Room No. 302 in Hindi Thriller by Prashanth books and stories PDF | कमरा नंबर 302

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कमरा नंबर 302

रात के ठीक 2:17 बजे अद्भुत की नींद अचानक टूट गई। पंखा चल रहा था, लेकिन कमरे में हवा नहीं थी, सिर्फ़ एक अजीब-सी घुटन थी, जैसे दीवारें धीरे-धीरे पास आ रही हों। उसका गला सूखा हुआ था और दिल बिना वजह तेज़ धड़क रहा था। उसने करवट बदली ही थी कि मोबाइल स्क्रीन अपने आप जल उठी। स्क्रीन पर लिखा था— “आज फिर वही सपना आएगा।” अद्भुत सिहर गया, क्योंकि यह मैसेज उसने खुद को नहीं भेजा था। पिछले सात दिनों से हर रात यही हो रहा था—एक चेतावनी, और फिर वही डरावना सपना।सपने में वह हमेशा एक बंद कमरे में होता था। दीवारों पर गहरे खरोंच के निशान, फर्श पर सूखा हुआ खून और कोने में बैठा एक इंसान, जिसका चेहरा कभी दिखाई नहीं देता था। बस एक भारी, डरावनी आवाज़ आती— “तू देर कर रहा है।” उसी आवाज़ के साथ अद्भुत की नींद टूट जाती थी, पसीने से लथपथ और सांसें बेकाबू।मोबाइल फिर वाइब्रेट हुआ। इस बार अनजान नंबर से मैसेज आया— “कमरा तुम्हें याद कर रहा है।” अद्भुत के हाथ काँपने लगे। उसने घबराकर कॉल लगाया, लेकिन सामने से सिर्फ़ रिकॉर्डेड आवाज़ आई— “नंबर स्विच ऑफ है।” उसी पल कमरे की लाइट झपकने लगी। पंखा अचानक रुक गया और सन्नाटा गहरा हो गया। तभी दरवाज़े पर किसी के नाखून रगड़ने की आवाज़ आई—ठक… ठक… ठक। डर के मारे उसका शरीर जड़ हो गया।कुछ सेकंड बाद दरवाज़े के नीचे से एक काग़ज़ धीरे-धीरे अंदर सरक आया। अद्भुत ने काँपते हाथों से काग़ज़ उठाया। उस पर लिखा था— “कमरा नंबर 302। तू वहाँ था। और तूने ही दरवाज़ा बंद किया था।” यह पढ़ते ही उसका दिल बैठ गया। वह तो दूसरी मंज़िल पर, कमरा नंबर 201 में रहता था। फिर 302 कहाँ था? तभी उसे मकान मालिक शेखर वर्मा की चेतावनी याद आई— “तीसरी मंज़िल खाली है। वहाँ मत जाना… लोग बीमार पड़ जाते हैं।”डर के बावजूद अद्भुत सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। हर कदम के साथ उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। तीसरी मंज़िल पर पहुँचते ही अजीब बदबू और गहरा सन्नाटा मिला। सामने कमरा नंबर 302 था। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था, जैसे कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो। उसने हिम्मत करके दरवाज़ा धक्का दिया। अंदर का नज़ारा देखकर उसकी सांस अटक गई—दीवारों पर वही खरोंचें, फर्श पर खून के पुराने निशान और कोने में रखी एक खाली कुर्सी।अचानक उसके पीछे से फुसफुसाती आवाज़ आई— “तू आ ही गया।” अद्भुत पलटा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसी पल दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया। मोबाइल स्क्रीन जली और आख़िरी मैसेज उभरा— “खेल शुरू हो चुका है।” उसी क्षण उसके दिमाग में तीन साल पुरानी एक घटना, एक गायब इंसान और उसका अधूरा बयान घूम गया। दीवारों पर जैसे खून से शब्द उभर आए— “झूठ मत बोल।” अद्भुत समझ चुका था कि यह सिर्फ़ सपना नहीं है। यह उसका अतीत है, जो अब उसे छोड़ने वाला नहीं।आगे क्या होगा…?क्या अद्भुत अपने दबाए हुए सच का सामना कर पाएगा, या कमरा नंबर 302 उसकी ज़िंदगी निगल जाएगा?अद्भुत को एहसास हो चुका था कि यह सब अचानक नहीं हो रहा। हर घटना उसके अतीत से जुड़ी हुई थी। यह कमरा किसी सज़ा की तरह था, जो धीरे-धीरे उसे तोड़ रहा था। बाहर निकलने का रास्ता शायद सच बोलने से ही खुलेगा।