के समय में स्त्री पुरुष बराबर है तो पुरुषों को ही हर बार दोष क्यों देना? जबकि वैसी ही बल्कि उससे अधिक खतरनाक,लड़के भविष्य नहीं बना पाएं,पागल हो जाएं,जान चली जाए जैसी गलतियां सैकड़ों लड़कियों द्वारा रोज,हर शहर में की जा रही।परन्तु उनकी गलती नहीं बल्कि इस अपराध,किसी की पूरी जिंदगी तबाह जाए देना,से वह बड़ी मासूमियत से,भोलेपन से बच जाती हैं। ऊपर से फरेब,धोखे का इल्ज़ाम भी पुरुषों पर लगा देती हैं। सब नहीं पर कुछ लड़कियां हैं जो ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से संबंधों का निर्वहन भी करती हैं।और प्यार ,भविष्य बनाने के बाद को ही महत्व देती हैं।

निर्देशक ,लेखकों को साधुवाद की उन्होंने एक जरूरी और अनछुए विषय पर फिल्म बनाने का हौंसला दिखाया।दर्शकों ने भी फिल्म को दिल खोलकर अपनाया। सोचने को मजबूर करती यह फिल्म यूट्यूब पर निशुल्क उपलब्ध है।

     

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(डॉ संदीप अवस्थी 

804,विजय सरिता एन्क्लेव

बी ब्लॉक,पंचशील, अजमेर 

305004

मो 7737407061)