Sunya Se Sikhar tak: Ek Ajey Sangharsh ki Gatha in Hindi Motivational Stories by Nimesh Gavit books and stories PDF | शून्य से शिखर तक: एक अजेय संघर्ष की गाथा

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शून्य से शिखर तक: एक अजेय संघर्ष की गाथा

एक छोटा सा गाँव था 'रामपुर', जहाँ अमीरी और गरीबी के बीच एक गहरी खाई थी। गाँव के एक कोने में एक जर्जर झोपड़ी थी, जिसकी दीवारें मिट्टी की बनी थीं और छत सूखी घास की। इसी झोपड़ी में १० साल का रामू अपनी माँ, सावित्री के साथ रहता था। रामू के पिता एक मज़दूर थे, जो एक साल पहले एक बड़ी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गए थे। पीछे छोड़ गए थे तो बस एक बूढ़ी माँ की बीमारी और कर्ज का बोझ।​

रामू की हालत ऐसी थी कि उसके शरीर पर जो कपड़े थे, उनमें अनगिनत पैबंद लगे थे। ठंड के दिनों में वह फटे हुए बोरे ओढ़कर सोता था। गाँव के बच्चे जब नई साइकिलों पर स्कूल जाते, तो रामू चुपचाप किनारे खड़ा होकर उन्हें देखता। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक चमक थी। वह अपनी माँ से कहता, "माँ, एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा।" माँ बस उसकी सूखी रोटी के टुकड़े को पानी में डुबोकर उसे खिलाती और कहती, "बेटा, ईमानदारी और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।"

​अध्याय ૨: शहर का सफर और पहली ठोकर
​गाँव में काम मिलना मुश्किल था, इसलिए रामू ने शहर जाने का फैसला किया। १० साल की उम्र में वह एक मालगाड़ी के डिब्बे में छिपकर शहर पहुँचा। शहर की चकाचौंध देखकर वह दंग रह गया, लेकिन जल्द ही उसे हकीकत का पता चला। शहर में कोई किसी का नहीं था। पहले तीन दिन उसने रेलवे स्टेशन के नल का पानी पीकर काटे।

​तीसरे दिन, उसे एक हलवाई की दुकान पर बर्तन मांजने का काम मिला। वहाँ उसे बचा-कुचा खाना मिलता और फुटपाथ पर सोने की जगह। रामू का दिमाग बहुत तेज़ था। वह बर्तन मांजते-मांजते गौर से देखता कि दुकानदार ग्राहकों से कैसे बात करता है। वह समझ गया कि बिज़नेस में 'जुबान' और 'भरोसा' सबसे बड़ी पूंजी है। एक दिन हलवाई ने उसे बिना गलती के डांटा और काम से निकाल दिया। रामू रोया नहीं, उसने अपनी छोटी सी पोटली बांधी और निकल पड़ा अपनी किस्मत खुद लिखने।

​अध्याय ૩: संकट में अवसर की तलाश
​शहर में चिलचिलाती धूप पड़ रही थी। दोपहर के २ बज रहे थे और तापमान ४५ डिग्री के पार था। रामू ने देखा कि लोग स्टेशन के बाहर प्यास से बेहाल थे। सरकारी नल पर लंबी लाइन थी। रामू के पास कुल जमा २० रुपये थे, जो उसने बर्तन मांजकर बचाए थे। उसने उन रुपयों से एक बड़ा मिट्टी का घड़ा और कुछ डिस्पोजेबल ग्लास खरीदे।

​वह पास के मंदिर के ठंडे कुएं से पानी भरकर लाया। उसने अपनी छोटी सी दुकान सड़क के किनारे लगाई और आवाज़ दी— "दो रुपये में ठंडा जल!" शहर के रईस लोग जो बोतलबंद पानी नहीं खरीदना चाहते थे, वे रामू के पास आने लगे। रामू पानी पिलाने के बाद हर ग्राहक को हाथ जोड़कर "धन्यवाद" कहता। शाम तक उसने १०० रुपये कमा लिए थे। यह उसकी ज़िंदगी का पहला 'प्रॉफिट' था। उसने सीखा कि जब आप दूसरों की समस्या का हल (Solution) ढूँढते हैं, तो पैसा अपने आप आता है।

​अध्याय ૪: छोटा कदम, बड़ी छलांग
​रामू ने अब सिर्फ पानी नहीं बेचा। उसने देखा कि बस स्टैंड पर लोग अखबार और पत्रिकाएं ढूँढते हैं। उसने सुबह अखबार बेचना शुरू किया, दोपहर में पानी और शाम को चाय की दुकान पर मदद करता। वह दिन में १८ घंटे काम करता था। उसने फटे कपड़ों की जगह एक साधारण लेकिन साफ कुर्ता सिलवाया।

​एक दिन, शहर के एक बड़े अनाज व्यापारी 'सेठ गिरधारीलाल' की गाड़ी खराब हो गई। रामू पास ही खड़ा था। उसने अपनी चतुराई से देखा कि गाड़ी के टायर के नीचे एक पत्थर फंसा है। उसने अपनी ताकत लगाकर पत्थर हटाया और गाड़ी को धक्का दिया। सेठ खुश हुए और उसे इनाम देना चाहा। रामू ने कहा, "सेठ जी, इनाम नहीं, मुझे आपके गोदाम में काम चाहिए।" सेठ उसकी आँखों में सच्चाई देखकर मना नहीं कर पाए।

​अध्याय ૫: व्यापार की बारीकियां और ईमानदारी
​गोदाम में रामू को हिसाब-किताब रखने का काम मिला। वह रात-रात भर जागकर पुराने बहीखाते पढ़ता और बाज़ार के भाव को समझता। उसने देखा कि अनाज का भाव बारिश के समय बढ़ जाता है। उसने सेठ को एक नया सुझाव दिया कि हम अनाज को गाँव के किसानों से सीधे खरीदें ताकि मुनाफा बढ़े। सेठ को छोटे बच्चे का यह विचार पसंद आया।
​रामू ने ३ साल तक वहाँ काम किया और बिज़नेस की हर बारीकी सीख ली। उसने अपने बचाए हुए पैसों से अपनी माँ का इलाज कराया और गाँव में छोटी सी जमीन खरीदी। लेकिन उसका सपना अभी भी अधूरा था। वह नौकर नहीं, मालिक बनना चाहता था।

​अध्याय ૬: रामू से 'रामू सेठ' तक का सफर
​रामू ने अपनी खुद की एक छोटी सी होलसेल दुकान खोली। उसने तय किया कि वह कभी मिलावट नहीं करेगा। शुरुआत में बहुत घाटा हुआ क्योंकि दूसरे दुकानदार सस्ता और मिलावटी सामान बेचते थे। लेकिन रामू अपनी बात पर अड़ा रहा। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि 'रामू की दुकान' पर सामान सबसे शुद्ध मिलता है।

​उसकी एक दुकान से दो हुई, दो से चार। उसने अब अपना खुद का ब्रांड शुरू किया— "सावित्री गृह उद्योग", जो उसकी माँ के नाम पर था। उसने गाँव की गरीब और विधवा महिलाओं को काम पर रखा। जो रामू कभी फटे कपड़ों में झोपड़ी में रहता था, आज उसकी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में था। उसने शहर के सबसे महंगे इलाके में घर बनाया, लेकिन अपनी पुरानी झोपड़ी को कभी नहीं गिराया। वह उसे अपनी 'मेहनत का मंदिर' मानता था।

​अध्याय ૭: सफलता का असली अर्थ
​आज रामू ४૦ साल का है। उसके पास लग्जरी कारें हैं, विदेश में बिज़नेस है और हज़ારો कर्मचारी हैं। लेकिन वह आज भी ज़मीन पर बैठकर खाना खाता है। उसने अपने गाँव में एक विशाल अस्पताल और एक मुफ्त स्कूल खोला है। स्कूल के बाहर एक बोर्ड लगा है— "गरीबी आपकी हार नहीं, बल्कि आपकी जीत की शुरुआत है।"

​रामू की कहानी हमें सिखाती है कि साधन कम हों तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर संकल्प बड़ा हो, तो किस्मत को भी घुटने टेकने पड़ते हैं। शून्य से शिखर तक का यह सफर केवल पैसों का नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और कड़ी मेहनत का था।