Chapter 1 : जो याद नहीं रहना चाहिए था
कुछ यादें अचानक गायब नहीं होतीं।
वे बस धीरे-धीरे पीछे खिसक जाती हैं, इस तरह कि हमें लगता है हमने ही उन्हें छोड़ दिया है।
और जब वे लौटती हैं, तो शोर नहीं करतीं—बस चुपचाप अपनी जगह ले लेती हैं।
मैं लिख रही थी।
कमरा शांत था, इतना शांत कि पंखे की आवाज़ भी ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ लग रही थी। सामने मेज़ पर मेरी डायरी खुली पड़ी थी, जबकि मुझे पूरा यक़ीन था कि आज मैंने उसे खोला नहीं था।
मैंने पन्ने पर नज़र डाली।
लिखावट मेरी थी—अक्षरों का वही दबाव, वही हल्की तिरछी लकीरें। सब कुछ पहचाना-सा, फिर भी अजनबी।
मैंने पढ़ा—
“अगर ये पन्ना खुला मिले, तो घबराना मत।
मैं वापस आ चुकी हूँ।”
मेरे भीतर कुछ हल्का-सा खिसक गया। न डर, न घबराहट—बस एक अजीब-सी बेचैनी, जिसका कोई साफ़ नाम नहीं था।
“वापस…?”
मैंने धीमे से खुद से पूछा।
कमरे ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन सन्नाटा पहले जैसा नहीं रहा। ऐसा लगा जैसे हवा थोड़ी भारी हो गई हो।
मैंने दिमाग़ पर ज़ोर डाला। कब लिखा था ये? क्यों लिखा था? अगर लिखा था तो मुझे याद क्यों नहीं है? सवाल बहुत थे, जवाब एक भी नहीं।
मैं उठी और कमरे में थोड़ा टहलने लगी। दीवारें वही थीं, खिड़की से आती रात वही थी, बाहर की दुनिया बिल्कुल सामान्य लग रही थी। यही बात सबसे ज़्यादा परेशान कर रही थी। अगर कुछ साफ़-साफ़ गलत होता, तो शायद समझ में आता।
मैं वापस कुर्सी पर बैठी। डायरी अब भी वहीं खुली थी। मैंने उसे बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रुक गई। बिना किसी वजह के ऐसा लगा जैसे उसे बंद करना सही नहीं होगा।
नीचे एक तारीख लिखी थी।
आज की तारीख।
मेरे सीने में हल्का-सा दबाव महसूस हुआ। ये डर नहीं था। ये वो एहसास था जो तब होता है जब कोई बात समझ में आने से बस एक क़दम दूर हो।
मैंने पहली बार ये सवाल नहीं किया कि ये किसने लिखा। सवाल ये था—
अगर ये मैंने ही लिखा है,
तो वो कौन-सी मैं थी
जिसे मैं अब याद नहीं कर पा रही हूँ?
उसी पल मुझे यक़ीन हो गया कि ये सब आज से शुरू नहीं हुआ है। ये कहानी पहले से चल रही थी, और अब… मुझे बस उसमें वापस लाया जा रहा है।
डायरी अब भी खुली थी।
और मुझे पता था—
इसे बंद करने से कुछ भी खत्म नहीं होगा।
Chapter 2 : सामान्य जैसा कुछ नहीं होता
सुबह देर से हुई, और मुझे ठीक-ठीक याद नहीं था कि मैं कितनी देर से जाग रही हूँ। मोबाइल पास में पड़ा था, अलार्म बंद था, लेकिन उसे किसने बंद किया था—इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था।
खिड़की से हल्की धूप आ रही थी। सब कुछ वैसा ही लग रहा था जैसा हर रोज़ होता है, फिर भी भीतर कहीं एक असहज-सी खामोशी थी, जैसे कुछ मेल नहीं खा रहा हो।
आईने में खुद को देखा तो चेहरा मेरा ही था—थोड़ा थका हुआ, थोड़ा बिखरा हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे मैं देर से अपनी ही ज़िंदगी में लौटी हूँ।
नाश्ता बनाते वक्त दिमाग़ खाली रखने की कोशिश की, लेकिन डायरी की वो लाइन बार-बार याद आ रही थी— “मैं वापस आ चुकी हूँ।” जितना उसे भूलने की कोशिश करती, वो उतनी ही साफ़ होती जाती।
बाहर निकलते वक्त पड़ोस की एक औरत ने मुस्कुरा कर पूछा, “आज जल्दी निकल गई?” मैंने हाँ में सिर हिला दिया, जबकि मुझे खुद नहीं पता था कि वो “जल्दी” कैसे जानती है।
ऑफिस पहुँचकर लिखने बैठी। यही मेरा काम है, शब्दों से रिश्ता पुराना है, लेकिन आज शब्द मुझसे दूर भागते लग रहे थे। स्क्रीन पर कर्सर टिमटिमा रहा था, जैसे किसी याद का इंतज़ार कर रहा हो।
ब्रेक के दौरान एक पुरानी फाइल हाथ लगी। नाम देखकर मैं रुक गई— Sarika। नाम साधारण था, फिर भी दिल अजीब-सा धड़क उठा। बिना फाइल खोले ही मैंने उसे बंद कर दिया। मुझे नहीं पता था क्यों, लेकिन इतना समझ आ गया था कि मुझे उसे अभी नहीं देखना चाहिए।
शाम को घर लौटते वक्त यही एहसास रहा कि दिन में कुछ छूट गया है—या जानबूझकर छोड़ा गया है।
कमरे में घुसते ही मेरी नज़र मेज़ पर गई। डायरी बंद पड़ी थी। राहत मिली।
फिर नीचे रखा एक नया काग़ज़ दिखा।
साफ़, सादा।
उस पर लिखा था—
“आज तुमने मुझे पहचाना नहीं।
कोई बात नहीं।”
ये डर नहीं था।
ये वो एहसास था कि जो कुछ भी हो रहा है, वो मुझसे छुपकर नहीं—मेरे साथ-साथ चल रहा है।
और मैं अब भी उससे एक क़दम पीछे हूँ।