वह अजीब निशान और सुबह का हंगामा
प्रस्तावना: वह खूनी रात (सपना)
अंधेरा... सिर्फ घना अंधेरा और चारों तरफ खून की गंध।
यह एक विशाल साम्राज्य की कालकोठरी, जहाँ की दीवारों पर कभी सोने की नक्काशी होती थी, आज वहां सिर्फ लोहे की जंजीरों की खनखनाहट थी। वह सम्राट, जिसके एक इशारे पर लाखों तलवारें उठ जाती थीं, आज मजबूत जंजीरों ने हाथों को जकड़ा हुआ था। उसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने अपनी शक्ति से ज्यादा अपने परिवार के भाइयों पर भरोसा किया। उसके भाइयों ने उसकी दयालुता को कमजोरी समझा और सत्ता के लालच में उसे धोखा दिया।
सम्राट और महारानी को राजकुमार के आंखों के सामने तड़पाया जा रहा था। लेकिन सबसे भयानक दृश्य तो कुछ और ही था।
सम्राट महारानी के सामने कुछ दूर पर सामने फर्श पर खून से लथपथ एक युवा राजकुमार पड़ा था। उसका शरीर खून के घावों से भरा था, लेकिन उसकी आँखों में दर्द से ज्यादा हैरानी थी। उसके सामने वह लड़की खड़ी थी जिसे उसने अपनी जान से ज्यादा चाहा था यह उसकी प्रेमिका थी।"क्यों?"
राजकुमार के सूखे होंठों से बस यही निकला। लड़की ने हल्के से हंसते हुए कहा, "मेरी जान? तुम्हें क्या लगा की मैं तुमसे प्यार करती हूं? मैं तो केवल तुम्हारी शक्ति, तुम्हारे धन और उस 'गुप्त वस्तु' के लिए तुम्हारे पास आई थी। मेरा दिल तो किसी और के पास है।"
तभी पास ही में राजकुमार की बचपन की दोस्त, जो अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी, पेट के बल रेंगते हुए उसकी ओर बढ़ी। उसकी आँखों में आंसू थे। लेकिन उसने राजकुमार का हाथ थामने की कोशिश की और कहा की "राजकुमार... मैंने... मैंने हमेशा तुमसे प्यार किया। बचपन से लेकर अब तक पर कभी तुमसे कह नहीं पाई... काश मैं तुम्हें बचा पाती..." और उसकी गर्दन लुढ़क गई। वह अपने सच्चे प्यार का इज़हार करते हुए दुनिया से चली गई।
राजकुमार जोर से चीखना चाहता था, लेकिन उसका गला भर आया। उसे तड़पा-तड़पा कर मारा जा रहा था क्योंकि उसके पास एक ऐसी 'गुप्त शक्ति' थी जो उसके धोखेबाज परिवार और उसकी प्रेमिका के परिवार को चाहिए थी। वह राज, जो उसने केवल अपने माता-पिता और उस धोखेबाज प्रेमिका को बताया था।
अंत में, प्रेमिका ने एक भारी तलवार उठाई। "अब तुम अपनी जिंदगी की आखरी सांस लो, और तुम्हारी शक्ति मेरी होगी तथा तुम्हारा सब कुछ मेरा होगा।"
और तलवार चली एक ही वार में, राजकुमार का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। सब कुछ शांत हो गया।
"स्थान: पृथ्वी (Earth)"
भारत का एक मध्यम वर्गीय शहर।
समय: सुबह के 6:30 बजे।
"नहीं!!!"
विराज एक झटके में अपने बिस्तर पर उठ बैठा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और सांसे जोर-जोर से चल रही थी जैसे की लोहार की धौंकनी की चल रही हों। कमरे में एसी चल रहा था, फिर भी उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं।
विराज ने कांपते हुए हाथों से पानी का जग उठाया और एक ही सांस में पी गया। "वही सपना... फिर से," पहले तो कभी कभार आते थे परंतु अब बहुत ज्यादा आने लगे हैं ऐसा लग रहा है कि यह सपने दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। वह बड़बड़ाया। "आज तो यह बहुत ज्यादा साफ महसूस हुआ था। वह दर्द... वह धोखा... सब कुछ इतना असली क्यों लगता है?"
विराज, जो आज 20 वर्ष का हो गया था, अपने घर का सबसे छोटा और लाडला बेटा था। मध्यम वर्गीय परिवार का, पिता सोहनलाल का कपड़ों का छोटा सा व्यवसाय था और माँ सुमित्रा देवी एक कुशल गृहिणी थीं। चार बड़ी बहनों के बाद, बड़ी मन्नतों और पूजा-पाठ के बाद विराज का जन्म हुआ था, इसलिए वह घर में सबकी आँखों का तारा था।
वह बिस्तर से उठा और सीधे आईने के सामने गया। आईने में एक बेहद आकर्षक युवक का प्रतिबिंब था तीखी नाक, गहरी काली आँखें और गठीला बदन। वह इतना सुंदर था कि राह चलते लोग मुड़कर उसे देखते थे। विराज ने अपनी टी-शर्ट उतारी और अपनी छाती के ठीक बीच में देखा।
वहाँ बचपन से एक बड़ा लाल तिल था। लेकिन आज... आज वह कुछ अलग अजीब सा महसूस हो रहा था।
"यह क्या है?" विराज ने अपनी उंगली से उस तिल को छुआ।
वह तिल अब सिर्फ लाल नहीं था। वह हल्का-हल्का घूम रहा था, जैसे कोई छोटा सा प्रकाश पुंज हो। उसमें अजीब से प्राचीन रूढ पैटर्न बन रहे थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे अजीब से पैटर्न में घूम रहा हो। विराज ने बहुत गौर से देखा, तभी उसे लगा कि उसके लाल निशान के अंदर से मंद-मंद सुनहरा प्रकाश निकल रहा है। उसे महसूस हुआ कि उसके शरीर के अंदर एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ रही है, एक ऐसी गर्मी जो उसे जला नहीं रही थी, बल्कि ताकत दे रही थी।
उसने पहले भी अपने माता-पिता एवं बहनों को यह दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें यह एक साधारण तिल के सिवाय और कुछ नहीं दिखता था। "शायद मेरी आँखों का भ्रम है," उसने खुद को समझाया, लेकिन अंदर ही अंदर वह जानता था कि यह साधारण नहीं है।
तभी नीचे से माँ की आवाज़ आई, "विराज! ओ विराज! नीचे आ जा बेटा, आज तेरा जन्मदिन है, कब तक सोएगा? कॉलेज नहीं जाना?"
विराज ने जल्दी से अपना ध्यान हटाया, "आ रहा हूं माँ!"
विराज जल्दी से बाथरूम में घुसा और और जल्दी से वह फ्रेश हुआ। जब वह नहा रहा था, उसने महसूस किया कि पानी की बूंदें उसके शरीर पर गिरने से पहले ही हवा में एक पल के लिए रुक सी रही थीं, लेकिन उसने इसे अपने मन का भ्रम समझकर नजरअंदाज कर दिया।
जब वह तैयार होकर वह नीचे खाने की टेबल पर पहुँचा, तो वहाँ पहले से ही पूरे परिवार की महफ़िल जमी हुई थी।
पिताजी अखबार पढ़ रहे थे, और उसकी चारों बहनें रिया, कोमल, शिखा और टीना चाय पी रही थीं। और जैसे ही विराज आया, सबने एक सुर में कहा, "हैप्पी बर्थडे हीरो!"
विराज मुस्कुराया और अपने माता-पिता के चरणों को छुए और उनसे आशीर्वाद लिया तभी वह जैसे ही कुर्सी पर बैठने ही वाला था कि तभी घर का मुख्य दरवाजा धड़ाम से खुला।
एक तूफ़ान की तरह अंदर आई "काव्या।"
काव्या, उनके पड़ोस में रहने वाली बेहद खूबसूरत और चुलबुली लड़की। बड़ी-बड़ी आँखें, लंबे बाल और चेहरे पर हमेशा एक शैतानी मुस्कान। वह विराज के पास वाली खाली कुर्सी पर ऐसे बैठ गई जैसे वह उसका ही घर हो। काव्या और विराज बचपन से साथ बड़े हुए थे और दोनों परिवारों के बीच गहरा रिश्ता था।
काव्या ने विराज की थाली से एक परांठा उठाया और खाते हुए बोली, "हैप्पी बर्थडे मिस्टर अकड़ू! आज तैयार हो जाओ, मैं तुम्हें अपनी स्कूटी पर कॉलेज छोड़ने चलूँगी।"
विराज ने माथा पीट लिया, "काव्या, मैंने हजार बार कहा है, तुम मेरे साथ कॉलेज मत आया कर। तू इतना बकबक करती है कि मेरा सिर दर्द हो जाता है। और ऊपर से पूरे कॉलेज के लड़के मुझे ऐसे घूरते हैं जैसे मैंने उनकी जायदाद हड़प ली हो।"
काव्या ने अपने कान के पास के बालों को नखरे से बालो झटका दिया, "हूँह! वे सब जलते हैं क्योंकि मैं तुम्हारे साथ होती हूँ। तुम्हें पता है न, मैं कॉलेज की 'ब्यूटी क्वीन' हूँ? आधे लड़के मेरे पीछे लट्टू हैं, और मैं... मैं तुम्हारे पीछे पड़ी हूँ। और तुम हो कि भाव खाते रहते हो।"
विराज ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए कहा, "हाँ, तो उन आधे लड़कों में से किसी एक को चुन ले ना। मेरा तो पीछा छोड़।"
काव्या का मुँह बन गया। उसने तुरंत अपना पैंतरा बदला और मासूम सा चेहरा बनाकर विराज की माँ की ओर देखा। "आंटी! देखिए न इसे। आप तो चाहती हैं न कि मैं आपकी बहू बनूँ? तो आप इसे समझाती क्यों नहीं? यह मुझसे ऐसे बात करता है जैसे कि मैं कोई पराई हूँ।"
माँ सुमित्रा देवी हंस पड़ीं, "अरे पगली, तू तो मेरी बेटी जैसी है। विराज की बातों का बुरा मत मान, यह तो है ही शर्मिला।"
बड़ी बहन रिया ने छेड़ते हुए कहा, "सही कह रही है काव्या। विराज, तुझे तो खुश होना चाहिए कि काव्या जैसी लड़की तुझे पसंद करती है। वरना तेरी शक्ल पर कौन मरेगा?"
विराज ने अपनी बहन को घूरा, "दीदी, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, कॉलेज में मेरे लॉकर में हर रोज़ दस लव-लेटर पड़े मिलते हैं। मैं भी कोई कम सुंदर नहीं हूँ।"
यह सच था। विराज और काव्या की जोड़ी ऐसी लगती थी जैसे किसी फिल्म के हीरो-हीरोइन हों।
काव्या गुस्से से खड़ी हो गई, "अच्छा! तो उन सभी लव-लेटर वाली चुड़ैलों का नाम बताओ जरा मुझे। मैं अभी जाकर उनका काम तमाम करती हूँ।" उसने टेबल पर हाथ पटका, "सुन लो विराज, तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे! अगर तुमने किसी और लड़की की तरफ देखा भी, तो मैं उसका वो हाल करूँगी कि पुलिस को भी सबूत नहीं मिलेंगे। और तुम्हें... तुम्हें तो मैं किडनैप करके अपने घर ले जाऊंगी।"
इतना कहकर वह पैर पटकते हुए और अपना बैग उठाकर बाहर निकल गई, "मैं बाहर तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ, चुपचाप आ जाना!"
उसके जाने के बाद खाने के टेबल पर हंसी के फव्वारे छूट पड़े।
विराज के पिताजी, सोहनलाल ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "भाई, मानना पड़ेगा, लड़की में दम है। बहू तो यही हमारे घर की बनेगी।"
तीसरी बहन शिखा ने हंसते हुए कहा, "पापा, आपको लगता है विराज को कुछ करने की जरूरत है? काव्या इकलौती है, उसका बाप करोड़पति है। हमारा भाई तो सीधा 'घर जमाई' बनेगा।"
सबसे छोटी बहन टीना ने ताली बजाई, "हाँ! और क्या! भाई को नौकरी करने की क्या जरूरत है? काव्या इसे पाल लेगी। वैसे भी यह कामचोर है।"
विराज ने झल्लाहट में अपनी चाय का कप रखा, "तुम सबने मेरा मजाक बना रखा है? मैं घर जमाई नहीं बनूंगा। मेरा अपना सपना है, मैं एक बड़ा सा अपना बिज़नेस खड़ा करूँगा।"
लेकिन उसकी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, सभी हंसने में व्यस्त थे। विराज ने एक गहरी सांस ली। उसका परिवार बहुत प्यारा था, लेकिन वे नहीं जानते थे कि विराज के अंदर क्या चल रहा है। वह सपना... वह सीने का निशान... और कभी-कभी महसूस होने वाली वह अजीब सी ताकत।
जैसे ही विराज कुर्सी से उठा, उसे अचानक चक्कर आया। उसकी आंखों के सामने फिर से वही कालकोठरी का दृश्य कौंध गया। लेकिन इस बार उसने कुछ और देखा।
उसने देखा कि मरने से पहले राजकुमार ने अपनी मुट्ठी में कुछ भींच रखा था। एक लाल रंग का पत्थर।
विराज ने अपनी मुट्ठी भींची। उसे अपनी हथेली में एक अजीब सी गर्मी महसूस हुई। जब उसने मुट्ठी खोली, तो वहां कुछ नहीं था, लेकिन उसकी हथेली पर एक लाल रंग का धुंधला सा निशान उभर आया था।
"यह क्या हो रहा है मेरे साथ?" उसने मन ही मन सोचा। "क्या वह सपना... सिर्फ सपना नहीं है?"
तभी बाहर से काव्या की आवाज़ आई, "विराज! अगर दो मिनट में बाहर नहीं आए तो मैं अंदर आके तुझे घसीटते हुए ले जाऊंगी!"
विराज मुस्कुरा दिया, अपनी हथेली को जेब में डाला और और चल पड़ा। उसे नहीं पता था कि क्या आज का दिन उसकी साधारण ज़िंदगी का आखिरी साधारण दिन होने वाला था। क्या उसकी शक्तियां जाग रही थीं, और शायद... उसके पिछले जन्म के दुश्मन भी।