अध्याय 1 – शांत पानी, अशांत रहस्य
हिंद महासागर उस दोपहर असामान्य रूप से शांत था।
लहरें थीं, लेकिन उनमें चंचलता नहीं थी—जैसे समुद्र खुद किसी बात की प्रतीक्षा कर रहा हो।
धूप ठीक सिर के ऊपर थी। घड़ी ने दोपहर के ठीक दो बजाए थे।
यह इलाका आम समुद्री रास्तों से अलग था।
अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह से कुछ ही मील दूर, वह हिस्सा जहाँ पानी गहरा होता है… और सवाल भी।
भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल का संयुक्त पेट्रोलिंग जहाज़ उसी रूट पर था।
डेक पर खड़ा एक जवान दूरबीन आँखों से लगाए क्षितिज को स्कैन कर रहा था।
नीला आसमान।
नीला समंदर।
हर दिशा में खालीपन।
अचानक—
“सर… वहाँ कुछ दिख रहा है,” एक जवान ने धीमे स्वर में कहा, अपने हाथों से दूरबीन पकड़ते हुए।
आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें हल्की-सी सावधानी थी।
कैप्टन आगे बढ़ा।
उसने दूरबीन ली और उसी दिशा में देखा।
ऑफिसर ने पल भर के लिए देखा, फिर अपनी दूरबीन से समुद्र की उस दिशा पर नजर टिकाई। दूर, हल्की सी हलचल—एक छोटी नाव के आकार की—समुद्र की नीली सतह पर तैर रही थी।
पहले तो कुछ समझ नहीं आया।
फिर एक छोटा-सा काला बिंदु—
जो लहरों के बीच असहाय-सा हिल रहा था।
नाव।
क्या है ये? इतनी दूर से कुछ साफ़ नहीं दिख रहा,” कैप्टन ने धीरे से कहा।
जवान ने अपने अनुभव के आधार पर अनुमान लगाया, “सर… शायद कोई मछुआरा, लेकिन…”
“लेकिन क्या?” कप्तान ने गंभीर स्वर में पूछा।
जवान ने फिर से कहा, “सर… कुछ अलग लग रहा है। नाव का आकार, उसका रंग… और उस पर बैठा आदमी—साधारण मछुआरों जैसी स्थिति नहीं है।”
कैप्टन ने नजरें घुमा कर नाव की दिशा में देखा। “कहीं यह श्रीलंका का नागरिक तो नहीं?” भटकते हुए यहां आ गया हो। उसने संकोच के साथ कहा।
डेक पर कुछ पल के लिए खामोशी छा गई। हर कोई अपने-अपने मन में सोच रहा था—ये कौन है, और इतनी दूर आकर क्या कर रहा है?
जहाज़ धीरे-धीरे नाव के पास बढ़ा।
बहुत छोटी।
इतनी छोटी कि इस खुले समुद्र में उसका होना ही एक सवाल खड़ा करता था।
“किसी फिशिंग बोट का रूट नहीं है ये…” कप्तान ने बुदबुदाते हुए कहा।
“कोई सिग्नल आया?”
“नहीं सर। रेडियो पूरी तरह खामोश है।”
जहाज़ की गति कम कर दी गई।
सभी प्रोटोकॉल सक्रिय।
यह सिर्फ़ एक नाव नहीं थी।
यह एक संभावित खतरा भी हो सकता था—
या फिर कोई ऐसा रहस्य, जो समुद्र ने खुद बाहर फेंक दिया हो।
दूरबीन के दूसरी तरफ़, नाव के भीतर एक आकृति दिखी।
एक आदमी।
स्थिर।
जैसे वह नाव का हिस्सा बन चुका हो।
जवान ने फिर बोट को गौर से देखा।
कुछ पल बाद उसकी आवाज़ कसी हुई थी।
“सर… नाव पर ONGC — ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन (Oil and Natural Gas Corporation) लिखा हुआ है।”
डेक पर हल्का सन्नाटा फैल गया।
कैप्टन की भौंहें तन गईं।
“ये… ये अकेला कैसे?” उसने धीरे-धीरे कहा।
उसकी आवाज़ में हल्का डर और संदेह झलक रहा था।
जवान ने पीछे मुड़कर उत्तर दिया,
“सर… मुझे भी यकीन नहीं हो रहा। नाव पर कोई टीम नहीं है, (Support Ship – सहायक जहाज़) नहीं दिख रही।”
“ONGC… और अकेला शिप?”
कैप्टन का लहजा अब बदल चुका था।
अकेला… और ONGC की नाव?” उसने अपने आप से कहा।
“कहीं… ये कोई आतंकवादी तो नहीं?”
“तैयार रहो,” कैप्टन ने कहा।
कैप्टन ने हाथ उठाकर डेक पर सबको रोक दिया।
उसकी आवाज़ शांत थी—मगर सख़्त।
“रेंज में आ गए हैं।”
कैप्टन ने हेडसेट ठीक किया।
डेक पर मौजूद हर जवान अपने-अपने हथियार के पीछे स्थिर हो गया।
माइक ऑन हुआ।
आवाज़ छोटी, सख़्त और आदेशात्मक थी—
“यह भारतीय नौसेना है।
सामने मौजूद नाव ध्यान दे।”
आप भारतीय समुद्री सीमा के समीप हैं।
अपनी पहचान तुरंत स्पष्ट करें।”
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
कोई जवाब नहीं आया।
कैप्टन की आँखें संकुचित हो गईं।
उसने बिना पलटे कहा—
“दोहराओ।”
माइक फिर से गूंजा—
अब आवाज़ का लहजा बदल गया।
शब्द वही थे, लेकिन अर्थ घातक—
यह भारतीय नौसेना है।
सामने मौजूद नाव ध्यान दे।”
आप भारतीय समुद्री सीमा के समीप हैं।
“अगर आप इस चेतावनी का पालन नहीं करते,
तो इसे सुरक्षा खतरा माना जाएगा।”
डेक पर खड़े जवानों ने एक साथ सेफ़्टी निकाल ली।
ऊपर स्नाइपर ने निशाना लॉक कर लिया।
कैप्टन ने आख़िरी आदेश दिया—
“अंतिम चेतावनी। इस बार संदेश कड़क था।
यह भारतीय नौसेना है।
सामने मौजूद नाव ध्यान दे।”
आप भारतीय समुद्री सीमा के समीप हैं।
अगर आपके पास कोई हथियार है—
उसे अभी समुद्र में फेंक दें।
और दोनों हाथ सिर के ऊपर उठा लें।
कोई अचानक हरकत गोली चलाने का कारण बनेगी।”
समुद्र एक पल को थम-सा गया।
नाव में बैठा आदमी हिला।
धीमे, बेहद सावधानी से।
उसने पहले हथेलियाँ दिखाई।
फिर दोनों हाथ पूरी तरह ऊपर उठा दिए।
डेक पर किसी ने अभी भी हथियार नीचे नहीं किया।
कुछ सेकंड तक कोई हरकत नहीं हुई।
नाव लहरों में डोलती रही।
अब पेट्रोलिंग जहाज़ की रफ्तार और कम कर दी गई।
इंजन की भारी आवाज़ समुद्र की शांति को चीरती हुई नाव की ओर बढ़ने लगी।
जैसे-जैसे दूरी घट रही थी,
नाव और भी जर्जर दिखने लगी।
लकड़ी सूखी और उखड़ी हुई।
किनारे पानी से भीगे।
और अंदर बैठा आदमी—
कंधे झुके हुए, चेहरा धूप से झुलसा हुआ।
कैप्टन ने हाथ के इशारे से आदेश दिया।
“बोर्डिंग टीम, तैयार हो।
छोटी नाव पानी में उतारो।”
कुछ ही पलों में जहाज़ के दाएँ हिस्से से छोटी इंटरसेप्टर नाव नीचे उतारी गई।
इंजन की धीमी गरज समुद्र की ख़ामोशी को चीरती हुई आगे बढ़ी।
चार जवान सवार थे—
बुलेटप्रूफ जैकेट, राइफल सीने से लगी हुई।
निशाना अब भी नाव पर बैठे आदमी पर था।
इंटरसेप्टर धीरे-धीरे उसकी नाव के पास पहुँची।
“हिलना मत।”
एक जवान ने ऊँची आवाज़ में कहा।
आदमी वैसे ही बैठा रहा।
दोनों हाथ अब भी ऊपर थे।
कमज़ोर, काँपते हुए।
एक जवान ने नाव से छलांग लगाई।
दूसरा ठीक पीछे।
उन्होंने सबसे पहले उसकी तलाशी ली—
जेबें खाली, कमर, गर्दन, कपड़े।
कोई हथियार नहीं।
फिर भी—
क्लिक।
हथकड़ी उसकी कलाई पर बंद हो गई।
उस आदमी ने कोई विरोध नहीं किया।
बस थकान भरी आँखों से उन्हें देखता रहा।
नाम?”
जवान ने पूछा।
आदमी ने होंठ हिलाए,
काफी देर बाद आवाज़ निकली—
“आश्विन… कुमार।”
जवान ने उसकी नाव पर नज़र डाली।
—बगल में एक निशान दिखा।
ONGC
उसने हेडसेट में कहा—
“सर… नाव पर ONGC का मार्क है।
लेकिन आदमी अकेला है।”
ओवर
डेक पर खड़ा कैप्टन सतर्क हो गया।
आवाज़ सख़्त थी—
“अकेला?
ONGC अकेले काम नहीं करता।” हल्के से बुदबुदाया
इंटरसेप्टर नाव वापस मुड़ी।
हथकड़ी लगाए आदमी को धीरे से संभाल कर खड़ा किया गया।
वह चल नहीं पा रहा था।
दो जवानों ने उसे थाम लिया।
जब उसे बड़े जहाज़ के डेक पर लाया गया—
चारों ओर बंदूकें थीं, निगाहें थीं…
लेकिन कोई सहानुभूति नहीं।
जवान ने रेडियो में रिपोर्ट दी, “संदिग्ध पकड़ा गया। नाव ONGC की है, लेकिन आदमी अकेला है। कोई आतंकवादी नहीं लगता।” सर
ओवर
अध्याय 2–ब्रिफ़िंग रूम – भारतीय तटरक्षक / Coast Guard
जहाज पर लाकर संदिग्ध को एक सुरक्षित रूम में रखा गया। हाथकड़ी लगी हुई थी, और कमरे में दो सशस्त्र गार्ड खड़े थे। वरिष्ठ तटरक्षक अधिकारी ने स्टील की मेज़ के सामने बैठते हुए कहा,
कमरे की रोशनी तेज़ थी, लेकिन सामने बैठे आदमी के चेहरे पर कोई रंग नहीं था।
आँखें धँसी हुई थीं। होंठ फटे हुए। दाढ़ी बेतरतीब। कपड़ों से खारे पानी और गंदगी की गंध आ रही थी।
वह सीधे बैठने की कोशिश कर रहा था, लेकिन शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।
कैप्टन ने उसे ध्यान से देखा—जैसे सवाल पूछने से पहले ही बहुत कुछ समझ चुका हो।
“नाम?”
आवाज़ सख़्त थी, लेकिन बेवजह ऊँची नहीं।
आदमी ने होंठ हिलाने की कोशिश की।
गले से आवाज़ जैसे अटककर निकली।
“आ… आश्विन कुमार…”
आवाज़ काँप गई। वह खाँसा।
उसकी छाती तेज़ी से ऊपर‑नीचे हो रही थी।
कैप्टन ने बिना टोके अगला सवाल किया—
“पद?”
आदमी ने निगलने की कोशिश की, जैसे मुँह में लार खोज रहा हो—पर कुछ नहीं मिला।
“चीफ़… जियोलॉजिस्ट…”
बस इतना बोलकर वह चुप हो गया।
उसका सिर थोड़ा झुक गया, जैसे अब और बोलना उसके बस में नहीं था।
कमरे में एक पल के लिए खामोशी छा गई।
दो सशस्त्र गार्ड”। अपनी जगह स्थिर खड़े थे, हथियार नीचे थे—लेकिन सतर्क।
अश्विन ने एक लंबी सांस ली। उसके कपड़े नम थे, बाल गीले और उलझे हुए। उसकी आँखों में थकान, भूख और चिंता साफ़ दिख रही थी।
कैप्टन ने नोटिस किया—
काँपते हाथ, सूखी उंगलियाँ, बेजान नज़र।
यह अभिनय नहीं था।
वो भूख और प्यास लग रहा था।
फिर उसने पीछे खड़े जवान की ओर मुड़कर आदेश दिया—
“इस बीच कैप्टन ने एक जवान से कहा,
“डीएनए सैंपल और मूल बायोमेट्रिक विवरण ले लो। यह मानक प्रक्रिया है।”
जवान ने तुरंत सिर हिलाया।
कैप्टन ने बात आगे बढ़ाई—
“और डाक्टर को बुलाओ।
तुरंत।”
इतना बोलकर अधिकारी कमरे से बाहर चला गया।
अध्याय — Medical Bay
स्टील के संकरे गलियारे से स्ट्रेचर गुज़रा।
समंदर की हल्की हलचल के साथ जहाज़ का बदन चरमराया, लेकिन मेडिकल बे के अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी।
अश्विनी कुमार आधी बंद आँखों से छत को देख रहा था।
होठ सूखे थे, जीभ पपड़ी की तरह चिपकी हुई।
गले से आवाज़ निकलने की कोशिश करता—
पर शब्द वहीं टूट जाते।
एक नौसैनिक डॉक्टर ने दस्ताने पहने।
“बीपी?”
“लो, सर” मेडिकल असिस्टेंट ने जवाब दिया।
डॉक्टर ने अश्विनी की कलाई थामी।
नब्ज़ कमजोर थी, जैसे हर धड़कन सोच-समझकर चल रही हो।
“तीन… शायद चार दिन से पानी नहीं,” डॉक्टर ने धीमे कहा।
“ डीहाइड्रेशन सीवियर है।”
उसने इशारे से IV लगाने को कहा।
पतली सुई नस में गई—
और पहली बूंद सेलिन की धीरे-धीरे शरीर में उतरने लगी।
अश्विनी की पलकें फड़कीं।
ना दर्द, ना राहत—
बस एक अजीब-सी ठंडक, जो अंदर तक जा रही थी।
“भारी खाना नहीं,” डॉक्टर ने साफ़ निर्देश दिया।
“पहले फ्ल्यूड ।
जब होश थोड़ा स्थिर हो जाए, तब हल्का सूप।”
इसके बाद डी.न.ए / आइडेंटीफिकेशन के लिए swab लिया गया। डॉक्टर ने सैंपल केयरफुल सुरक्षित रखा।
कुछ देर बाद, डॉक्टर ने कहा,
“अब तुम्हें साफ़ होने की ज़रूरत है। धीरे‑धीरे शॉवर लो, फिर क्लीन क्लोथ्स दिए।”
अश्विन कुमार को स्टैंड कर शॉवर के लिए गाइड किया गया। पानी की हल्की गर्मी उनके शरीर में धीरे-धीरे जान भर रही थी। हल्के तौलिये में लपेटा गया।
अध्याय 3 –बाहर — Medical Bay के दरवाज़े के पास
वरिष्ठ अधिकारी गलियारे में रुके थे।
बाँहें सीने पर बंधी हुईं, चेहरा गंभीर।
दरवाज़ा खुला।
डॉक्टर बाहर आया।
कप्तान के कंधों पर लगी रैंक की पट्टियाँ रोशनी में साफ़ चमक रही थीं। उसने डॉक्टर की ओर देखा और संयमित आवाज़ में पूछा—
“तो बताइए, डॉक्टर… इस आश्विन कुमार कुमार की कंडीशन कैसी है?”
डॉक्टर ने रिपोर्ट फ़ाइल बंद की। एक गहरी साँस ली, फिर कैप्टन की तरफ देखा। चेहरे पर गंभीरता थी, मज़ाक का कोई भाव नहीं।
“सर, अभी हालत में ज़्यादा सुधार नहीं है,” उसने साफ़ शब्दों में कहा।
“पेशेंट कम से कम तीन–चार दिन से बिना पानी और भोजन के रहा है। गंभीर डीहाइड्रेशन है। शरीर में इलेक्ट्रोलाइट इंबैलेंस, शुरू हो चुका है और इन सबके कारण किडनी पर भी ज़ोर पड़ा है।”
अधिकारी के चेहरे की सख़्ती और गहरी हो गई।
उसने तुरंत अगला सवाल किया—
“तो तत्काल हमें क्या करना चाहिए?”
डॉक्टर ने शांत और पेशेवर लहजे में जवाब दिया—
“सर, सबसे ज़रूरी है कंट्रोल्ड हाईड्रेशन फ्ल्यूड बहुत धीरे-धीरे देने होंगे। एक साथ ज़्यादा पानी या सेलिन ख़तरनाक हो सकता है। अभी हैवी खाना नहीं दिया जा सकता—बस हल्का सूप, थोड़ा फल या टोस्ट। इससे शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा मिलेगी।”
सीनियर अधिकारी ने कुछ पल सोचा। फिर नज़रें नीचे झुकाईं और पूछा—
“मतलब…इंटेरोगेशन अभी पॉसिबल नहीं है?”
डॉक्टर ने हल्के से सिर हिलाया—
नहीं, सर। अभी नहीं। पूरी तरह स्टेबल होने में 24 से 36 घंटे लग सकते हैं। तब ब्लड प्रेशर, पल्स और "हाइड्रेशन एक्सेप्टेबल लेवल पर आ जाएंगे। उससे पहले किसी भी तरह का मानसिक या शारीरिक दबाव ठीक नहीं रहेगा।”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
फिर अधिकारी ने छोटा-सा आदेश दिया—
“ मेडिकल ऑब्जर्वेशन में रखिए।
कोई सवाल नहीं।
जैसे ही स्टेबल हो मुझे बताइए।”
यस सर
डॉक्टर ने फिर हल्का-सा सैल्यूट किया।
डॉक्टर अंदर लौट गया।
कैप्टन की जांच – Naval Investigation Scene
ब्रिज पर हल्की रोशनी फैली थी।
समुद्र की हल्की लहरें जहाज़ के धातु में लगातार गूंज छोड़ रही थीं।
कैप्टन ने अपने जूनियर ऑफिसर की ओर देखा।
कैप्टन:
“पिछले एक महीने के इस क्षेत्र के सभी डेटा लॉग्स लेकर आओ—नेविगेशन, जीपीएस, एआईएस, आपातकालीन संचार प्रयास, मौसम रिपोर्ट, तूफ़ान का मार्ग, क्रू सूची और ऑनबोर्ड असाइनमेंट।”
मुझे सबकी डिटेल चाहिए तुरंत।
जूनियर: ओक सर।
जूनियर ने तुरंत टैबलेट खोला और काम शुरू किया।
कुछ घंटे बाद, जूनियर अधिकारी रिपोर्ट लेकर आया।
जूनियर:
“सर, पिछले छह महीने में इस क्षेत्र में चार सर्वे जहाज़ दर्ज हैं। ONGC 4421 पर आश्विन कुमार था।
कप्तान ने पूछा ONGC 4421 की डीटेल्स बताओ।
जूनियर:
4 नवंबर 2018 को जहाज़ ने पोर्ट ब्लेयर से अपना सफ़र शुरू किया।
मुख्य सर्वे जहाज़ ने 7 नवंबर को 14°N 92°E (ईस्ट–वेस्ट ग्रिड – EWG) क्षेत्र में सर्वे काम शुरू कर दिया था।
सपोर्ट शिप लगभग 15 समुद्री मील उत्तर-पश्चिम में, GPS 14°N 91°E पर थी।
उद्देश्य: निगरानी, आपातकालीन बैकअप और संचार की तत्परता।
कैप्टन ने नोटबुक खोली और पेन उठाकर लॉग को ध्यान से चिह्नित किया।
उसकी आँखें हर एक डेटा पॉइंट पर टिक गईं।
फिर उसने धीमे, लेकिन कड़क स्वर में पूछा।
“सर्वे बोट की अंतिम ज्ञात स्थिति क्या थी?”
जूनियर:
“बीस दिन पहले,“8 नवंबर 2018 को, 14°N 92°E। 14°N 92°E। इसके आगे का मार्ग तूफ़ान ने बदल दिया। सपोर्ट शिप ने इसे ट्रैक करने की कोशिश की, लेकिन सिग्नल खो गया।”
कैप्टन:
“सपोर्ट शिप से दूरी कितनी है?”
जूनियर:
“लगभग पंद्रह समुद्री मील, सर।”
कैप्टन:
“सपोर्ट शिप की अंतिम ज्ञात स्थिति क्या थी?”
जूनियर:
“14°N 91°E पर चेकपॉइंट पास किया, वहाँ से वापस आई। क्रू सुरक्षित थे, लेकिन छोटी सर्वे बोट का सिग्नल गायब है।”
कैप्टन की आँखें तनीं।
कैप्टन:
“मतलब… छोटी बोट तूफ़ान में खो गई, कोई बैकअप मौजूद नहीं था।”
जूनियर ने लैपटॉप खोला और जीपीएस लॉग्स दिखाए।
जूनियर:
“तूफ़ान के पैटर्न के हिसाब से छोटी बोट उत्तर-पूर्व की दिशा में बह गई। एआईएस सिग्नल अस्थायी था, कुछ घंटे के लिए पूरी तरह गायब रहा।”
कैप्टन:
“अगली इमरजेंसी कम्युनिकेशन?”
जूनियर:
“बोट ने 8 नवंबर 2018, 02:15 UTC पर डिस्ट्रेस कॉल भेजा।
फ्रीक्वेंसी विकृत थी और सिग्नल कमजोर।
सपोर्ट शिप ने कॉल रिसीव किया, लेकिन तूफ़ान के कारण तुरंत प्रतिक्रिया देना संभव नहीं था।
कैप्टन:
“एआईएस सिग्नल्स?”
जूनियर:
“कन्फ़र्म किया गया, नाव असली ONGC जहाज़ थी। क्रू सूची में सिर्फ़ आश्विन कुमार है, बाकी का रिकॉर्ड अधूरा है।”
कैप्टन ने नोटबुक में इसे ध्यान से रिकॉर्ड करते हुए कहा:
कैप्टन:
“मौसम रिपोर्ट और तूफ़ान का मार्ग क्या है?”
जूनियर:
“तूफ़ान ने 14°N–15°N और 91°E–93°E तक 8–9 नवंबर 2018 में यात्रा की। 35 नॉट्स की हवा और 4 मीटर की लहरें थीं।”
जूनियर ने नक्शे पर इसका निशान लगाया।
कैप्टन ने नक्शे पर अपनी उंगली रखकर कहा:
“यह बताता है कि बोट कैसे बह गई और अलग-थलग हुई। सब तार्किक है।”
कैप्टन:
“क्रू सूची और ऑनबोर्ड असाइनमेंट्स क्या हैं?”
जूनियर:
“सर्वे बोट में 7 लोग थे—चीफ जियोलॉजिस्ट, जियोफिज़िसिस्ट, मरीन इंजीनियर, नेविगेशन ऑफिसर, ड्रिलिंग इंजीनियर, सरकारी संपर्क अधिकारी और मेडिकल/सर्वाइवल प्रशिक्षित क्रू मेंबर। अभी सिर्फ़ आश्विन बचा है, बाकी का स्थिति अज्ञात है।”
कैप्टन ने गहरी सांस ली।
. ठीक है। अगर आश्विन की गवाही मिलेगी, तो पूरा परिदृश्य समझ में आ जाएगा।
लेकिन अभी हमारे पास सिर्फ़ लॉग्स और सबूत हैं।”
कैप्टन ने खुद से कहा।
अध्याय 4 खामोश सवाल
ब्रिज पर फिर से शांति छा गई थी।
रिपोर्ट फ़ाइल बंद हो चुकी थी।
डेटा, लॉग्स, ट्रैक्स—सब कुछ अपनी जगह पर।
काग़ज़ों में कोई गड़बड़ी नहीं थी।
कैप्टन कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा।
हाथ रेलिंग पर टिके हुए।
नज़र सामने फैले समुद्र पर—लेकिन दिमाग कहीं और।
ONGC की सपोर्ट शिप थी।
सर्वे बोट थी।
क्रू सूची भी पूरी थी।
सब कुछ सही लग रहा था।
और फिर भी—कुछ बहुत ग़लत था।
20 दिन पहले आए तूफ़ान में सात लोग इस सर्वे मिशन के दौरान खो गए थे।
छह प्रशिक्षित लोग समुद्र की मौजों में कहीं गुम थे।
फिर—
सिर्फ़ एक लौटा।
कैप्टन के दिमाग में सवाल एक‑एक कर उठने लगे।
अगर तूफ़ान आया था…
तो बोट पूरी तरह तबाह क्यों नहीं हुई?
अगर सपोर्ट शिप ने डिस्ट्रेस कॉल सुनी थी…
तो आख़िरी बार संपर्क ठीक‑ठीक किस हालात में टूटा?
और सबसे बड़ा सवाल—
छह लोग कहाँ गए?
समुद्र सब निगल सकता है—
पर यूँ, बिना कोई निशान छोड़े?
कैप्टन ने अपनी नोटबुक खोली।
एक पन्ने पर सिर्फ़ नाम लिखा था—
आश्विन कुमार
उसके नीचे कोई टिप्पणी नहीं।
कोई निष्कर्ष नहीं।
अभी नहीं।
आश्विन की कहानी अभी सुनी नहीं गई थी।
और कैप्टन जानता था—
जब सुनी जाएगी,
तो या तो सब साफ़ हो जाएगा…
या फिर चीज़ें और उलझ जाएँगी।
उसने गहरी साँस ली।
एक प्रशिक्षित अधिकारी होने के नाते,
वह किसी पर जल्दी भरोसा नहीं करता था।
आँकड़े आश्विन के पक्ष में थे।
लॉजिक उसके साथ था।
लेकिन युद्ध और समुद्र—
दोनों में एक नियम होता है—
जो दिखता है, वही पूरा सच नहीं होता।
कैप्टन ने इंटरकॉम उठाया।
“Medical Bay से अपडेट आते ही मुझे सूचना दी जाए।”
उसकी आवाज़ सपाट थी, पर कड़क।
इंटरकॉम रखकर वह मुड़ा।
इंटरोगेशन अभी शुरू नहीं हुआ था।
असल सवाल अभी पूछे नहीं गए थे।
और कहीं न कहीं—
उसे यह एहसास हो चुका था—
जब आश्विन बोलेगा,
तो यह मामला सिर्फ़ एक खोई हुई सर्वे बोट का नहीं रहेगा।
यह कहानी 20 दिन से समुद्र में लापता छह लोगों और उनके रहस्यों को भी उजागर करने वाली थी।