“ बड़े दिनों बाद पहना तुमने ये- कोई ख़ास बात ?” मैं हलकी सी गर्दन हिला कर नकार देती और वो बस देखते रहते न जाने कितने संशय दिल में लिए।
आज अचानक मुझे लेने मेरे स्टॉप पर आ गए सुशांत और मैं हक्की बक्की रह गयी क्यूंकि ऐसा तो कभी होता नहीं। मेरा विस्मय भी अजीब लगा उन्हें ? पर क्यों ? चलो छोड़ो, होगा कुछ। अपने नियत कामों से फारिग होकर जब शयन कक्ष में पहुंची तो जाग रहे थे वो। कुछ इधर उधर की बातें होती रहीं फिर अचानक ही बोल पड़े “ और तुम्हारे स्टाफ में सब वही लोग हैं या कोई नया आया ?” चौंक कर मैंने कहा ऐसा तो कोई ख़ास नहीं। पर जाने क्यूँ एक अजीब सी बेचैनी हुई मुझे – फिर अपने अन्दर की आशंका को दबा कर मैंने सोचा नहीं नहीं अब तो बदल गए हैं ये – समय के साथ परिपक्वता आ गयी है, अब थोड़ी न ? करवटें बदलते, सोते जागते सुबह हो गयी और रोज़ का रूटीन शुरू। इनके चले जाने के बाद कुछ बेचैन सी ही रही मैं – पर नकारात्मकता को त्यागने के अपने निश्चय पर वापस आते हुए तैयार होकर निकल पड़ी अपने काम पर।
आज अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा करते समय जाने कैसे कैसे विचार आ रहे थे – कुछ कसमसाहट सी महसूस हो रही थी। खैर चढ़ी अपने कोच में और रोज़ की तरह मुस्कुराकर अभिवादन किया लोगों का, अश्विन की गुड मॉर्निंग का जवाब देकर जैसे ही बैठी दिल जैसे निकल कर हलक में आ गया। एक अनजानी आशंका और पहचाने से दर्द ने दिल को घेर लिया। सामने से सुशांत आ रहे थे पर मैं जैसे कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे पा रही थी। बस मूक पत्थर हो गयी थी- इतने वर्षों बाद ? फिर से ? मेरी मनोस्थिति से अन्जान अश्विन ने रोज़ की तरह बातों का सिलसिला शुरू कर दिया था और लोगों को बीच से हटाते सुशांत मेरी ओर बढ़ रहे थे। “ तो ये हैं वो ?” कटाक्ष के साथ मेरे बगल में बैठ गए वो। आश्चर्य चकित अश्विन बोल पड़े “ माफ़ कीजियेगा किन्तु .....” पर उसके आगे वो नहीं सुशांत बोले, “जनाब अगर आपकी आज्ञा हो तो अपनी खुद की पत्नी से दो बात कर लूँ मैं ?” सकपकाकर चुप हो गए अश्विन बेहद विस्मित मेरी आँखों के पानी पर, जो पलकों पर ही ठहरा हुआ था। खुद को संभालकर दोनों को परिचय कराया मैंने, एकदम यंत्रवत- मशीनी रूप से। एक ब्रेक लगा- ट्रेन रुकी और उतर गए हम दोनों अपने घर जाने के लिए।
इतना गहरा सन्नाटा किसी तूफ़ान का अंदेशा है ये जानती हूँ मैं और शायद किस तूफ़ान का ये भी। फिर भी रोम रोम से दुआ निकल रही थी कि नहीं ईश्वर नहीं- अब नहीं। बच्चों के सोने के बाद आज कितना डर रही हूँ मैं अपने ही कमरे में जाने से। ऐसा नहीं की जो होने वाला है वो पहली बार है पर फिर भी बड़े दिनों बाद है और शायद उस भाव को जीना- सहना भूल चुकी हूँ मैं। कुछ बेहद चुभते से शब्द बह रहे हैं मेरे आँसुओं में और मैं निर्दोष होते हुए भी एक अपराधी सी खड़ी हूँ कटघरे में। पता नहीं क्यूँ सुशांत इतना कड़वा बोलते हैं और इतने हलके हो जाते हैं अपनी ही पत्नी के प्रति ? शादी के बाद लगता था कि समय के साथ मुझे समझ जायेंगें और फिर ऐसा नहीं बोलेंगे पर ऐसा कुछ कभी हुआ नहीं। सब ठीक है हमारे बीच बस इनका विश्वास, इनका यकीं बेहद कमज़ोर है- अकारण। शब्द कुछ नहीं कर पाते ऐसे में और मेरे मौन को हमेशा मेरी स्वीकृति समझने का दंभ पाले हुए हैं ये आजतक। समझ नहीं आता की पुरुष इतनी आसानी से कैसे कुठाराघात कर देता है स्त्री के चरित्र पर- उसके सम्मान पर – उसकी आत्मा पर ?
अपने माता - पिता की अच्छी बेटी मैं, अपने भाई बहन के लिए उदाहरण मैं, अपनी तरुणाई में भी कभी किसी के प्रति आकर्षित नहीं हुई। अपने आदर्शों पर चलते हुए अचानक २१ वर्ष की अधकच्ची उम्र में सुशांत की हो गयी मैं, न सिर्फ तन से अपितु मन से भी। मन में उनके लिए रूमानी ख़्याल उठते थे पर जल्दी ही समझ गयी या समझा दी गयी के कितनी कमतर हूँ मैं हर तरह से। उनके बड़े कदमों और तेज़ चाल से कहीं पीछे छूटती चली गयी मैं एक इंसान के रूप में और रह गयी तो एक पत्नी जो बनती बिगड़ती रही उनके हिसाब से। नश्तर से चुभ जाते वो जब मुझे छत पर देख कर वो दूसरों की छतों पर जाने क्या ढूंढते ? या किसी से हंस कर फोन पर बात करते देख कुछ अजीब सा देखते और हद तो तब हो जाती जब कोई मिस्ड कॉल या ब्लेंक कॉल आ जाती ? जैसे मैंने ही कोई अपराध कर दिया हो। और इस सब के बीच सुलभ- अंशिता के आने से कुछ ठहराव आया था शायद – या मेरा खुद को भूल जाना ही ठहराव का कारण था ? और आज जब मैंने खुद को संवारा तो वही सर्पदंश फिर से ?
आज तैयार नहीं हुयी मैं। अपना पुराना कॉटन का सूट निकाला, बेतरतीब बालों को क्लच में समेटा जैसे तैसे और बहती अश्रुधारा के बीच गुलाबी लिपस्टिक पीछे डाल दी अलमारी में। ताला लगाया घर पर, और अपने कुछ खुद हो पाने के इरादे पर, और नपे तुले क़दमों से चल पड़ी अपनी पहचानी डगर पर। सामने खड़े हैं सुशांत। देख रहें हैं मुझे जाते हुए -संवादहीन। एक शांति है उनकी आँखों में। और एक निश्चय मेरे ह्रदय में। चढ़ दी ट्रेन में। अभिवादन भी। अश्विन की नज़रें उठीं - मुझसे टकरायीं- चौंकी और एक सन्नाटा पसर गया हमारे बीच। नम हैं उनकी भी आँखें – लाचारी से – एक अजीब से अपराध बोध से जिसका उनसे कोई सम्बन्ध भी नहीं। और उनके इस अपराध बोध ने मेरे सीने के दर्द को और भी बढ़ा दिया। नज़रें फेर ली मैंने क्यूंकि अब कहना क्या और सुनना क्या।
कितनी देर लगती है लबों के यूँ हिलने में, एक ऊँगली के उठने में और शब्दों के जहर होने में ? क्यूँ इतनी आसानी से पुरुष किसी स्त्री के चरित्र पर हमला कर देता है ? किसी भी स्त्री के लिए मूर्ख कहलाना उतना अपमानजनक नहीं जितना चरित्रहीन क्यूंकि चरित्र ही उसका गहना है और उसका सबसे कमज़ोर कोना जिस पर वो कोई आघात सह नहीं पाती। बिखर जाती है या विद्रोही किन्तु अवश्य ही स्वयं से जुदा हो जाती है। सदियों से पुरुष प्रधान समाज में औरतों के चरित्र पर अनर्गल कुठाराघात किये गए हैं और समाज मूक बधिर होकर बस तमाशा देखता रहता है। अरे जिसने सीता को नहीं छोड़ा वो इला को क्या छोड़ेगा ? और दोष तो स्त्री का भी है। क्यों सह जाती है वो ये सब ? कभी परिवार के नाम पर, कभी परम्परा के नाम पर तो कभी मूल्यों के नाम पर ? यही सब सोच रही थी इला के अचानक अश्विन बोले “कल से मैं इस कोच में नहीं आऊंगा या शायद इस ट्रेन में ही नहीं, यही उचित होगा शायद तुम्हारे लिए। अच्छा चलता हूँ अपना ध्यान रखना। ईश्वर सब ठीक करेगा।”
कुछ फिर दरका, कुछ टूटा और फिर टीस वही पुरानी।
~सोनाली रावत