शीर्षक: “गहराइयों में तुम”
कभी-कभी प्यार सतह पर नहीं, दिल की सबसे गहरी परतों में मिलता है…
दिल्ली की सर्द सुबहें अजीब होती हैं—धुंध से ढकी, आधी जागी हुई, जैसे शहर खुद तय नहीं कर पा रहा हो कि उसे उठना है या सोते रहना है।
आन्या मल्होत्रा बस स्टॉप पर खड़ी थी, हाथों को जैकेट की जेब में डाले, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे लिए। रात भर सो नहीं पाई थी।
आज उसका पहला दिन था।
नई नौकरी।
नया ऑफिस।
नई ज़िंदगी… शायद।
उसने खुद से कहा—
"अब पीछे नहीं देखना।"
लेकिन दिल इतनी आसानी से कहाँ मानता है।
पिछले साल की यादें अभी भी उसके अंदर गूंजती थीं—
टूटा हुआ रिश्ता।
अधूरे सपने।
और वो आखिरी वाक्य—
"तुम बहुत ज़्यादा महसूस करती हो, आन्या।"
जैसे ज़्यादा महसूस करना कोई गलती हो।
ऑफिस
“NeuroPulse Labs”।
एक बड़ी टेक कंपनी, जहाँ लोग मशीनों को इंसानों से ज्यादा समझते थे।
आन्या डेटा साइंटिस्ट थी। उसे संख्याओं से दोस्ती थी।
क्योंकि संख्याएँ धोखा नहीं देतीं।
पहले ही दिन HR ने उसे उसकी टीम से मिलवाया।
“ये हैं आरव मेहरा, आपकी टीम लीड।”
आन्या ने ऊपर देखा।
और एक पल के लिए दुनिया थम गई।
लंबा कद। हल्की दाढ़ी। आँखें… बेहद शांत, जैसे झील की गहराई।
वो मुस्कुराया नहीं।
सिर्फ सिर हिलाया।
“Welcome to the team.”
आवाज़ कम थी… मगर सीधी दिल तक पहुँची।
आरव
ऑफिस में सब उसे “रोबोट” कहते थे।
कम बोलता।
कम हँसता।
सिर्फ काम।
कोई नहीं जानता था कि उसकी खामोशी के पीछे क्या है।
आन्या ने भी नहीं।
लेकिन उसे लगा—
ये आदमी टूटा हुआ है। ठीक मेरी तरह।
पहली टक्कर
तीन दिन बाद।
रात के 10 बजे।
पूरा ऑफिस खाली।
सिर्फ दो लैपटॉप की रोशनी जल रही थी।
“तुम अभी तक गई नहीं?”
आरव ने पूछा।
“डेटा क्लीन करना था।”
“कल कर लेती।”
“कल और काम होगा।”
वो पहली बार हल्का सा मुस्कुराया।
“तुम ओवरथिंक करती हो, है ना?”
“और आप ओवरवर्क।”
दोनों चुप।
फिर दोनों हँस पड़े।
और उस हँसी ने कुछ तोड़ दिया—
वो औपचारिक दीवार, जो ऑफिस के लोग अपने बीच खड़ी कर लेते हैं।
धीरे-धीरे
दिन कॉफी में बदलने लगे।
कॉफी बातचीत में।
बातचीत आदत में।
आरव उसे देर रात घर छोड़ देता।
वो रास्ते भर रेडियो पर पुराने गाने चलाती।
एक रात उसने पूछा—
“आप हमेशा इतने शांत क्यों रहते हो?”
“क्योंकि जब बोलता हूँ… तो बहुत कुछ बोल देता हूँ।”
“और डर लगता है?”
“हाँ।”
“किससे?”
“किसी के रुक जाने से।”
उसने पहली बार उसकी आँखों में दर्द देखा।
गहरा। असली। छुपाया हुआ।
सच
एक शाम बारिश हो रही थी।
ऑफिस की छत पर दोनों खड़े थे।
आन्या ने पूछा, “आपने कभी किसी से प्यार किया है?”
आरव ने लंबी सांस ली।
“हाँ। कॉलेज में। एक्सीडेंट में चली गई।”
आन्या का दिल जैसे रुक गया।
“उस दिन से… मैंने किसी को अपने पास आने नहीं दिया।”
बारिश तेज़ हो गई।
“क्योंकि अगर फिर से खो दिया तो…?”
वो वाक्य अधूरा रह गया।
आन्या ने धीरे से कहा—
“खोने के डर से जीना छोड़ देना… ये भी तो खुद को खो देना है।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन कुछ बदल गया था।
दूरी
फिर अचानक।
आरव ने दूरी बना ली।
मैसेज का जवाब देर से।
बातें छोटी।
जैसे वो खुद को रोक रहा हो।
आन्या समझ गई।
वो डर रहा है।
लेकिन इस बार उसने भागने की जगह लड़ने का फैसला किया।
टकराव
“आप मुझसे दूर क्यों जा रहे हो?”
उसने सीधा पूछा।
“ये सही नहीं है।”
“क्या सही नहीं है?”
“मैं तुम्हें hurt नहीं करना चाहता।”
“तो पहले ही क्यों care करने लगे?”
खामोशी।
फिर वो बोली—
“मैं टूट चुकी हूँ, आरव। मुझे perfect इंसान नहीं चाहिए।
मुझे कोई चाहिए जो मेरे साथ डरते हुए भी रुके।”
उसकी आँखें भर आईं।
“आप रुक सकते हो?”
गहराई
उस रात वो पहली बार उसे गले लगा पाया।
धीरे।
संभलकर।
जैसे कोई काँच की चीज़ पकड़ रहा हो।
लेकिन वो काँच नहीं थी।
वो मजबूत थी।
और उसे पहली बार लगा—
शायद प्यार कमजोरी नहीं… ताकत है।
एक साल बाद
उसी बस स्टॉप पर।
इस बार धुंध कम थी।
आन्या मुस्कुरा रही थी।
पीछे से आवाज़ आई—
“लेट हो जाओगी।”
आरव।
दो कप कॉफी के साथ।
“तुम्हें बिना कॉफी काम नहीं होता।”
“और आपको बिना मेरे।”
वो हँसा।
इस बार खुलकर।
उन्होंने हाथ पकड़े।
और साथ चल दिए।
क्योंकि कभी-कभी…
प्यार किसी ऊँचाई पर नहीं मिलता।
वो मिलता है…
दिल की सबसे गहरी जगह में।
जहाँ डर भी होता है।
और हिम्मत भी।
Author’s Note
प्यारे पाठकों,
यह कहानी उन लोगों के लिए है जो बहुत ज़्यादा महसूस करते हैं…
जो जल्दी जुड़ जाते हैं…
जो टूटने के बाद भी प्यार पर विश्वास रखते हैं।
दुनिया आपको कहेगी कि कम महसूस करो।
लेकिन सच यह है—
जो गहराई से महसूस करते हैं, वही सच्चा प्यार जीते हैं।
अगर आपको आन्या और आरव की कहानी में अपना एक हिस्सा दिखा हो,
तो इसे अपने दिल में संभाल कर रखिए… और किसी अपने के साथ ज़रूर साझा कीजिए।
क्योंकि कहानियाँ तभी ज़िंदा रहती हैं,
जब वो दिल से दिल तक पहुँचती हैं।
ASHIN RISHI