अर्शित किचेन में गया और सिया के लिए सूप बनाने लगा उसने सिया को अपने हाथों से सूप पिलाया और उसे दवाई दी।
"अब तुम आराम करो मैं ऑफिस के कुछ काम है वो खत्म कर लेता हूं।"
अर्शित ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।
अर्शित उसी कमरे में टेबल पर काम कर रहा था और सिया अर्शित को देखे जा रही थी उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ रहे थे।
" क्या सर मेरा ख्याल सिर्फ इसलिए रखते हैं कि मैं उनके ऑफिस की एक इंटर्न हूं,उनकी जिम्मेदारी हूं? लेकिन कोई बॉस अपने एक एम्प्लॉय के लिए इतना कैसे कर सकता है? मेरा ख्याल रखना मुझे किसी चीज की कमी न होने देना और अपने घर में मुझे रखा है उन्होंने, क्या बात सिर्फ एक जिम्मेदारी की है या कुछ और भी है?
सिया खुद से कई तरह के सवाल करती रही लेकिन कही न कही उसे भी अर्शित का ये रवैया पसंद आने लगा था।
बिस्तर पर लेटे लेटे सिया की आंख लग गई लेकिन रात होते ही सिया को तेज बुखार हो गया, वो नींद में भी बड़बड़ाने लगी— " स.. सर आप इतना सब कुछ क्यों कर रहे है मेरे लिए?"
जैसे ही अर्शित ने सिया की आवाज सुनी वो तुरंत सिया के पास आया और उसके सिर पर हाथ फेरते ही उसने सिया की हालत महसूस कर ली।
अर्शित रात भर जागता रहा— कभी सिया के माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखता तो कभी पूरी उसे गरम पानी पिलाता, और कभी दवा देता।
कभी-कभी बस उसे देखता रहता, जैसे यकीन करना चाहता हो कि वो सच में ठीक है।
सुबह जब उसकी आंख खुली उसने सबसे पहले सिया का बुखार देखा सिया अब पहले से ठीक थी लेकिन उसने सिया को उठाया नहीं।
जब सिया की नींद खुली तो उसने खुद को अकेला नहीं पाया।
टेबल पर नाश्ता रखा था।
और पास ही एक चिट जिसमें लिखा था। —
“खाना ज़रूर खाना और दवाई ले लेना, मै ऑफिस आ गया हूं लेकिन तुम्हे ऑफिस आने की जरूरत नहीं तुम आराम करो क्योंकि काम बाद में, तुम पहले।”
चिट पढ़ कर सिया की आंखे नम हो गई अपनी मां को याद करके वो खुद से बातें करने लगी — " मां आपके जाने के बाद पहली बार किसी ने दिल से मेरा ख्याल रखा है, आपके जाने के बाद पहली बार मैं खुश हूं।"
उसने तुरंत अर्शित को एक मैसेज किया जिसमें लिखा था — " थैंक्यू मेरा इतना ख्याल रखने के लिए"
अर्शित ने जैसे ही सिया का मैसेज पढ़ा उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।
शाम को जब अर्शित घर पहुंचा उसने देखा किचेन से आवाज आ रही वो किचेन में गया उसने देखा सिया खाना बना रही।
"तुम ये सब क्या कर रही हो, मैने तुम्हे आराम करने की छुट्टी दी है और आराम करने के लिए इस घर में लाया हूं न कि काम करने के लिए।"
अर्शित की आवाज शख्त थी लेकिन चिंता साफ झलक रही थी।
सिया ने कहा— " लेकिन सर मै अब ठीक हूँ।" आप मेरे लिए दो दिन से परेशान है इसलिए"..
अर्शित ने सिया की बात बीच में काटते हुए कहा—
"इसलिए तुम किचेन में आ गई और काम करने लगी इतनी भी ठीक नहीं हुई हो तुम अभी सिया"
उसने फिर कहा— " और तुमसे किसने कहा कि मैं तुम्हारी वजह से परेशान हूं?"
उसने सिया को अपनी तरफ किया और धीमी आवाज में कहा—
" नहीं सिया.. तुम्हारी वजह से परेशान नहीं हूं बल्कि तुम्हारी वजह से बहुत समय बाद ये घर… घर जैसा लग रहा है।”
"तुम मेरी परेशानी नही मेरे चेहरे की खुशी हो, तुमसे मेरा सुकून है"
ये सब सुनते ही सिया की आंखे भर आई उसने अर्शित को गले लगा लिया और रोने लग गई।
रात के खाने के बाद दोनों चुपचाप बैठे रहे।
दोनों खामोशी तो थे लेकिन उनके बीच की जो खामोशी थी वो सुकून भरी थी।
कुछ देर बाद सिया ने खुद से लड़ते हुए कहा—
“सर… क्या मैं कुछ पूछ सकती हूँ?”
“हम्म।”
“आप मेरे लिए इतना सब क्यों कर रहे हैं?”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“मैं सिर्फ़ आपकी कंपनी की एक इंटर्न हूँ।”
अर्शित ने गहरी सांस ली।
शायद ये सवाल वो खुद से भी पूछ रहा था।
“क्योंकि…”
वो रुका।
“जब तुम बेहोश पड़ी थीं, उस पल मुझे समझ आया—
अगर तुम्हें कुछ हो जाता…
तो मेरा सब कुछ अधूरा रह जाता।”
सिया की आँखें फैल गईं।
“मुझे नहीं पता ये कब हुआ,”
अर्शित ने सच बोलते हुए कहा।
“लेकिन तुम्हारी खामोशी, तुम्हारी मेहनत,
और तुम्हारा बिना शिकायत सब सह लेना…
मुझे तुमसे जोड़ गया।”
उसने पहली बार सिया की आँखों में सीधे देखा—
“मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, सिया।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सिया की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मुझे डर था,”
उसने टूटती आवाज़ में कहा।
“कि अगर मैंने कभी दिल की बात कही,
तो सब कुछ खो दूँगी—
नौकरी, भरोसा, आप…”
अर्शित ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
“और मुझे डर था कि अगर मैंने देर कर दी…
तो तुम्हें खो दूंगा।"
सिया ने काँपते हुए कहा—
“मैं भी आपसे प्यार करती हूँ, अर्शित सर…”
उसकी बातों में अपनापन था।
और अर्शित के चेहरे पर राहत।
खाने के बाद दोनों सोने चले गए , सुबह जब अर्शित की आंख खुली उसने देखा
सिया खिड़की के पास बैठी थी।
“तबीयत कैसी है?”
उसने सामान्य लहजे में पूछा, लेकिन आँखें जवाब ढूंढ रही थीं।
“ठीक हूँ,”
सिया मुस्कुराई।
“आपकी वजह से।”
अर्शित कुछ नहीं बोला।
बस सिर हिला दिया।
" सर मै अब ऑफिस आना चाहती हूं "
सिया ने धीमी आवाज में कहा— तभी अर्शित ने जवाब दिया—
"वो सब तो ठीक है, मैडम लेकिन पहले आप ये बताइए कि आप ये सर बोलना कब बंद करेंगी"
अर्शित की बात सुनकर सिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
अर्शित ने फिर कहा— "मुझे अब हमेशा के लिए आपकी जरूरत पड़ने वाली है, क्योंकि ऑफिस में एक नया प्रोजेक्ट आया।"
"कैसा प्रोजेक्ट ?" — सिया ने मुस्कुराते हुए पूछा।
अर्शित ने सिया को अपनी गोद में बिठाया और कहा— " हमारी शादी का"
दोनों के चेहरे में मुस्कान आ गई और दिन ने एक दूसरे को गले से लगा लिया।
ये जरूरी नहीं कि हर प्रेम कहानी कॉलेज से शुरू होकर ब्रेकअप पर खत्म हो।
कुछ कहानियाँ
ऑफिस से शुरू होती हैं…
और दिल पर खत्म।
THE END♥️
THANKS FOR READING🙏