वाशिंगटन चौक के पश्चिम की ओर एक छोटा-सा मुहल्ला है जिसमें टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के जाल में कई बस्तियां बसी हुई हैं। ये बस्तियां बिना किसी तरतीब के बिखरी हुई है। कहीं-कहीं सड़क अपना ही रस्ता दो-तीन बार काट जाती है। इस सड़क के सम्बन्ध में एक कलाकार के मन में अमूल्य सम्भावना पैदा हुई कि कागज, रंग और कैनवास का कोई व्यापारी यदि तकादा करने यहां आये तो रास्ते में उसकी अपने आपसे मुठभेड़ हो हो जायेगी और उसे एक पैसा भी वसूल कियेबिना वापिस लौटना पड़ेगा।
इस टूटे-फ़ूटे और विचित्र,'ग्रीनविच ग्राम' नामक मुह्ल्ले में दुनिया भर के कलाकार आकर एकत्रित होने लगे। वे सब के सब उत्तर दिशा में खिड़कियां, अठारहवीं सदी के महराबें, छत के कमरे और सस्ते किरायों की तलाश में थे। बस छठी सड़क से कुछ कांसे के लोटे और टिन की तश्तरियां खरीद लाये और ग्रहस्थी बसा ली।
एक नीचे से मकान के तीसरी मंजिल पर, सू जौर जान्सी का स्टूडियो था। जान्सी, जोना का अपभ्रंश था। एक 'मेईन' से आयी थी और दूसरी 'कैलाफ़ोर्निया' से। दोनों की मुलाकात, आठवीं सड़क के एक अत्यन्त सस्ते होटल में हुई थी। दोनों की कलारूचि और खाने-पीने की पसन्द में इतनी समानता थी कि दोनों के मिले-जुले स्टूडियो का जन्म हो गया।
यह बात मई के महीने की थी। नवम्बर की सर्दियों में एक अज्ञात अजनबी ने, जिसे डाक्टर लोग 'निमोनिया' कहते हैं। मुहल्ले में डेरा डाल कर, अपनी बर्फ़ीली उंगलियों से लोगों को छेड़ना शुरू किया। पूर्वी इलाके में तो इस सत्यनाशी ने बीसियों लोगों की बलि लेकर तहलका मचा दिया था, परन्तु पश्चिम की तंग गलियों वाले जाल में उसकी चाल कुछ धीमी पड़ गयी।
मिस्टर 'निमोनिया' स्त्रियों के साथ भी कोई रिआयत नहीं करते थे। कैलीफ़ोर्निया की आंधियों से जिसका खून फ़ीका पड़ गया हो, ऎसे किसी दुबली-पतली लड़की का इस भीमकाय फ़ुंकारते दैत्य से कोई मुकाबला तो नही था, फ़िर भी उसने जान्सी पर हमला बोल दिया। वह बेचारी चुपचाप अपनी लोहे की खाट पर पड़ी रहती और शीशे की खिड़की में से सामने के ईटों के मकान की कोरी दीवार को देखा करती।
एक दिन उसका इलाज करने वाले बूढ़े डाक्टर ने, थर्मामीटर झटकते हुये, सू को बाहर के बरामदे में बुलाकर कहा,"उसके जीने की संभावना रूपये में दो आना है और, वह भी तब, यदि उसकी इच्छा-शक्ति बनी रहे। जब लोगों के मन में जीने की इच्छा ही नही रहती और वे मौत का स्वागत करने को तैयार हो जाते हैं तो उनका इलाज धन्वंतरि भी नहीं कर सकते। इस लड़की के दिमाग पर भूत सवार हो गया है कि वह अब अच्छी नहीं होगी। क्या उसके मन पर कोई बोझ है?"
सू बोली,"और तो कुछ नहीं, पर किसी रोज नेपल्स की खाड़ी का चित्र बनाने की उसकी प्रबल आकांक्षा है।"
"चित्र? हूं! मैं पूछ रहा था, कि उसके जीवन में कोई ऎसा आकर्षण भी है कि जिससे जीने की इच्छा तीव्र हो? जैसे कोई नौजवान!"
बिच्छू के डंक की-सी चुभती आवाज में सू बोली," नौजवान? पुरूष और प्रेम-छोड़ो भी-नहीं डाक्टर साहब, ऎसी कोई बात नहीं है।"
डाक्टर बोला,"सारी बुराई की जड़ यही है। डाक्टरी विद्या के अनुसार जो कुछ मुझसे मुमकिन है, उसे किये बिना नहीं छोडूंगा। पर जब कोई मरीज अपनी अर्थी के साथ चलने वालों की संख्या गिनने लगा जाता है तब दवाइयों की शाक्ति आधी रह जाती है। अगर तुम उसके जीवन में कोई आकर्षण पैदा कर सको, जिससे वहअगली सर्दियों में प्रचलित होने वाले कपड़ो के फ़ैशन के बारे में चर्चा करने लगे, तो उसके जीने की संभावना कम से कम दूनी हो जायेगी।"
डाक्टर के जाने के बाद सू अपने कमरे में गयी और उसने रो-रो कर कई रूमाल निचोड़ने काबिल कर दिये। कुछ देर बाद, चित्रकारी का सामान लेकर, वह सीटी बजाती हुई जान्सी के कमरे में पहुंची। जान्सी, चद्दर ओढ़े, चुपचाप, बिना हिले-डुले, खिड़की की ओर देखती पड़ी थी। उसे सोई हुई जान कर उसने सीटी बजाना बन्द कर दिया।
तख्ते पर कागज लगाकर वह किसी पत्रिका की कहानी के लिए, कलम स्याही से एक तस्वीर बनाने बैठी। नवोदित कलाकारों को 'कला' की मंजिल तक पहुंचने केलिए, पत्रिकाओं के लिए तस्वीरें बनानी ही पड़ती है। जैसे साहित्य की मंजिल तक पहुंचने के लिए, नवोदित लेखकों को पत्रिकाओं की कहानियां लिखनी पड़तीहै।
ज्यों ही सू, एक घुड़सवार जैसा ब्रीजस पहने, एक आंख का चश्मा लगाये, किसी इडाहो के गडरिये के चित्र की रेखाएं बनाने लगी कि उसे एक धीमी आवाज अनेक बार दुहराती-सी सुनाई दी। वह शीघ्र ही बीमार के बिस्तरे के पास गयी।
जान्सी की आंखे खुली थीं। वह खिड़की से बाहर देख रही थी और कुछ गिनती बोल रही थी। लेकिन वह उल्टा जप कर रही थी। वह बोली,"बारह" फ़िर कुछ देर बाद "ग्यारह" फ़िर "दस" और "नौ" और तब एक साथ "आठ" और "सात"।
सू ने उत्कण्ठा से, खिड़की के बाहर नजर डाली। वहां गिनने लायक क्या था। एक खुला, बंजर चौक या बीस फ़ीट दूर ईंटों के मकान की कोरी दीवार!
एक पुरानी, ऎंठी हुई, जड़े निकली हुए,. सदाबहार की बेल दीवार की आधी ऊंचाई तक चढ़ी हुई थी। शिशिर की ठंडी सांसो ने उसके शरीर की पत्तियां तोड़ ली थीं और उसकी कंकाल शाखाएं, एकदम उघाड़ी, उन टूटी-फ़ूटी ईटों से लटक रही थीं।
सू ने पूछा,"क्या है जानी?"
अत्यन्त धीमे स्वरों में जान्सी बोली,"छ:! अब वे जल्दी-जल्दी गिर रही हैं। तीन दिन पहले वहां करीब एक सौ था। उन्हें गिनते-गिनते सिर दुखने लगाता था। वह, एक और गिरी। अब बची सिर्फ़ पांच।"
"पांच क्या? जानी, पांच क्या? अपनी सू को तो बता!"
"पत्तियां। उस बेल की पत्तियां। जिस वक्त आखिरी पत्ती गिरेगी, मैं भी चली जाऊंगी। मुझे तीन दिन से इसका पता है। क्या डाक्टर ने तुम्हें नहीं बताया?"
अत्यन्त तिरस्कार के साथ सू ने शिकायत की, "ओह! इतनी बेवकूफ़ तो कहीं नही देखी। तेरे ठीक होने का इन पत्तियों से क्या सम्बन्ध है? तू उस बैल से प्यार किया करती थी-क्यों इसलिए? बदमाश! अपनी बेवकूफ़ी बन्द कर! अभी सुबह ही तो डाक्टर ने बताया था कि तेरे जल्दी से ठीक होने की संभावना-ठीक किन शब्दो में कहां था-हां, कहा था, संभावना रूपये में चौदह आना है और न्यूयार्क में, जब हम किसी टैक्सी में बैठते हैं या किसी नयी इमारत के पास से गुजरते हैं, तब भी जीने की संभावना इससे आधिक नहीं रहती। अब थोड़ा शोरबा पीने की कोशिश कर और अपनी सू को तस्वीर बनाने दे, ताकि उसे सम्पादक महोदय के हाथों बेच कर वह अपने बीमार बच्ची के लिए थोड़ी दवा-दारू और अपने खुद के पेट के लिए कुछ रोटी-पानी ला सके।"
अपनी आंखों को खिड़की के बाहर टिकाये जान्सी बोली,"तुम्हें अब मेरे लिए शराब लाने की जरूरत नहीं। वह, एक और गिरी। नहीं मुझे शोरबे की भी जरूरत नहीं। अब सिर्फ़ चार रह गयीं। अन्धेरा होने से पहिले उस आखिरी पत्ती को गिरते हुए देख लूं-बस। फ़िर मैं भी चली जाऊंगी।"
सू उस पर झुकती हुई बोली,'प्यारी जान्सी! तुझे प्रतिज्ञा करनी होगी कि तू आंखे बन्द रखेगी और जब तक मैं काम करती हूं, खिड़की से बाहर नहीं देखेगी। कल तक ये तस्वीर पहुंचा देनी हैं। मुझे रोशनी की जरूरत है, वर्ना अभी खिड़की बन्द कर देती।"
जान्सी ने रूखाई से पूछा,"क्या तुम दूसरे कमरे में बैठकर तस्वीरें नहीं बन सकती?"