बरसात हो रही थी।
अस्पताल के बाहर मैं भीगता हुआ खड़ा था।
न छाता था, न किसी का साथ।
हाथ में एक पुराना-सा मोबाइल था,
जिसकी स्क्रीन पर आज भी एक मैसेज टिमटिमा रहा था—
“बस थोड़ा इंतज़ार करना… मैं लौट आऊँगी।”
उसका नाम पायल था।
और वो मेरी ज़िंदगी का वो सच थी,
जिसे मैं आज भी झूठ नहीं कह पाता।
हम बहुत अमीर नहीं थे।
दो वक़्त की रोटी, किराए का कमरा
और ढेर सारे सपने—
बस इतना-सा ही हमारा संसार था।
लेकिन हमारा प्यार…
वो हालातों से कहीं बड़ा था।
पायल अक्सर कहा करती थी—
“अगर हालात सही होते न,
तो मैं तुम्हें दुनिया की हर खुशी देती।”
मैं हँस देता था।
क्योंकि मेरे लिए
वो खुद ही सबसे बड़ी खुशी थी।
हमारी मुलाकात एक बस स्टॉप पर हुई थी।
बारिश की हल्की फुहार थी,
और उसके बालों से टपकती बूँदें
सीधे मेरे दिल में उतर गई थीं।
उस दिन से
मैं हर रोज़ उसी बस स्टॉप पर
थोड़ा जल्दी पहुँचने लगा।
सब कुछ ठीक चल रहा था।
लेकिन ज़िंदगी को शायद
हमारी खुशी पसंद नहीं आई।
एक दिन पायल रोती हुई मेरे पास आई।
उसकी आँखें लाल थीं,
हाथ काँप रहे थे।
वो कुछ बोल नहीं पा रही थी।
मैंने पूछा—
“क्या हुआ?”
वो बहुत देर तक चुप रही।
फिर काँपती आवाज़ में बोली—
“मुझे कैंसर है…
डॉक्टर कह रहे हैं
ज़्यादा वक़्त नहीं है।”
मैं हँस पड़ा।
हाँ… मैं हँस पड़ा।
क्योंकि मुझे लगा
वो मज़ाक कर रही है।
लेकिन जब उसने
अपनी मेडिकल रिपोर्ट
मेरे हाथ में रखी,
तो मुझे ऐसा लगा
जैसे किसी ने
मेरी पूरी दुनिया
काग़ज़ में बाँधकर
ज़मीन पर पटक दी हो।
मैंने उसकी आँखों में देखा
और कहा—
“हम लड़ेंगे…
साथ में।”
उसने मेरी हथेली पकड़ ली।
उसकी पकड़ बहुत कमज़ोर थी।
और वो बोली—
“अगर मैं हार गई…
तो क्या तुम मेरा इंतज़ार करोगे?”
मैंने बिना सोचे कहा—
“ज़िंदगी भर।”
इलाज शुरू हुआ।
अस्पताल की दीवारें
हमारी रोज़ की गवाह बन गईं।
धीरे-धीरे
उसके बाल झड़ गए,
चेहरा सूख गया,
पर उसकी आँखों में
आज भी मेरा नाम ज़िंदा था।
वो दर्द में भी मुस्कुरा देती थी।
कहती थी—
“देखना,
मैं ठीक होकर लौटूँगी।
फिर हम बहुत हँसेंगे।”
मैं हर बार
उसकी बात पर यकीन कर लेता था।
क्योंकि
प्यार में झूठ भी
सच लगने लगता है।
एक रात उसका फोन आया।
आवाज़ बहुत धीमी थी।
वो बोली—
“अगर मैं कल न उठूँ,
तो रोना मत।
मुझे कमज़ोर याद मत करना।”
मैंने गुस्से में कहा—
“ऐसा कुछ नहीं होगा।
तुम ठीक हो जाओगी।”
लेकिन अगली सुबह
उसका फोन नहीं आया…
बल्कि अस्पताल से आया।
मैं दौड़ता हुआ पहुँचा।
साँसें टूट रही थीं।
दिल छाती से बाहर आना चाहता था।
अंदर गया तो
एक सफेद चादर…
बंद आँखें…
और वो होंठ
जो मुझे कभी
“जान” कहा करते थे।
मैं रोया नहीं।
मैं चीखा नहीं।
मैं बस
उसके पास बैठ गया।
उसके हाथ में
एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था।
मैंने काँपते हाथों से खोला।
लिखा था—
“मैं लौट नहीं पाई।
पर तुम ज़िंदगी जीना।
किसी और से प्यार कर लेना।
बस मुझे भूलना मत।”
उस दिन के बाद
मैं किसी और से प्यार नहीं कर पाया।
क्योंकि
कुछ लोग मरकर नहीं जाते…
वो हमारी हर साँस में
ज़िंदा रहते हैं।
आज भी बरसात में
मैं उसी अस्पताल के बाहर
खड़ा होता हूँ।
हाथ में वही पुराना मोबाइल।
वही आख़िरी मैसेज।
“इंतज़ार करना…”
और मैं करता हूँ।
क्योंकि
अधूरा प्यार
कभी खत्म नहीं होता…
वो बस
ज़िंदगी भर
रुलाता रहता है।