Billi jo Insaan banti thi in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | बिल्ली जो इंसान बनती थी

Featured Books
Categories
Share

बिल्ली जो इंसान बनती थी



Heroine: शानवी सिंह
Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान)

शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था।
बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात होते ही सन्नाटा उसकी छाती पर बैठ जाता।
फोन में न कोई मैसेज, न किसी की कॉल। बस दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक।

उस दिन भी ऑफिस से लौटते हुए उसने खुद से कहा —
अब और नहीं… मुझे कोई चाहिए।

और उसी शाम, वो एक बिल्ली ले आई। एक सफेद सा, बहुत मासूम सा बिल्ली का बच्चा। उसकी आंखें अजीब सी गहरी थीं… जैसे कुछ कहना चाहती हों। वो बहुत प्यासा था।
कटोरे में दूध रखते ही ऐसे पीने लगा जैसे कई दिनों से कुछ मिला ही न हो।

शानवी (उसके सिर पर हाथ फेरते हुए) बोली —
तुम्हें क्या नाम दूँ?

बिल्ली ने बस उसे देखा। टुक… टुक… बिना पलक झपकाए।
“टुक टुक…”
नाम उसके मुंह से अपने आप निकल गया।
अजीब बात ये थी कि बिल्ली ने नाम सुनते ही हल्की सी आवाज निकाली, जैसे समझ गया हो। उस रात शानवी को पहली बार अपने कमरे में डर नहीं लगा।
लेकिन उसे क्या पता था…

👉 रात होते ही, वही बिल्ली… इंसान बन जाती थी।
और ये रहस्य…उसकी ज़िंदगी बदलने वाला था।

रविवार का दिन था। शानवी को कहीं जाने की जल्दी नहीं थी।
आज उसका पूरा दिन… उसी सफेद बिल्ली के नाम था।
सुबह से ही वो उसके आगे-पीछे भागती रही।
कभी उसे दूध देती, कभी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े तोड़कर खिलाती, कभी प्यार से उसकी पीठ सहलाती, और दिन में एक बार तो उसे नहला भी दिया।
बिल्ली… या यूँ कहो बिल्ला… बहुत ही शांत था।
बस पूरे दिन “म्याऊँ… म्याऊँ…”करता रहता।
जैसे शानवी से बातें कर रहा हो। सबसे अजीब बात ये थी कि वो कहीं भागता नहीं था। न परदे पर चढ़ता, न चीज़ें गिराता।
बस शानवी के आसपास ही घूमता रहता।
और जब थक जाता… तो चुपचाप आकर उसकी गोद में सिर रखकर सो जाता। शानवी उसके सिर पर उंगलियाँ फेरते हुए मुस्कुरा देती। उसे बहुत समय बाद ऐसा सुकून मिला था।

शानवी बोली - 
तुम सच में बहुत अच्छे हो, टुक टुक…

बिल्ला ने आँखें खोलीं। उसे देखा। और एक पल के लिए…
ऐसा लगा जैसे उसकी आँखों में कोई इंसानी समझ झलक गई हो। पर शानवी ने इसे अपना वहम समझकर नजरअंदाज कर दिया।

शाम ढल गई… कमरे में अंधेरा धीरे-धीरे फैलने लगा।
और उसी अंधेरे के साथ…एक रहस्य भी जागने वाला था।

रात हो चुकी थी।
पूरा दिन खेलने और भाग-दौड़ में शानवी थक गई थी।
उसने सफेद बिल्ले को अपने साइड में सुला लिया और बिना किसी चिंता के… गहरी नींद में डूब गई। कमरे में बस दीवार घड़ी की आवाज थी…टिक… टिक… टिक…और फिर…⏰ रात के ठीक 12 बजे।
अचानक कमरे की हवा बदलने लगी। वो सफेद बिल्ला…
हल्की सी चमक में घिर गया।
और देखते ही देखते… एक इंसान में बदल गया।
एक खूबसूरत सा, राजकुमार जैसा लड़का।
चेहरा मासूम, आँखों में गहरी उदासी और सुकून का अजीब सा मेल। वो… कार्तिकेय था। वो कुछ पल वहीं बैठा रहा।
फिर धीरे से शानवी की तरफ देखा।
वो उसकी बगल में लेटी थी…बेफिक्र, मासूम, चैन की नींद सोती हुई। कार्तिकेय के होठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई।

कार्तिकेय बोला - 
कितनी सुकून से सो रही है…

फिर अचानक उसे याद आया…

कार्तिकेय ( खुद से )बोला - 
मैं इंसान हूँ… और अगर इसे पता चल गया… तो ये डर जाएगी।

उसकी आँखों में हल्की सी तकलीफ उतर आई। वो धीरे से खड़ा हुआ…बिना कोई आवाज किए।

वो बोला - 
जब तक सुबह चार नहीं बजते… मुझे यहाँ से दूर रहना होगा…।

और वो चुपचाप कमरे से बाहर चला गया। शानवी को ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ…कि जिस बिल्ले को वो अपनी गोद में सुलाकर सोई थी...वो असल में एक इंसान है।

और ये रात…उन दोनों की किस्मत की पहली रात थी। रात का सन्नाटा गहरा था। बाहर सड़कें सूनी थीं। कार्तिकेय छत पर बैठा आसमान देख रहा था। उसकी नजरें बार-बार घड़ी की तरफ चली जाती थीं।

⏰ 3:50…

कार्तिकेय बोला - 
अब लौटना होगा…

वो जल्दी से नीचे उतरा और बिना किसी आवाज के शानवी के कमरे में आ गया। ⏰ ठीक 4 बजे। जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा…उसका शरीर फिर से हल्की रोशनी में घिर गया।
हड्डियाँ सिमटने लगीं…कद छोटा होने लगा…और कुछ ही पलों में…
वो फिर से वही सफेद सा मासूम बिल्ला बन चुका था।
वो जल्दी से जाकर शानवी के पास उसकी साइड में लेट गया।
बिल्कुल वैसे ही…जैसे पहले सोया था। शानवी नींद में ही थोड़ी सी हिली। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

वो बुदबुदाई - 
अजीब है…

उसे लगा जैसे…कोई उसके पास से होकर गया हो
कमरे में हल्की सी ठंडी हवा चली हो
और तकिये की जगह भी… थोड़ी बदली हुई लग रही थी
उसने आँखें खोलीं। कमरा वैसा ही था। पास में वही सफेद बिल्ला चैन से सो रहा था। उसने उसके सिर पर हाथ रखा।

वो बोली - 
शायद सपना देखा होगा…

लेकिन उसका दिल…किसी अनजाने डर से थोड़ा सा तेज़ धड़क रहा था। और कार्तिकेय…बिल्ली बनकर उसकी गोद में लेटा हुआ…सब कुछ समझ रहा था।