एपिसोड 1: दरिया, परिंदे और वो अजनबी
अज़ीम …. वह ज़ोया को जाते हुए देखता है और सोचता है— "यह कैसी अजनबी थी जो आई तो एक शोर की तरह थी (महंगी गाड़ी, रुतबा), पर छोड़ एक खामोशी गई। क्या यह बस एक इत्तेफाक था कि वह अपना पर्स भूल गई, या कुदरत मुझे कुछ और दिखाना चाहती है?"
ज़ोया … गाड़ी में बैठते हुए वह पीछे मुड़कर उस दरिया और अज़ीम को देखती है। उसे लगता है जैसे कोई अदृश्य धागा उसे वहां खींच रहा है। "इतने बड़े शहर में, हज़ारों लोगों के बीच, मैं उसी की दुकान पर क्यों रुकी? क्या यह महज़ इत्तेफाक है या मेरी तकदीर का कोई नया मोड़?"
शहर का सबसे व्यस्त इलाका, जहाँ गाड़ियों का शोर और लोगों की भागदौड़ कभी खत्म नहीं होती। लेकिन उसी सड़क के किनारे बहता दरिया एक अलग ही दुनिया समेटे हुए था।
ज़ोया अपनी शानदार कार की पिछली सीट पर बैठी बाहर देख रही थी। उसके कान में लगा महंगा ईयरफोन उसके घर की बहस की आवाज़ों को तो रोक सकता था, पर उसके मन की बेचैनी को नहीं। उसने गाड़ी रुकवाई और दरिया के किनारे फुटपाथ पर आ गई।
उसने पेस्टल पिंक रंग का एक ग्रेसफुल पैंट-सूट पहना था। उसके खुले बाल और चेहरे की गंभीरता उसे भीड़ से बिल्कुल अलग बना रही थी। तभी उसकी नज़र सामने पड़ी...
वहाँ एक छोटी सी लकड़ी की दुकान थी, जिसके बाहर बोरियों में अनाज भरा था। एक सादे से नीले कुर्ते में एक लड़का—अज़ीम—ज़मीन पर बैठा कबूतरों को दाना डाल रहा था। वह परिंदों से ऐसे बातें कर रहा था जैसे वे उसके पुराने दोस्त हों। एक गौरैया उसके कंधे पर बैठी थी, तो कुछ कबूतर उसके हाथों से दाना चुग रहे थे।
ज़ोया की कदम वहीं ठिठक गए। उसने अज़ीम के चेहरे पर वो सुकून देखा जो उसे अपने करोड़पति पिता के चेहरे पर कभी नहीं दिखा।
ज़ोया ने मन ही मन सोचा— "कितना खुशनसीब है ये शख्स... इसके पास शायद दुनिया की सुख-सुविधाएं न हों, पर इसके पास वो 'वक्त' है जिसकी मैं बरसों से तलाश कर रही हूँ। काश! मेरी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा होता जो मुझे इसी तरह बिना किसी मतलब के वक्त देता। जो मेरी दौलत को नहीं, मेरी रूह को समझता।"
वह धीरे से दुकान के पास पहुँची।
"सुनिए..." ज़ोया की आवाज़ में एक हिचकिचाहट थी।
अज़ीम ने सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई हैरानी नहीं, बस एक अजीब सा ठहराव था। "जी?"
"मुझे भी... इन्हें खाना खिलाना है," ज़ोया ने परिंदों की तरफ इशारा किया।
अज़ीम ने मुस्कुराकर एक छोटा कटोरा दाने से भरकर उसे थमा दिया। ज़ोया ने पहली बार अपने हाथों से परिंदों को दाना खिलाया। उस पल उसे लगा जैसे उसके दिल का बोझ हल्का हो रहा है। लेकिन जैसे ही दाना खत्म हुआ, उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
उसने अपने सूट की जेबें टटोलीं, पर पर्स और फोन तो गाड़ी में ही रह गए थे। उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।
"वो... असल में मैं पैसे लाना भूल गई। पर्स गाड़ी में रह गया है," ज़ोया ने नज़रे झुकाकर कहा। "क्या मैं... मैं बाद में आकर पैसे दे सकती हूँ?"
अज़ीम ने बड़े आराम से बिखरे हुए दाने समेटे और खड़ा होकर बोला, "कोई बात नहीं। ये परिंदे आपके मोहताज नहीं थे और न ही मेरा ये काम। आपने इन्हें खिला दिया, मुझे मेरी कीमत मिल गई। आप बाद में पैसे दे जाएँ तो भी ठीक है, और न दे पाएँ तो भी कोई बात नहीं... शायद इन पक्षियों के हिस्से का रिज़्क़ आज आपकी तरफ से ही आना था।"
ज़ोया उसे देखती रह गई। अज़ीम की बातों में न तो कोई लालच था और न ही कोई दिखावा। उसने बस एक हल्की सी मुस्कान दी और अपनी दुकान के अंदर चला गया।
ज़ोया वहीं खड़ी रही। उसने सोचा था कि वह यहाँ सिर्फ परिंदों को दाना खिलाने आई है, पर उसे नहीं पता था कि वह यहाँ अपना सुकून छोड़ चली है, जिसे पाने के बहाने उसे अब बार-बार यहाँ आना होगा।
...ज़ोया अपनी गाड़ी की तरफ मुड़ी ही थी कि अज़ीम ने पीछे से उसे आवाज़ दी।
"सुनिए!"
ज़ोया रुकी और पीछे मुड़कर देखा। अज़ीम के हाथ में एक छोटी सी पुरानी चाबी थी, जो शायद ज़ोया के हाथ से दाना खिलाते वक्त वहीं गिर गई थी।
"आपकी कोई कीमती चीज़ यहाँ रह गई है," अज़ीम ने वो चाबी उसकी तरफ बढ़ाई।
ज़ोया ने जब उस चाबी को देखा, तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह सिर्फ एक चाबी नहीं थी, वह उसके घर के उस पुरानी तिजोरी (Safe) की चाबी थी जिसमें उसके पिता ने वो 'राज' छुपा कर रखा था जिसके पीछे पूरा शहर पड़ा था।
ज़ोया ने कांपते हाथों से चाबी ली और अज़ीम की आँखों में देखा। अज़ीम की आँखें अब वो साधारण दुकानदार वाली नहीं थीं, उनमें एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह सब कुछ जानता हो।
"संभाल कर रखियेगा," अज़ीम ने धीमे से कहा, "हर चीज़ की कीमत पैसों से नहीं चुकाई जाती... कुछ चाबियाँ तक़दीर के बंद दरवाजे खोल देती हैं।"
ज़ोया बिना कुछ बोले तेज़ी से अपनी गाड़ी की तरफ भागी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वह सोच रही थी— "क्या अज़ीम ने जानबूझकर यह चाबी मुझे दिखाई? क्या उसे पता है कि मैं कौन हूँ?"
गाड़ी के शीशे से उसने पीछे मुड़कर देखा, अज़ीम अब भी वहीं खड़ा उसे देख रहा था, और उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।