krishna and kans in Hindi Fiction Stories by manshi books and stories PDF | कृष्ण और कंस

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कृष्ण और कंस

आपने बाँसुरी बजाने वाले कृष्ण की कहानी, सुनी होगी। और आप कंस के वध से भी अच्छी तरह वाक़िफ़ होंगे। चलिए इनके स्वभाव को समझते हैं। आज सीमा  और प्रवीन के घर दो जुड़वा बच्चों का जन्म हुआ है। वे बहुत खुश हैं। पर उन्हें यह नहीं पता कि, इनका भविष्य कैसा होगा। उन्होंने बच्चो का नाम फिलो और निया रखा। बच्चे बड़े हो गए।फिलो बहुत ही गुस्से वाले स्वभाव का और शरारती है। वहीं निया शांत स्वभाव की और एक समझदार लड़की है। निया एक चित्र कार है। वैसे तो वह बहुत से चित्र बनाती है, पर उसने कभी भी ईश्वर से जुड़ी कोई भी चित्र कारी नहीं की। उसने परमात्मा की तस्वीर बनाने की सोची। एक दिन उसकी नानी ने उसे कृष्ण और कंस की कहानी सुनाई। निया के मन पर एक गहरा प्रभाव पड़ा। उसने कृष्ण और कंस की तस्वीर बनाने की सोची। उसने अपनी नानी से कृष्ण और कंस से मिलने की इच्छा प्रकट की। उसकी नानी ने उससे कहा- वे परमात्मा है, और हमें दिखाई नहीं देते। 

फिर निया ने कहा- यदि आप नहीं चाहती कि, मैं उनसे मिलूँ तो कोई बात नहीं। मैं उन्हें खुद ढूंढ लूंगी। 

सबके बार बार समझाने पर भी निया ने हठ ना छोड़ी। अगले दिन निया ने अपना सामान बाँधा और निकल गई, कृष्ण और कंस को ढूँढने। उसने कई स्थानों पर यात्रा की। वह गाँव, शहर, हर स्थान पर गई, और कृष्ण, कंस को ढूँढने लगी। एक दिन वह अपने मार्ग से भटक गई, और जंगल में खो गई। वहाँ उसे जंगल में एक झोपड़ी दिखी। उसने झोपड़ी में रात बिताने की सोची। उस झोपड़ी में एक बूढ़ी स्त्री रहती थी। उन्होंने निया को आश्रय दिया। निया ने उन्हें अपने लक्ष्य के बारे में बताया। उस झोपड़ी में कृष्ण की एक मूर्ति रखी हुई थी। बूढ़ी स्त्री ने उसे बताया कि, यह ही कृष्ण हैं।

फिर निया ने कहा- आप असत्य कह रही हैं। यह तो निर्जीव पथर है। भला एक पथर किसी का वध कैसे कर सकता है। 

वह स्त्री बोली- चलो मान लिया कि यह निर्जीव है, पर कंस का तो वध हो चुका है।वह तो अब इस दुनिया में है ही नहीं, फिर तुम उसका चित्र कैसे बनाओगी? 

निया- वह मै देख लूंगी, अभी मैं कृष्ण की खोज में हूँ। 

अगले दिन निया ने दोबारा अपनी यात्रा शुरू की। वह प्रत्येक व्यक्ति से पूछने लगी- क्या वे कृष्ण को जानते है। लोग उसे पागल समझने लगे और उस पर हसने लगे। उन्होंने निया पर चीजें फेंकी और उसे चोट पहुंचाने का प्रयतन किया। पांच साल बीत गए। निया ने अपनी खोज जारी रखी। एक दिन उसे एक व्यक्ति ने कहा- मेरे घर के पास एक छोटा बच्चा रहता है, जो कृष्ण की तरह दिखता है। निया बहुत खुश हुई। वह उस व्यक्ति के साथ गई। और उसने कृष्ण का चित्र बनाया। अब उसे कंस की खोज करनी थी। उसे उस बूढ़ी स्त्री की बात याद आई। उसने सोचा, कि यदि कृष्ण की मूरत हो सकती है, तो कंस की भी जरूर होगी। वह निकल पड़ी कंस की मूरत ढूँढने। एक दिन उसे एक लड़की मिली, जो उसी की तरह चित्र कार थी। सिया को निया दिलचस्प लगी। उसने निया की । मदद करने की सोची। अब वे दोनों मिलकर निकल पड़ी कंस की मूरत ढूँढने। एक दिन वे एक सभा में पहुंचीं। वहाँ कई विद्वान आए हुए थे। वे अच्छाईयों और बुराइयों पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने इस बी कृष्ण और कंस का उदाहरण लिया। उस सभा ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्हें यह समझ आ गया कि, कंस बुराइयों का प्रतीक है। अगले दिन एक विद्वान ने उन्हें  जेल मे जाकर किसी कैदी की तस्वीर बनाने की सलाह दी।वे जेल मे गई। वहाँ निया को फिलो दिखा। निया उसे देखकर चकित हो गई। वह भावुक हो गई।उसने उसका चित्र बनाया। इसके बाद वह अपने घर लौट गई। कुछ सालों बाद फिलो को रिहा कर दिया गया। पता चला की, फिलो को कत्ल करने के जुर्म में कैद किया गया था। निया ने उसे जीवन का पाठ पढ़ाया। उसने वह तस्वीर फिलो को दे दी और उसे अच्छाई और बुराई का पाठ पढ़ाया। निया ने उसे कहा-" जब तुम प्रेरणा हीन हो जाओ, तब इस चित्र से प्रेरणा लेना"।