अद्भुत थीं चुनमुन की सौगा़तें
मंटू ,जिसके बारे में मैंने पिछली पोस्ट में लिखा,के एक बच्चे का नाम हमने 'चुनमुन' रखा । सिर से पैर तक बेदाग़ ग्रे रंग। ' ऐसे रंग की बिल्ली तो कभी देखी नहीं...' जैसे वाक्य खुशी देते थे ,लेकिन उसकी क़द्र तो तब बढ़ी जब उसे पहली बार डॉक्टर के पास ले जाया गया। उसके कमज़ोर दिल को मज़बूती देने के लिए इंजेक्शन लगने लगे।जब चुनमुन डॉक्टर के हाथों में पहुंचती,तभी वह उसकी बीमारी से कहीं ज़्यादा उसके विदेशी घराने की टोह लेने में लग जाता था।
मंटू की बेटी होने के हमारे सच को वह बड़े अविश्वास से सुनता था। उसके हिसाब से वह विदेशी ब्रीड थी । उसकी जिज्ञासा का अंत ही नहीं था। उसके अनुसार चुनमुन के कमज़ोर दिल को सम्भालने के लिए हर समय मेडिकल देखरेख और बहुत पैसे की ज़रूरत थी और डॉक्टर होने के नाते वह दोनों तरह से ही अपने को सक्षम मानता था। उसकी व्यवसायिक बुद्धि कल्पनाओं का ताना -बाना बुनने लगती थी।
चुनमुन के बच्चे बेचने,हमें एक फ्री में देने जैसी उसकी बातों से आशंकित होकर घर के सभी सदस्य मेरे टीनएज बेटे को अपने अलग शब्दों और स्वर में एक ही हिदायत देते रहते थे... ' कहीं डॉक्टर की बातों में न आ जाना...।' इत्तिफ़ाक़ कि चुनमुन का सा रंग रूप न उसके भाई - बहनों को मिला और न ही उसके अपने किसी बच्चे को । रंग के अलावा उसकी कुछ हरकतें भी हमारी दृष्टि में असामान्य थीं ।चुनमुन को साफ़ रहना है तो नहाना भी होगा ।इतना ही हमें ज्ञान था। नहाते हुए उसका बाग़ी हो जाना ,किसी ज़रूरी दवा की तरह उसे दो -चार थप्पड़ मिलना, विरोध और गुस्से के बाद भी उसका सजग रहना कि उसके नाखून से मेरी बेटी को नुकसान न पहुॅंच जाए...यह आए दिन की कहानी थी।अनजाने में पड़े उसके पंजों के छुटपुट निशान जब उसे डाॅंटकर दिखाए जाते थे, उस समय की उसकी मासूमियत को काश हम कैमरे में कैद कर पाते!
अपने बच्चों को एक निश्चित जगह पर ही रखने की चुनमुन की ज़िद्द,उनके मरने के डर से उन्हें उसके मुॅंह से खींचकर सुरक्षित जगह पर रखा जाना और उसका कोई बच्चा छिपा लिया गया है,इस आशंका में उसका देर तक सबकी तलाशी लेते रहना...यह खेल दिन में कई बार तब तक दोहराया जाता रहा,जब तक उसके बच्चे बड़े नहीं हो गए।
अपनी निजी और सामूहिक चुनौतियों के बीच हममें से किसीके पास भी चुनमुन के लिए न अधिक समय था और न ही तब तक किसी pet को रखने का तजुर्बा ।बिल्लियों की बढ़ती संख्या किसीके लिए भी तनाव का कारण हो सकती थी। हमारे लिए भी थी।चुनमुन के अलावा किसीने भी उसके किसी बच्चे को लेने की उत्सुकता दिखाई हो,याद नहीं पड़ता। बच्चों को कहीं छोड़ आना चाहिए ,इतनी समझ हमको नहीं थी।मुझे तो लगता है कि अपनी सुरक्षा की आश्वस्ति के साथ जिस तरह मंटू कभी मेरी गोद में आकर बैठ गयी थी,उसके उसी भरोसे के बने रहने के लिए स्वत: ही उसके कुनबे के प्रबंध होते चले जा रहे थे।
प्रमाणत:हमारे एक किराएदार की बदनीयती के कारण हमारे घर के साथ में ही चुनमुन के सभी बच्चों का प्रबंध हो गया था। एक कमरे को ताला लगाकर वह गायब हो गया । चुनमुन के परिवार को रहने को जगह मिली और हमें चैन।
चुनमुन को न अपने नये ठिकाने से और न ही अपने बच्चों से कोई लगाव था।अब अकेली वह थी जो हमारे घर के ऑंगन में किसी बड़े की तरह निगरानी करती हुई इस तरह बैठा करती थी कि पूरे घर पर उसकी नज़र बनी रहे।उसे परखने के लिए हम कई बार आपस में हिंसक होने का अभिनय करते ।किसीका हाथ भी अगर उठा तो वह दौड़कर हमारे बीच में।उस समय उसका गुस्सा भी देखने लायक होता था।
अपनी माॅं मंटू की तरह वह न यायावर, न दुस्साहसी, सिर्फ़ उसकी तरह अनुशासित और हमारे लिए अपनी माॅं से कहीं ज़्यादा स्नेह रखने वाली।उसका ऐसा प्यार जिसने हमारे लिए मुसीबतें ही पैदा कीं।अभिभूत होना चाहती हूँ,लेकिन आज भी नहीं हो पाती।घर से बाहर उसे अपनी पसंद का कुछ भी दिखाई देता ,उसे मुॅंह में दबाए , छत और दीवारों जैसी सभी बाधाएं पार करके जहाॅं हम होते वहाॅं उस तोहफ़े को लाकर वह हमारे सामने रख देती थी। बाद में तो उसकी अलग तरह की आवाज़ों से अनुमान होने लगा था कि आज हमारा खजाना उसके लाए किसी इनाम से भरने वाला है।कुछ दिन तक किसी बच्चे की दूध की बोतल ले आने का क्रम चला। पड़ोस की छत से उठाना,मुंह में दबाना, ज़मीन से टकराती बोतल की ठकठक आवाज़ और उसमें मिलता हुआ उसका अजीब स्वर। हम सो रहे हैं तो भी क्या। तोहफ़ा हमारे करीब रखकर ,उसकी सुरक्षा के लिए वह बैठी रहती थी। शायद हमारा पेट भरने का आत्मसुख जी रही होती होगी। जिस बच्चे की बोतल वह लेकर आती थी,उसकी माॅं पहली बार असमंजस में,दूसरी बार चोर की तलाश में और तीसरी बार शिकायत के मूड में आ चुकी थी। हम विवश थे। शिकायतकर्ता को ही हमने कई उपाय सुझा डाले। दिन भर की थकी- मांदी बेचारी माॅं बच्चे के रात के अंतिम आहार के साथ खुद भी सो जाती होगी और दूध खत्म होने पर नींद में ही बोतल को किनारे रख देती होगी ।चुनमुन की हरकतों के बाद बोतल को चुनमुन की पहुंच से बाहर रखने के लिए वह किसी सजग प्रहरी की तरह दूध के ख़त्म होने तक जागने लगी थी।अंततः यह क्रम टूटा।
चुनमुन के साथ के अनुभव की अंतिम परिणति अभी बाकी है।उसके बिना तो यह संस्मरण ही अधूरा है।उस दिन भी एक बड़ी सी मेज़ के सामने मैं और मेरे चारों ओर पढ़ने वाले बच्चे। सुबह-सुबह वही अलग आवाज़।मुॅंह में कुछ दबा होने के कारण दूर से चलकर आने में उसे शायद तकलीफ़ होती थी। ऐसा भी सम्भव था कि उसकी आवाज़ उस खुशी का प्रतीक हुआ करती थी कि उसने भी हमारे लिए कुछ किया है। काश! वह बोल पाती और हमें बता सकती । जो कुछ सामने था,वह कल्पनातीत था।एक आधा -अधूरा मोटा चूहा।पढ़ने वाले विद्यार्थियों से उसे कोई मतलब नहीं था।मेरे पैर थे,उसकी रखी सौग़ात थी और कदमों में बैठी हुई वह थी। मुझे आज भी उस लड़के का चेहरा याद है।यह भी याद है कि शहर में उसने मोटर बाइक का नया शोरूम खोला था।नाम याद नहीं। अगर फेसबुक पर वह हो और पढ़ सके तो जान ले कि कृतज्ञता के उस पल को मैं आज भी भूली नहीं हूँ।वही था जो मेरी मन:स्थिति को समझ पाया।उसने ही उस अवांछित तत्व को वहाॅं से हटाने की मदद की।
शेष कहने को बचा नहीं है। मैंने ज़ोर- शोर से पहली बार उस दिन घोषणा की थी कि या तो इस स्नेह- वृष्टि का समाधान ढूॅंढा जाए या वह विदेशी लगती है,दुर्लभ है, हमसे लगाव रखती है....यह सब भूलकर उसका प्रबंध कर दिया जाए।आज ऐसा भी सोचती हूँ कि घर में सबने चुनमुन को लेकर अघोषित दायित्व सम्भाल लिए थे। उसे नहलाना,डाॅंटना,उसके परिवार को सुरक्षा देना... बेटी के ज़िम्मे,उसका स्वास्थ्य बेटे का दायित्व,उसका आहार घर की अन्नपूर्णा का कार्यक्षेत्र...एक मैं ही थी जो उससे डरती भी थी और मेरी ऑंखों में उसे कोई रागात्मकता भी दिखाई नहीं देती थी। क्या मुझे खुश करने के लिए वह ऐसा उपहार मुॅंह में दबाकर मेरे लिए ही लेकर आई थी? या उस समय घर में मैं अकेली थी,इसलिए मुझे कृतार्थ करना उसकी मज़बूरी का हिस्सा था।
अपने रंग रूप और अपनी सम्वेदनाओं में वह विरली ही बिल्ली थी। मैंने अभी तक न वैसा रंग देखा और न ही ऐसा प्रेम भाव सुना।