बारिश की बूंदें खिड़की पर टकरा रही थीं, जैसे कोई पुरानी यादें दरवाजे पर दस्तक दे रही हों। आराध्या ने कॉफी का कप हाथ में लिया और बालकनी की ओर देखा। आज ठीक तीन साल पहले इसी बारिश में वो मिले थे—अविनाश।
"तुम कभी नहीं बदलोगे, आराध्या," उसकी आवाज आज भी कानों में गूंजती है। लेकिन आज वो यहां नहीं था। वो चला गया था, बिना कोई वजह बताए।
फोन की स्क्रीन पर एक मैसेज ब्लिंक कर रहा था—
"मैं वापस आ रहा हूं। आज रात 8 बजे पुराने कैफे में। बस एक बार मिल लो। - अविनाश"
आराध्या का दिल धड़क उठा। क्या वो सच में आएगा? या फिर ये सिर्फ एक और धोखा है? उसने गहरी सांस ली और तैयार होने लगी। आज वो उससे सब कुछ पूछेगी—क्यों छोड़ा? क्यों लौटा?
कैफे पहुंचते ही आराध्या ने देखा—वो वहां बैठा था, वही मुस्कान, वही आंखें। लेकिन उसके बगल में कोई और थी... एक लड़की, जिसके हाथ में वही अंगूठी थी जो अविनाश ने कभी आराध्या को दी थी।
आराध्या ने खुद को संभाला और उनके पास गई।
"अविनाश..." उसकी आवाज कांप रही थी।
अविनाश उठा, आंखों में नमी। "आराध्या, तुम आई... मैं जानता था तुम्हें रोक नहीं पाऊंगा।"
उस लड़की ने मुस्कुराकर कहा, "हाय, मैं रिया हूं। अविनाश की..."
"बहन," अविनाश ने जल्दी से कहा। "रिया मेरी छोटी बहन है।"
आराध्या चौंकी। "तो अंगूठी?"
रिया ने हंसते हुए कहा, "भाई ने मुझे दी थी। वो कहता था—ये आराध्या की याद है, लेकिन अब तू पहन ले, क्योंकि वो कभी नहीं लौटेगी।"
आराध्या की आंखें भर आईं। "तो तुमने मुझे क्यों छोड़ा? तीन साल... कोई एक मैसेज भी नहीं।"
अविनाश ने गहरी सांस ली। "बैठो पहले। सब बताता हूं।"
वे तीनों बैठे। अविनाश ने शुरू किया—
"तीन साल पहले... डॉक्टर ने कहा था मेरी बीमारी... कैंसर। ज्यादा दिन नहीं बचे। मैं नहीं चाहता था कि तुम मेरे साथ दुख झेलो। इसलिए चुपके से चला गया। सोचा था तुम किसी अच्छे इंसान से शादी कर लोगी।"
आराध्या रो पड़ी। "तुमने मुझसे पूछा क्यों नहीं? मैं तुम्हारे साथ रहती, लड़ती!"
रिया ने आराध्या का हाथ थामा। "भाई अब ठीक है। इलाज हुआ, चमत्कार की तरह बच गया। लेकिन वो तुम्हें ढूंढने से डर रहा था। सोचता था—तुम शायद किसी और के साथ खुश हो।"
अविनाश ने आराध्या की आंखों में देखा। "मैं वापस आया हूं... अगर तुम चाहो तो। लेकिन अगर तुम्हारा जीवन अब किसी और का है, तो मैं चला जाऊंगा।"
आराध्या चुप रही। बाहर बारिश और तेज हो गई।आराध्या ने चुप्पी तोड़ी। "तीन साल मैंने हर रात तुम्हें याद किया। सोचा था तुम किसी और के साथ हो। लेकिन आज... मैं समझ गई। तुमने मुझे दर्द से बचाया, लेकिन तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया।"
अविनाश ने हाथ बढ़ाया। "मुझे माफ कर दो, आराध्या। मैं गलत था।"
रिया उठी। "मैं बाहर इंतजार करती हूं। तुम दोनों बात कर लो।"
अब सिर्फ दोनों। कैफे की म्यूजिक धीमी थी।
आराध्या ने कहा, "मैंने कभी किसी और को जगह नहीं दी। लेकिन अब... मुझे समय चाहिए।"
अविनाश ने सिर झुकाया। "जितना चाहिए, उतना लो। लेकिन एक वादा करो—अगर कभी दिल करे, तो मुझे बता देना।"
आराध्या ने मुस्कुराकर कहा, "वादा। लेकिन पहले ये बताओ—तुम अब कहां रहते हो? क्या करते हो?"
अविनाश ने बताया कि वो दिल्ली में एक NGO चलाता है, कैंसर पेशेंट्स की मदद करता है। "तुम्हारी वजह से... मैंने सोचा, किसी और को वो दर्द न हो जो मुझे हुआ।"
आराध्या का दिल पिघल गया। लेकिन अचानक उसका फोन बजा। स्क्रीन पर नाम—मां।
"हां मां?"
मां की आवाज घबराई हुई। "आराध्या, जल्दी घर आ। तेरे पापा... अस्पताल में हैं। दिल का दौरा पड़ा है।"
आराध्या का चेहरा सफेद पड़ गया। फोन गिरते-गिरते बचा।
अविनाश ने पूछा, "क्या हुआ?"
"पापा... अस्पताल।"
अविनाश ने तुरंत कहा, "चलो, मैं कार लाया हूं। मैं छोड़ दूंगा।"
वे दोनों बाहर निकले। रिया भी साथ थी। बारिशअस्पताल पहुंचते ही डॉक्टर ने कहा, "ऑपरेशन की जरूरत है। लेकिन... ब्लड ग्रुप बहुत रेयर है। A- Negative।"
आराध्या रोते हुए बोली, "मेरा ब्लड ग्रुप भी A- है।"
डॉक्टर ने कहा, "तुम डोनर बन सकती हो, लेकिन रिस्क है।"
अविनाश ने आराध्या का हाथ थामा। "मैं भी A- हूं। हम दोनों मिलकर..."
तभी आराध्या के मन में एक सवाल उठा—क्या ये सब संयोग है? या अविनाश की वापसी के पीछे कोई और राज है?